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सुनी बघेली मा हास्य व्यंग्य कविता।

महतारी अस मोह मिलत है, अपने भाखा बोली मा
ऐहिन से हम लिखी सुनाई, कविता शुद्ध बघेली मा।
📝 कवि प्रियांशु 'प्रिय'
📍 सतना ( मध्यप्रदेश ) प्रियांशु 'प्रिय' समकालीन बघेली कविता के एक उभरते हुए सशक्त युवा स्वर हैं।‌ जिनका जन्म मध्यप्रदेश के सतना जिले के ग्राम पंचायत मरौहां में हुआ। आपकी प्रारंभिक शिक्षा केंद्रीय विद्यालय क्रमांक-1, सतना में हुई और आपने स्नातकोत्तर (एम.ए. हिंदी साहित्य) की पढ़ाई शासकीय महाविद्यालय, सतना से पूर्ण की। आपको साहित्यिक अभिरुचि अपने पिता श्री सूर्यभान कुशवाहा जी से विरासत में प्राप्त हुई। आज आप बघेली साहित्�य में सक्रिय और संवेदनशील कवि के रूप में स्थापित हो चुके हैं।

� साहित्यिक उपलब्धियाँ:

• आकाशवाणी रीवा एवं दूरदर्शन मध्यप्रदेश से कविताओं का नियमित प्रसारण
• ‘लाड़ली बहना योजना’ पर लिखित लोकगीत को सतना शहर में स्वच्छता गाड़ी के माध्यम से बजाया गया
• CIIL, मैसूरु के लिए बघेली अनुवाद कार्य
• CICT, चेन्नई द्वारा प्रकाशित महान तमिल ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ के बघेली अनुवाद की समीक्षा
• विंध्य सहित देश के कई शहरों में कवि सम्मेलनों में काव्य-पाठ
• इंस्टाग्राम पेज और फेसबुक पर 80,000+ फॉलोअर्स, लाखों दर्शकों द्वारा बघेली कविताओं को सुना जाता है।

नहीं हम में कोई अन-बन नहीं हैबस इतना है कि अब वो मन नहीं हैमैं अपने आप को सुलझा रहा हूँतुम्हें ले कर कोई उलझन नहीं हैमुझ...
15/09/2026

नहीं हम में कोई अन-बन नहीं है
बस इतना है कि अब वो मन नहीं है

मैं अपने आप को सुलझा रहा हूँ
तुम्हें ले कर कोई उलझन नहीं है

मुझे तुम ग़ैर भी क्यों कह रहे हो
भला क्या ये भी अपना-पन नहीं है

किसी के मन को भी दिखला सके जो
कहीं ऐसा कोई दर्पन नहीं है

मैं अपने दोस्तों के सदक़े लेकिन
मिरा क़ातिल कोई दुश्मन नहीं है

~ मंगल नसीम


14/09/2026

कविता: गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं
रचनाकार: कवि प्रियांशु 'प्रिय'

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यहॉं से - Kavi Priyanshu 'Priy' | कवि प्रियांशु 'प्रिय'

आनंद लेई अउर जुड़े रही बघेली कविता के साथ। ❤️

#बघेली

अपनी बोली, अपनी भाषा से भला किसे प्रेम नहीं होता। हम और आप जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों में निवास कर‌ राजस्थानी, ब्रज, ब...
14/09/2026

अपनी बोली, अपनी भाषा से भला किसे प्रेम नहीं होता। हम और आप जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों में निवास कर‌ राजस्थानी, ब्रज, बुंदेली, बघेली, अवधी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, मैथिली, मगही आदि बोल रहे हैं। तो इन सब बोलियों का भी मीठी भाषा हिन्दी को प्रोत्साहित करने और इसकी सेवा करने में महनीय‌ योगदान है।

सतना रेलवे स्टेशन से बस स्टैंड तक आने‌ के लिए‌ जब आप ऑटो वाले से पूछते हैं कि "बस स्टैंड तक का कितना किराया लेंगे भइया?" तब वो अपनी क्षेत्रीय बघेली बोली में आपसे ये कहता‌ है कि "भइया‌ बीस रूपिया भर लागी।" तब ऑटो वाला बघेली बोली और आप हिंदी भाषा के विस्तार की एक कड़ी आगे बढ़ा चुके होते हैं। भाषाएं और बोलियॉं आपसी साहचर्य से एक दूसरे को विस्तार प्रदान करती हैं।

मैं गर्वित हूॅं कि बघेलखंड में मेरा जन्म हुआ है और मैंने हिंदी से पहले बघेली को जाना है, बघेली‌‌ बोला है और बघेली को जिया भी है। कुछ वर्ष पूर्व मैं इंदौर में एक प्राइवेट रेडियो में उद्घोषक के पद पर कार्यरत था।‌ वहॉं बघेली बोली में एक कार्यक्रम 'बघेली दरबार' किया करता था। हमारे कंटेन्ट को जॉंचने‌ वाले बघेली नहीं जानते थे। जब पूरा कंटेन्ट बन‌ जाता था तब मैं उन्हें इस कार्यक्रम में उपयोग किए गए बघेली के सभी शब्दों को समझाने के‌ लिए हिंदी का ही सहारा‌‌ लेता था।

विंध्य क्षेत्र से हटकर बघेली बोलते वक्त जब मैं असहज महसूस करता‌ हूं। तब हर बार मुझे हिंदी ने ही सहारा‌‌ दिया है। हिंदी आपको सहारा देती‌ है। हिंदी आपको आत्मविश्वास प्रदान करती है। हिंदी‌ भाव की भाषा‌ है। सभी भाषाओं का सम्मान करते हुए हिंदी‌ बोलते, पढ़ते और लिखते रहिए। हिंदी दिवस की‌ शुभकामनाएं।
जय हिंदी। जय हिंदुस्तान।
❤️❤️❤️

- प्रियांशु 'प्रिय'


#हिंदीदिवस

14/09/2026

कविता: हरितालिका तीज की हार्दिक शुभकामनाएं
रचनाकार: कवि प्रियांशु 'प्रिय'

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#बघेली ♥️

वक़्त किस तेज़ी से गुज़रा रोज़-मर्रा में 'मुनीर'आज कल होता गया और दिन हवा होते गए- मुनीर नियाज़ी
13/09/2026

वक़्त किस तेज़ी से गुज़रा रोज़-मर्रा में 'मुनीर'
आज कल होता गया और दिन हवा होते गए
- मुनीर नियाज़ी

दिखावे की मोहब्बत से सुनहरे पल नहीं आतेकभी भी झूट की डाली पे सच्चे फल नहीं आतेसभी के फ़ैज़ की ख़ातिर ही ये बरसात होती है...
12/09/2026

दिखावे की मोहब्बत से सुनहरे पल नहीं आते
कभी भी झूट की डाली पे सच्चे फल नहीं आते

सभी के फ़ैज़ की ख़ातिर ही ये बरसात होती है
किसी की चार-दीवारी में तो बादल नहीं आते

मिरी कड़वी ज़बाँ से तुम मिरी पहचान मत करना
मुझे ग़ुस्सा तो आता है मगर छल वल नहीं आते

तुम्हें मिलने की ख़्वाहिश ही यहाँ तक खींच लाती है
वगर्ना कौन जाता है जहाँ सिगनल नहीं आते

तिरी यादों ने इस दिल को कुछ ऐसे बाँध रक्खा है
अकेले भी अगर दौड़ें तो हम अव्वल नहीं आते

यहाँ बैठो हमारे पास में बातें करो हम से
चले जाते हैं जो इक बार फिर वो पल नहीं आते

अगर हल जानते हो फिर तुम्हें ये मुश्किलें क्या हैं
उन्ही को दिक्कतें होती हैं जिन को हल नहीं आते

सताना बे-ज़बानों को तुम्हें भारी न पड़ जाए
तुम्हारे रास्तों में क्या कभी जंगल नहीं आते

कई हुश्यार आते हैं हमें पागल बनाने को
हमेशा पागलों के भेस में पागल नहीं आते

बहू बेटी हमारी रिज़्क़ को माथे लगाती है
हमारे पाँव के नीचे कभी चावल नहीं आते

किसी का मर्तबा कोई भी कैसे छीन सकता है
हरे होते भी हैं तो सबज़ियों में फल नहीं आते

पहन के हम इन्हें बचपन तिरे कूचे में आ जाते
मगर अब पाँव में छोटे से ये चप्पल नहीं आते

- आसिफ़ मिर्ज़ा

11/09/2026

कविता: अहिमक मची लुटाई
रचनाकार: कवि प्रियांशु 'प्रिय'

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आनंद लेई अउर जुड़े रही बघेली कविता के साथ। ❤️

#बघेली

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