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मेरी 6 साल की बेटी को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया, तभी अस्पताल के बाहर सोने वाले एक बूढ़े ने कहा, “अभी इसे मत छोड़िए।”...
16/08/2026

मेरी 6 साल की बेटी को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया, तभी अस्पताल के बाहर सोने वाले एक बूढ़े ने कहा, “अभी इसे मत छोड़िए।” उसका दिल फिर धड़का, लेकिन मेरे भाई की फुसफुसाहट ने मुझे जमा दिया।

शाम 18:42 पर मॉनिटर ने एक लंबी, सीधी आवाज़ निकाली और डॉक्टर ने 6 साल की अनाया के सीने से हाथ हटाते हुए कहा—

—हम उसे वापस नहीं ला सके… मुझे बहुत अफ़सोस है।

आरव मेहरा के कानों में बाकी सारी आवाज़ें जैसे डूब गईं।

दिल्ली के प्रतिष्ठित मेहरा चाइल्ड एंड ट्रॉमा सेंटर की आपातकालीन कक्ष में उसकी बेटी सफेद चादर के नीचे निश्चल पड़ी थी। सिर्फ 20 मिनट पहले वही अनाया अस्पताल की कैफेटेरिया में स्ट्रॉबेरी शेक पीने की जिद कर रही थी। उसने अपने पिता से वादा करवाया था कि छुट्टी मिलते ही वे इंडिया गेट के पास आइसक्रीम खाने जाएंगे।

अब उसकी छोटी उंगलियां नीली पड़ रही थीं।

आरव उस अस्पताल के प्रबंध निदेशक मंडल का अध्यक्ष था। मुख्य द्वार के संगमरमर पर उसके पिता देवेंद्र मेहरा का नाम खुदा हुआ था। शहर के बड़े उद्योगपति, मंत्री और वरिष्ठ डॉक्टर उसके 1 फोन पर जवाब देते थे।

लेकिन उस शाम उसके पास ऐसा कोई नंबर नहीं था जो उसकी बेटी की 1 धड़कन वापस खरीद सके।

उसका छोटा भाई कुणाल तेजी से अंदर आया और आरव के कंधों को पकड़ लिया।

—भैया, बाहर चलो। डॉक्टरों ने सब कुछ कर लिया।

आरव ने प्रतिक्रिया नहीं दी।

तभी दरवाजे पर किसी ने भारी आवाज़ में कहा—

—चादर मत डालिए।

सभी ने मुड़कर देखा।

करीब 68 साल का एक दुबला आदमी दरवाजे पर खड़ा था। सफेद दाढ़ी कई दिनों से नहीं कटी थी। उसके मैले भूरे कुर्ते पर बारिश के निशान थे और सिर पर भारतीय सेना की पुरानी हरी टोपी थी। पैरों में अलग-अलग रंग की घिसी चप्पलें थीं।

अस्पताल का सुरक्षा गार्ड उसके पीछे दौड़ता हुआ आया।

—साहब, ये बाहर सर्विस गेट के पास रहता है। पता नहीं अंदर कैसे आ गया।

कुणाल की आंखें सिकुड़ गईं।

—इसे तुरंत बाहर निकालो।

लेकिन बूढ़ा आदमी अनाया की तरफ देखता रहा।

—पहले बच्ची का तापमान जांचिए।

डॉ. समीर मल्होत्रा ने थके स्वर में कहा—

—आप कौन हैं?

—रघुवीर सिंह। सेना की मेडिकल यूनिट में 22 साल फील्ड पैरामेडिक रहा हूं।

कुणाल ने तिरस्कार से हंसते हुए कहा—

—और अब फुटपाथ पर सोते हैं। शानदार योग्यता है।

रघुवीर ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

वह अनाया के पास पहुंचा। उसने बच्ची के होंठ, नाखून और भीगे बाल देखे। फिर चादर के नीचे उसके कपड़ों को छुआ।

—इसके कपड़े इतने ठंडे क्यों हैं?

आरव जैसे नींद से जागा।

—वह कैफेटेरिया में गिरी थी।

—कहां?

—जूस काउंटर के पास।

रघुवीर का चेहरा बदल गया।

—उस काउंटर के नीचे बड़ी बर्फ बनाने वाली मशीन है?

एक नर्स ने सिर हिलाया।

—हां।

—वह कई दिनों से रिस रही है क्या?

नर्स कुछ बोलती, उससे पहले कुणाल बीच में आ गया।

—बस बहुत हुआ।

रघुवीर ने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा।

—मैंने पूछा मशीन रिस रही है क्या?

कुणाल चिल्लाया—

—तुम्हें सवाल पूछने का कोई अधिकार नहीं है।

पीछे खड़ी नर्स मीना सक्सेना घबराकर बोली—

—आज दोपहर वहां बहुत ठंडा पानी जमा था। सफाई वाले ने बताया था।

कुणाल ने उसे ऐसा घूरा कि वह चुप हो गई।

रघुवीर ने डॉ. समीर से कहा—

—बच्ची का केंद्रीय तापमान जांचिए। अभी।

डॉक्टर का चेहरा कठोर हो गया।

—उसका हृदय लगभग 7 मिनट तक बंद रहा। हमने पूर्ण पुनर्जीवन प्रक्रिया की है। कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

—फिर भी तापमान जांच लीजिए।

—आप समझ नहीं रहे हैं।

—मैं समझ रहा हूं। मैंने सियाचिन से निकाले जवानों को देखा है जिनकी नब्ज नहीं मिल रही थी, सांस लगभग खत्म थी, लेकिन शरीर अत्यधिक ठंडा होने के कारण उन्हें मृत मानना जल्दबाजी होती।

कुणाल ने मेज पर मुट्ठी मारी।

—यह सियाचिन नहीं है!

रघुवीर शांत रहा।

—मौत जगह देखकर नहीं आती, साहब। लेकिन ठंड शरीर के काम करने की रफ्तार बदल देती है।

आरव ने अचानक डॉक्टर का हाथ पकड़ लिया।

—जांचिए।

डॉ. समीर कुछ क्षण उसे देखते रहे। फिर उन्होंने रेजिडेंट डॉक्टर को संकेत दिया।

जांच शुरू हुई।

कुछ सेकंड बाद रेजिडेंट की आंखें फैल गईं।

—सर… तापमान उम्मीद से काफी नीचे है।

डॉ. समीर तुरंत स्क्रीन की तरफ झुके।

रघुवीर बोला—

—इसके भीगे कपड़े हटाइए। नियंत्रित तरीके से गर्म कीजिए। जब तक इसका शरीर सामान्य तापमान के करीब नहीं आता, हार मानना जल्दबाजी होगी।

कुणाल आरव के सामने आ खड़ा हुआ।

—भैया, सोचो! मृत्यु घोषित हो चुकी है। अगर अब कुछ गलत हुआ तो जांच बैठेगी। मीडिया हमें जिंदा खा जाएगा।

आरव धीरे-धीरे उसकी ओर मुड़ा।

—मेरी बेटी मर रही है और तुम्हें मीडिया की चिंता है?

—मुझे अस्पताल की चिंता है। पापा ने पूरी जिंदगी इसे बनाया।

आरव की आंखों में कुछ टूट गया।

—पापा ने अस्पताल बनाया था। मकबरा नहीं।

उसने डॉ. समीर की तरफ देखा।

—फिर से कोशिश कीजिए।

डॉक्टर ने आदेश दिया—

—पुनर्जीवन दोबारा शुरू करो। गर्म द्रव तैयार करो। तापमान लगातार देखो।

कमरे में अचानक अफरा-तफरी मच गई।

नर्सों ने चादर हटाई। मशीनें फिर सक्रिय हुईं। डॉ. समीर ने छाती पर दबाव देना शुरू किया।

रघुवीर पीछे दीवार से लग गया।

1 मिनट बीता।

कुछ नहीं।

2 मिनट बीते।

कुणाल ने सिर झटकते हुए कहा—

—हम खुद अपने खिलाफ सबूत बना रहे हैं।

आरव उसकी तरफ नहीं देख रहा था।

उसकी निगाह सिर्फ अनाया के चेहरे पर थी।

3 मिनट के करीब मॉनिटर पर एक छोटी टेढ़ी रेखा उठी।

नर्स चीखी—

—गतिविधि!

फिर एक हल्की धड़कन।

फिर दूसरी।

डॉ. समीर ने सबको पीछे होने का संकेत दिया।

मॉनिटर पर अंतराल के बाद फिर धड़कन दिखाई दी।

18:46 पर अनाया का दिल अपने आप धड़क रहा था।

आरव वहीं घुटनों पर गिर गया।

उसने दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया और पहली बार जोर से रोया।

रघुवीर ने अपनी पुरानी सेना वाली टोपी उतारी और आंखें बंद कर लीं।

लेकिन उसी समय आरव ने एक और आवाज़ सुनी।

कुणाल डॉ. समीर के बिल्कुल पास जाकर धीमे स्वर में कह रहा था—

—ये आदमी यहां से बाहर जाकर बोलने नहीं चाहिए। अगर इसने मशीन वाली बात या मौत घोषित करने वाली बात बाहर बताई तो हम खत्म हो जाएंगे।

आरव की उंगलियां रुक गईं।

कुणाल ने आगे कहा—

—खासकर मशीन की बात। पुरानी शिकायतों तक कोई नहीं पहुंचना चाहिए।

आरव ने धीरे से जेब से मोबाइल निकाला।

रिकॉर्डिंग चालू कर दी।

उस क्षण तक उसे लगा था कि उसका भाई सिर्फ बदनामी से डर रहा है।

लेकिन “पुरानी शिकायतों” के 2 शब्द उसके सीने में कांटे की तरह अटक गए।

आईसीयू में अनाया को ले जाने के बाद आरव ने कैफेटेरिया का सीसीटीवी मंगवाया।

फुटेज में अनाया जूस काउंटर के पास जाती दिखाई दी। अचानक उसका पैर फिसला। वह काउंटर के नीचे जमा पारदर्शी पानी में गिरी। कर्मचारी दौड़े। उसे उठाया गया। कुछ सेकंड बाद वह बेहोश हो गई।

आरव ने सुविधा प्रबंधक से पूछा—

—ये पानी कहां से आया?

आदमी का चेहरा पीला पड़ गया।

—सर… शायद बर्फ वाली मशीन से।

—शायद?

—मशीन के कूलिंग यूनिट में समस्या थी।

—कब से?

वह चुप रहा।

—मैंने पूछा कब से?

—करीब 11 दिन।

आरव की सांस रुक गई।

—मरम्मत क्यों नहीं हुई?

सुविधा प्रबंधक ने कुणाल के कार्यालय की तरफ देखा।

—खर्च रोक दिया गया था।

आरव ने तुरंत सारे रखरखाव रिकॉर्ड सुरक्षित करने का आदेश दिया।

लेकिन जब तकनीकी विभाग ने फाइल खोली, उसमें पिछले 11 दिनों की शिकायतें गायब थीं।

सिर्फ 1 दस्तावेज बचा था।

उस पर लिखा था कि मशीन “पूरी तरह सुरक्षित” है।

नीचे डिजिटल मंजूरी कुणाल मेहरा की थी।

आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा, फिर आईसीयू के कांच के पार अपनी बेटी को।

अब सवाल यह नहीं था कि कुणाल उस बेघर आदमी को चुप क्यों कराना चाहता था।

सवाल यह था कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए उसका भाई कितनी दूर जा चुका था।

और तभी आरव के फोन पर एक संदेश आया—

“रघुवीर सिंह को अस्पताल से बाहर कर दिया गया है।”

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माँ ने सालों तक घर के बिल भरे, अपने ही घर में जगह छोड़ी और बिना कभी हिसाब माँगे बेटे-बहू की हर मुश्किल में साथ दिया। लेक...
16/08/2026

माँ ने सालों तक घर के बिल भरे, अपने ही घर में जगह छोड़ी और बिना कभी हिसाब माँगे बेटे-बहू की हर मुश्किल में साथ दिया। लेकिन जिस दिन उन्हें खुद उनकी ज़रूरत पड़ी, बेटे ने ठंडे स्वर में कहा, “हम आपकी ज़िम्मेदारी नहीं हैं।” उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि कुछ ही मिनटों बाद माँ को पता चल जाएगा कि बहू उस बातचीत को आगे बढ़ने से रोकने के लिए इतनी बेताब क्यों थी।

—हमें आपका खर्च उठाने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, माँ। आपको अपनी पेंशन मिलती है।
अमित ने मोबाइल से नज़र उठाए बिना कहा। पुणे के कोथरुड इलाके के अपने 2BHK फ्लैट की रसोई में 62 साल की सुजाता कुलकर्णी हाथ में डॉक्टर की पर्ची लिए खड़ी रह गईं। उन्होंने बेटे से केवल ₹3,200 उधार माँगे थे। नई दवा उसी शाम शुरू करनी थी और पेंशन आने में 5 दिन बाकी थे।
नेहा, उनकी बहू, फ्रिज बंद करते हुए बोली: —और हम आपसे पैसे माँगने के लिए मजबूर भी नहीं करते। अगर महीने के अंत में पैसे नहीं बचते, तो आपको बजट बनाना चाहिए।
सुजाता की नज़र डाइनिंग टेबल पर रखे नए ब्रांडेड जूतों के डिब्बे पर गई। 2 हफ्ते पहले अमित ने कार की मरम्मत के लिए उनसे ₹55,000 लिए थे। उससे पहले नेहा ने गोवा की यात्रा की बुकिंग के लिए ₹30,000 माँगे थे। दोनों बार सुजाता ने बिना तारीख पूछे पैसे दे दिए। वह हमेशा देती आई थीं।
यह फ्लैट भी सुजाता की कमाई से खरीदा गया था। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने वर्षों तक अकाउंट्स विभाग में नौकरी की, पुराना 1BHK बेचा और ऋण चुकाकर यह घर अपने नाम पर लिया।
अमित की शादी के बाद उन्होंने कहा था: —कुछ महीनों के लिए यहीं रह लो, डाउन पेमेंट जोड़ लेना।
वे कुछ महीने 4 साल बन गए। किराया कोई नहीं देता था। राशन और घर के कई खर्च सुजाता उठातीं, और बेटे का बजट बिगड़ते ही अपनी बचत खोल देतीं।
उन्होंने कभी हिसाब नहीं रखा। उन्हें लगता था माँ हिसाब रखे तो रिश्ता छोटा हो जाता है। लेकिन उस रात पहली बार उन्हें लगा कि उनके त्याग को प्रेम नहीं, सुविधा समझा गया।
—मैंने सिर्फ उधार माँगा है —सुजाता ने कहा।
अमित झुँझलाया. —5 दिन रुक जाइए। हमारे भी खर्च हैं।
—और जो ₹55,000 तुमने लिए थे?
नेहा ने बाँहें मोड़ लीं. —वो आपने अपने बेटे की मदद के लिए दिए थे। अब उसे कर्ज़ मत बनाइए।
सुजाता ने बेटे की ओर देखा. —तुम भी यही सोचते हो?
अमित ने बिना हिचक कहा: —हाँ। आप बड़ी हैं, माँ। आपकी निजी जरूरतें हमारी जिम्मेदारी नहीं हो सकतीं।
सुजाता के भीतर कुछ टूट गया. —ठीक है।
वह कमरे में गईं और फ्लैट की रजिस्ट्री निकाली। अगली सुबह एक प्रॉपर्टी वकील ने दस्तावेज देखकर बताया कि यह उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति है और बेटे-बहू का वहाँ रहना उन्हें मालिकाना अधिकार नहीं देता। जरूरत पड़ी तो उन्हें औपचारिक कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।
शाम को उन्होंने फाइल मेज़ पर रखी. —हम तीनों को बात करनी है।
अमित हँसा. —₹3,200 के लिए इतना सब?
—नहीं। उन शब्दों के लिए जो ₹3,200 ने मुझसे सुनवा दिए। अगर तुम्हें मेरा खर्च उठाने की जिम्मेदारी नहीं लगती, तो मुझे भी 2 कमाने वाले वयस्कों का खर्च उठाने की जिम्मेदारी नहीं है।
उन्होंने रहने, राशन, घरेलू खर्च और पुराने उधार गिनाए.
—तुम दोनों 30 दिन में रहने की दूसरी जगह ढूँढ़ लो। लिखित सूचना भी दे दूँगी।
नेहा कुर्सी से उठ गई. —आप अपने इकलौते बेटे को घर से निकालेंगी?
—मैं उसे अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी लेने को कह रही हूँ।
तभी सुजाता की नज़र सोफे के नीचे आधी छिपी नीली फाइल पर पड़ी। नेहा ने उसे पहले उठाने की कोशिश की, पर सुजाता तेज थीं।
अंदर नए अपार्टमेंट की ब्रोशर, होम-लोन कैलकुलेशन और अमित की लिखावट में एक पन्ना था: “डाउन पेमेंट: कोथरुड फ्लैट बेचने के बाद।” नीचे लिखा था: “माँ गिफ्ट डीड साइन कर दें, फिर आगे बढ़ना है।”
सुजाता ने सिर उठाया। अमित का चेहरा सफेद पड़ चुका था.
—कौन-सा फ्लैट बेचने वाले थे तुम?
कमरे में कोई जवाब नहीं आया।
और उसी चुप्पी में सुजाता समझ गईं कि ₹3,200 की दवा इस घर की सबसे छोटी समस्या थी।..

16/08/2026

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सबसे दर्दनाक बात यह नहीं थी कि 100 से अधिक मेहमानों के सामने नैना शर्मा को पूरे कपड़ों समेत स्विमिंग पूल में धक्का दे दिया गया था, बल्कि यह थी कि किनारे खड़ी अमीर लड़की हँसते हुए चिल्लाई—

—उसे बाहर मत निकालो। थोड़ी देर वहीं रहने दो, ताकि इसे अपनी औकात याद रहे।

दिल्ली के छतरपुर में बने उस आलीशान फार्महाउस की रोशनी पानी पर कांप रही थी। 28 साल की नैना कमर तक पानी में खड़ी थी। उसकी सफेद कमीज शरीर से चिपक चुकी थी, काला एप्रन पानी से भारी होकर पैरों में उलझ रहा था और उसके चारों ओर खड़े लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बना रहे थे।

किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।

कुछ मिनट पहले तक वही लोग उससे पानी, मिठाई और खाने की प्लेटें मांग रहे थे।

अब उसकी बेइज्जती उनके लिए मनोरंजन बन चुकी थी।

नैना दिन में दक्षिण दिल्ली के एक छोटे अस्पताल में स्वागत कक्ष संभालती थी और रात को बड़े आयोजनों में खाना परोसने का काम करती थी। उसके हर रुपये का हिसाब तय था। लक्ष्मी नगर के किराए के घर का खर्च, मां सुनीता की दवाइयां और छोटे भाई रोहित की अभियांत्रिकी की पढ़ाई।

उसके पिता 6 साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मर गए थे। तब से सुनीता ने घरों में खाना बनाकर और कपड़े सिलकर दोनों बच्चों को संभाला था।

वह हमेशा एक बात कहती थी—

—गरीबी जेब में हो तो चल जाती है, बेटी। सिर के अंदर घुस जाए तो आदमी खुद को छोटा समझने लगता है।

नैना ने वह बात कभी नहीं भूली थी।

उस रात फार्महाउस उद्योगपति आर्यन मल्होत्रा का था। 44 साल का आर्यन एक तेजी से बढ़ती डिजिटल भुगतान कंपनी का संस्थापक था। पार्टी में निवेशक, बड़े व्यापारी, फिल्मी चेहरे और राजधानी के कई प्रभावशाली परिवार आए थे।

उन्हीं में विक्रम सिंघानिया भी था, जिसकी कंपनी आर्यन के व्यवसाय में बड़ी हिस्सेदार थी।

उसकी 26 वर्षीय बेटी रिया सिंघानिया पार्टी की जान बनने की कोशिश कर रही थी। उसके आसपास हमेशा 3 दोस्त घूम रहे थे, जो उसकी हर बात पर हंसते थे।

शाम को नैना शराब के गिलास लेकर उसके पास पहुंची थी। जैसे ही वह झुकी, कुर्सी का कोना उसकी कलाई से टकराया और पानी की कुछ बूंदें रिया की महंगी पोशाक पर गिर गईं।

रिया ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

—तुम्हें दिखाई नहीं देता?

—माफ कीजिए मैडम। मैं अभी इसे साफ करवाती हूं।

रिया ने अपनी पोशाक की तरफ देखा और फिर नैना को ऊपर से नीचे तक नापा।

—जानती हो इसकी कीमत कितनी है?

नैना चुप रही।

—शायद तुम्हारी 1 साल की कमाई से ज्यादा।

पास खड़ी लड़कियां हंस पड़ीं।

नैना ने केवल इतना कहा—

—गलती मेरी है। मैं प्रबंधक को बुलाती हूं।

रिया ने हाथ झटक दिया।

—मेरी नजरों से दूर हो जाओ।

नैना वहां से चली गई।

उसे लगा मामला खत्म हो गया।

लेकिन आधी रात के करीब जब वह पूल के पास से खाने की प्लेट लेकर जा रही थी, रिया ने अपने दोस्तों को आंख से इशारा किया।

एक लड़की ने जानबूझकर पैर आगे कर दिया।

नैना लड़खड़ाई, लेकिन उसने प्लेट संभाल ली।

तभी पीछे से दोनों हथेलियों का जोरदार धक्का लगा।

प्लेट हवा में घूमी।

कांच के कटोरे संगमरमर पर टूट गए।

और नैना सीधी पानी में जा गिरी।

कुछ सेकंड तक उसे कुछ समझ नहीं आया। एप्रन पैरों में उलझ गया था। वह हाथ-पैर मारती हुई ऊपर आई और सांस लेने लगी।

किनारे से जोरदार ठहाका सुनाई दिया।

रिया नकली चिंता के साथ बोली—

—अरे! गिर गई क्या?

उसकी सहेली ने मोबाइल कैमरा नैना की ओर करते हुए कहा—

—रुको, पहले वीडियो पूरा बन जाने दो।

नैना पूल के किनारे पहुंची, लेकिन भीगा कपड़ा भारी हो गया था।

—कोई हाथ दे दीजिए।

एक अधेड़ आदमी पीछे हट गया ताकि उसके कपड़े न भीग जाएं।

दूसरी महिला ने मुंह बनाया।

—सारा माहौल खराब कर दिया।

नैना की आंखें भर आईं।

उसी क्षण संगीत बंद हो गया।

मुख्य दरवाजे से आर्यन बाहर आया।

उसने सामने का दृश्य देखा। पानी में खड़ी नैना, फर्श पर टूटा कांच, तैरती प्लेट और किनारे पर हंसते लोग।

वह सीधा पूल तक गया और घुटनों के बल बैठ गया।

—अपना हाथ दो।

नैना पीछे हट गई।

—सर, आपके कपड़े भीग जाएंगे।

—मैंने कपड़ों के बारे में नहीं पूछा। हाथ दो।

उसने नैना को बाहर खींचा और अपनी जैकेट उसके कंधों पर डाल दी।

—कहीं चोट लगी है?

—घुटने में थोड़ी।

नैना टूटे गिलासों की ओर देखने लगी।

—सामान का पैसा मेरी मजदूरी से काट लीजिएगा।

आर्यन की भौंहें सिकुड़ गईं।

—जिस चीज को तुमने जानबूझकर नहीं तोड़ा, उसका पैसा तुम क्यों दोगी?

रिया आगे आई।

—आर्यन अंकल, इतना गंभीर होने की जरूरत नहीं है। वह खुद फिसल गई थी।

आर्यन ने उसकी तरफ देखा।

—खुद फिसली?

—हां।

उस क्षण नैना ने पहली बार रिया के चेहरे पर घबराहट देखी।

आर्यन ने ऊपर छत के कोनों में लगी निगरानी कैमरों की तरफ नजर उठाई।

—तो फिर जांच करने में तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

रिया का चेहरा उतर गया।

तभी विक्रम सिंघानिया तेजी से वहां पहुंचा।

—आर्यन, रहने दो। एक लड़की की गलती के लिए पार्टी खराब मत करो।

—किस लड़की की गलती?

विक्रम हल्का हंसा।

—वही परोसने वाली। ऐसे कर्मचारियों से कभी-कभी गलती हो जाती है।

नैना के चेहरे पर अपमान की गर्मी दौड़ गई।

आर्यन शांत रहा।

—अगर गलती उसी की है तो कैमरा वही साबित कर देगा।

विक्रम उसके बेहद करीब आ गया।

—100 से ज्यादा लोग यहां हैं। हमारे निवेशक भी हैं। एक मामूली कर्मचारी के लिए तमाशा मत बनाओ।

आर्यन ने सुरक्षा प्रमुख महेश को बुलाया।

—पिछले 15 मिनट की रिकॉर्डिंग मुख्य पर्दे पर चलाओ।

विक्रम का चेहरा सख्त हो गया।

—आर्यन।

—रिकॉर्डिंग चलाओ।

कुछ ही सेकंड बाद वही बड़ा पर्दा, जिस पर थोड़ी देर पहले कंपनी की उपलब्धियां दिखाई जा रही थीं, अब पूल के पास की घटना दिखा रहा था।

हर चेहरा स्क्रीन की ओर मुड़ गया।

वीडियो में साफ दिखाई दिया कि रिया ने रास्ता रोका।

उसकी सहेली ने पैर आगे किया।

और फिर रिया ने दोनों हाथों से नैना को धक्का दिया।

हंसी गायब हो गई।

रिया ने नीचे देख लिया।

एक मेहमान ने अपना मोबाइल धीरे से जेब में रख लिया।

नैना ने सांस रोक ली।

उसे लगा अब शायद विक्रम बेटी से माफी मंगवाएगा।

लेकिन उसने जो कहा, उसने सब कुछ बदल दिया।

—इसे बंद करो।

आर्यन ने उसकी ओर देखा।

विक्रम ने दांत भींचे।

—तुम मेरी बेटी को सबके सामने अपमानित कर रहे हो।

—उसने अभी एक कर्मचारी को पानी में धक्का दिया है।

—वह जवान है। मजाक कर रही थी।

—वह 26 साल की है।

विक्रम की आवाज ठंडी हो गई।

—अगर तुम इस मामले को यहीं खत्म नहीं करते तो कल सुबह मैं अपना पूरा निवेश निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दूंगा।

चारों ओर फुसफुसाहट फैल गई।

रिया को जैसे ताकत वापस मिल गई।

उसने नैना की ओर देखकर मुस्कुराया।

शायद उसे विश्वास था कि करोड़ों रुपये के सामने एक परोसने वाली की इज्जत हमेशा हार जाएगी।

लेकिन आर्यन ने बिना पलक झपकाए विक्रम को देखा।

—अपने वकीलों को तैयार कर लेना।

विक्रम चौंका।

—क्या कहा?

—क्योंकि आज मैंने केवल यह नहीं देखा कि तुम्हारी बेटी मेरे कर्मचारी के साथ कैसा व्यवहार करती है। मैंने यह भी समझ लिया है कि तुम सत्ता का इस्तेमाल किस तरह करते हो।

विक्रम की आंखें सिकुड़ गईं।

—मुझे धमकी दे रहे हो?

—नहीं। चेतावनी दे रहा हूं।

उसने महेश की ओर देखा।

—रिकॉर्डिंग की 3 प्रतियां बनाओ। कोई भी फुटेज मिटे नहीं।

रिया चिल्लाई—

—आप एक नौकरानी के लिए पापा के खिलाफ जा रहे हैं?

आर्यन ने पहली बार आवाज ऊंची की।

—वह नौकरानी नहीं है। वह यहां काम करने आई इंसान है।

पार्टी में सन्नाटा छा गया।

विक्रम ने बेटी का हाथ पकड़ा और जाने लगा।

दरवाजे पर पहुंचकर वह पलटा।

—सुबह तक तुम्हें समझ आ जाएगा कि किससे दुश्मनी ली है।

नैना का दिल बैठ गया।

उसने आर्यन को रोकना चाहा।

—सर, कृपया मेरे कारण अपना कारोबार खतरे में मत डालिए।

आर्यन ने उसकी ओर देखा।

—तुम्हारे कारण कुछ नहीं हुआ है। गलत काम किसी और ने किया है।

उस रात लगभग 2 बजे नैना घर पहुंची। सुनीता अभी तक जाग रही थी। उसने भीगी वर्दी और पुरुषों वाली महंगी जैकेट देखते ही सब समझ लिया।

—क्या हुआ?

—कुछ नहीं मां।

सुनीता ने उसकी आंखों में देखा।

—तू बचपन से झूठ बोलते समय दाहिना हाथ छिपाती है।

नैना की आंखें भर आईं।

उसने सब बता दिया।

रोहित भी कमरे से निकल आया। उसकी मुट्ठियां बंध गईं।

—नाम बता उस लड़की का।

—और तू क्या करेगा?

—कुछ भी।

—तू अपनी पढ़ाई करेगा।

—दीदी, तुम 16 घंटे काम करोगी, लोग तुम्हें पानी में फेंकेंगे और मैं किताब लेकर बैठा रहूं?

सुनीता ने दोनों को शांत करने की कोशिश की।

रोहित की आवाज टूट गई।

—मैं पढ़ाई छोड़ देता हूं।

नैना ने तुरंत उसका चेहरा पकड़ लिया।

—दोबारा ऐसा मत कहना।

—लेकिन तुम्हारी जिंदगी?

—मेरी जिंदगी खत्म नहीं हुई है।

सुनीता धीरे से बोली—

—कल उस काम पर मत जाना।

—मां, किराया देना है।

—इज्जत का किराया नहीं दिया जाता, बेटी।

नैना जवाब नहीं दे सकी।

अगली सुबह उसके फोन पर लगातार संदेश आने लगे।

किसी ने पार्टी का अधूरा वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया था।

लेकिन उसमें धक्का देने का हिस्सा काट दिया गया था।

रिया ने लिखा था कि एक आक्रामक कर्मचारी ने शराब पीकर हंगामा किया और बाद में उसे बदनाम करने की कोशिश की।

कई लोग नैना को लालची कहने लगे।

फिर उसके कार्यक्रम प्रबंधक का फोन आया।

नैना ने डरते हुए उठाया।

लेकिन दूसरी ओर से केवल इतना कहा गया—

—आर्यन सर ने तुम्हें तुरंत अपने कार्यालय बुलाया है।

2 घंटे बाद नैना गुरुग्राम स्थित आर्यन के मुख्यालय में बैठी थी।

मेज पर उसके सामने एक मोटी फाइल रखी थी।

आर्यन ने कहा—

—तुम शिकायत दर्ज कर सकती हो। पूरा वीडियो, गवाह और कंपनी की कानूनी सहायता तुम्हारे साथ होगी।

नैना ने फाइल नहीं खोली।

—अगर मैंने ऐसा किया तो विक्रम सिंघानिया आपका निवेश रोक देगा।

—संभव है।

—आपको करोड़ों का नुकसान हो सकता है।

कुछ पल बाद आर्यन बोला—

—17 साल की उम्र में मैं होटल में बर्तन उठाता था। मेरी मां रसोई में काम करती थीं। एक आदमी ने ठंडी दाल की वजह से उनके चेहरे के सामने सिक्के फेंके थे। मां ने हर सिक्का जमीन से उठाया, क्योंकि उसी पैसे से उस रात राशन आना था।

नैना ने सिर उठाया।

—मैंने उस दिन तय किया था कि अगर कभी मेरे पास ताकत आई तो मेरे सामने किसी मेहनत करने वाले को छोटा नहीं कहा जाएगा।

नैना की आंखें नम हो गईं।

उसने फाइल खोल दी।

—मैं शिकायत करूंगी।

उसी समय दरवाजा जोर से खुला।

कंपनी का वित्त प्रमुख अरविंद अंदर आया। उसके हाथ में कुछ दस्तावेज थे और चेहरे पर डर साफ था।

—सर, हमें इससे भी बड़ी समस्या मिली है।

आर्यन ने कागज लिए।

पहला पन्ना देखते ही उसका चेहरा बदल गया।

कई महीनों से करोड़ों रुपये ऐसी कंपनियों को भेजे गए थे जिनका संबंध विक्रम के रिश्तेदारों से था।

और सबसे नीचे आर्यन के नाम से एक हस्ताक्षर था।

आर्यन ने कागज को रोशनी के नीचे उठाया।

—यह हस्ताक्षर मेरा नहीं है।

अरविंद ने अगला दस्तावेज रखा।

—कुल रकम अभी तक ₹23,70,00,000 है।

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

नैना ने पहली बार समझा कि पिछली रात कैमरे में कैद हुआ धक्का केवल एक अमीर लड़की की क्रूरता नहीं था।

उसने अनजाने में उस दरवाजे को खोल दिया था जिसके पीछे सिंघानिया परिवार का कहीं बड़ा राज छिपा था।

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मेरी सास ने मुझे बेटी को गोद में लिए घर के बाहर छोड़ दिया, लेकिन सबसे ज्यादा दर्द तब हुआ जब मैंने अपने पति को उनके पीछे ...
16/08/2026

मेरी सास ने मुझे बेटी को गोद में लिए घर के बाहर छोड़ दिया, लेकिन सबसे ज्यादा दर्द तब हुआ जब मैंने अपने पति को उनके पीछे खड़े होकर सब कुछ देखते हुए पाया—बिना कुछ किए। “अभी दरवाज़ा मत खोलना,” उन्होंने बेहद शांत स्वर में कहा। मुझे लगा वे सिर्फ मुझे अपमानित करना चाहते हैं… जब तक मुझे समझ नहीं आया कि वे दोनों मुझे चुप रखने के लिए इतने बेताब क्यों थे।

—अगर वह फिर दरवाज़ा पीटे, तो मत खोलना। कुछ दिन बाहर खड़ी रहेगी, तभी समझेगी कि इस घर में उसकी नहीं चलती। यह वाक्य मैंने उसी समय नहीं सुना था। दो दिन बाद, लिविंग रूम में रखे छोटे इनडोर कैमरे की रिकॉर्डिंग देखते हुए सुना। तब तक मैं खुद को समझाती रही थी कि मेरी सास सुनीता बस भूलने लगी हैं। मेरा नाम अनन्या है, मेरी उम्र 29 साल है और मैं पुणे के बानेर इलाके में अपने पति रोहन, आठ महीने की बेटी तारा और सास सुनीता के साथ रहती थी। तारा के जन्म के बाद सुनीता नाशिक से आई थीं। उन्होंने कहा था कि कुछ हफ्ते रहेंगी ताकि मुझे बच्चे के साथ मदद मिल सके। शुरुआत सचमुच अच्छी थी। वह मेरे लिए हल्का खाना बनातीं, तारा के कपड़े तह करतीं और मुझे नहाने या थोड़ी नींद लेने का समय देतीं। लेकिन धीरे-धीरे मदद निगरानी में बदल गई। वह मेरे कपड़ों पर टिप्पणी करतीं, मेरी मां के फोन पर नाराज़ होतीं, तारा को गोद में लेने के तरीके पर टोका करतीं और बार-बार कहतीं कि पहली संतान बेटी हुई है तो अगली बार “घर का वारिस” होना चाहिए। मैं जवाब निगल जाती थी। प्रसव के बाद शरीर अभी पूरी तरह संभला नहीं था, नींद टूट-टूट कर मिलती थी और मैं घर से ही अपने इंटीरियर डिजाइन के कुछ छोटे प्रोजेक्ट दोबारा लेना शुरू कर रही थी। फ्लैट रोहन और मेरे दोनों नाम की रेंट एग्रीमेंट पर था। उस समय रोहन ज्यादा खर्च उठा रहा था, लेकिन मैं भी अपनी बचत और काम से किराए व तारा के खर्च में हिस्सा देती थी। फिर भी सुनीता ऐसे व्यवहार करने लगीं जैसे मैं उनके घर में रहने की अनुमति मांग रही हूं। उस शाम तक समस्या दरवाज़े से शुरू हुई। हर शाम मैं तारा को सोसायटी के छोटे गार्डन में घुमाने ले जाती थी। कई बार लौटने पर मेरी चाबी घूमती, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता क्योंकि अंदर से सेफ्टी लैच लगा होता। पहली बार मुझे पंद्रह मिनट इंतज़ार करना पड़ा। सुनीता ने कहा कि वह बाथरूम में थीं। दूसरी बार लगभग आधा घंटा। उन्होंने कहा कि सो गई थीं। तीसरी बार तारा लिफ्ट से ही भूख के कारण रो रही थी। मैंने घंटी बजाई, फोन किया और साफ सुना कि सुनीता का मोबाइल अंदर बज रहा है। कोई नहीं आया। मैंने रोहन को फोन किया। —थोड़ा इंतज़ार करो, अनन्या। मां सो गई होंगी। —तुम्हारी बेटी भूखी है। —तुम उसे दूध पिला सकती हो। वहीं करा दो। मैं कॉरिडोर की सीढ़ियों के पास बैठ गई, दुपट्टे से खुद को ढकते हुए तारा को दूध पिलाया। वह रोते-रोते हांफ रही थी और मुझे शर्म से ज्यादा अपमान महसूस हो रहा था। करीब चालीस मिनट बाद दरवाज़ा खुला। सुनीता हाथ में फोन लिए खड़ी थीं। —अरे, मुझे तो कुछ सुनाई ही नहीं दिया। उस रात रोहन ने उल्टा मुझसे कहा कि मुझे उनकी उम्र का सम्मान करना चाहिए और छोटी-छोटी बातों को झगड़ा नहीं बनाना चाहिए। अगले दिन मेरी दोस्त काव्या ने कहा: —एक बार भूल हो सकती है। पांच बार तरीका होता है। मैंने प्रवेश वाले हिस्से की ओर कैमरा लगाया, किसी बेडरूम या बाथरूम की तरफ नहीं। अगली सुबह तारा को लेकर बाहर निकली, एक मंज़िल नीचे रुकी और मोबाइल पर लाइव फीड खोली। सुनीता खिड़की पर गईं, मेरी स्ट्रोलर को गेट से बाहर जाते देखा, फिर दरवाज़े तक आईं। उन्होंने लैच लगा दिया। और मुस्कराईं। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए जब उन्होंने कहा कि अब मुझे मेरी जगह समझ आएगी। लेकिन अगले ही पल रोहन कमरे से बाहर आया। तभी मुझे समझ आया कि यह सिर्फ मेरी सास की योजना नहीं थी; मेरा पति इसके बारे में पहले से जानता था।..

“शायद तुम्हें अपने ही समाज की किसी लड़की के साथ रहना चाहिए...” — अपनी पूर्व मंगेतर के हाथों अपमानित होने के बाद सोफे के ...
16/08/2026

“शायद तुम्हें अपने ही समाज की किसी लड़की के साथ रहना चाहिए...” — अपनी पूर्व मंगेतर के हाथों अपमानित होने के बाद सोफे के दूसरे छोर पर रोती हुई युवती ने धीमे से कहा; अर्जुन ने टूटे हुए मन से सिर झुका लिया, क्योंकि वह जानता था कि उसके अतीत का एक अनकहा सच तय कर सकता है कि वह उसके साथ रहेगी... या हमेशा के लिए उसकी जिंदगी से चली जाएगी।

— ₹8 करोड़ के बदले तुम्हें मेरे मालिक के साथ सिर्फ़ एक रात बितानी होगी। उसके बाद तुम्हारे परिवार को फिर कभी पैसे के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
सना मेहरा को कुछ क्षण लगा यह समझने में कि सामने बैठे सूट-बूट वाले आदमी ने वास्तव में क्या कहा था।
21 साल की सना मुंबई के भांडुप इलाके में अपनी माँ कविता और 9 साल के छोटे भाई आरव के साथ किराए के दो कमरों के फ्लैट में रहती थी। सुबह वह दो घरों में सफ़ाई का काम करती, दोपहर में बच्चों को ट्यूशन देती और शाम को कॉलेज जाती थी। उसका सपना शिक्षक बनने का था, लेकिन पिछले छह महीनों से उसके जीवन में सपना नाम की कोई चीज़ बची ही नहीं थी।
कविता को कैंसर था।
सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा था, लेकिन डॉक्टरों ने एक अतिरिक्त आधुनिक थेरेपी की सलाह दी थी जिसके लिए निजी केंद्र, जाँच, दवाइयों, यात्राओं और लंबी देखभाल पर ऐसा खर्च आने वाला था जिसे उनका परिवार उठा नहीं सकता था। उधर तीन महीने का किराया बाकी था और आरव की स्कूल फीस भी जमा नहीं हुई थी।
उस सुबह सना यह सोचकर निकली ही थी कि मकान मालिक से कुछ और समय माँगेगी, तभी विक्रम सहगल उनके दरवाजे पर आया।
— मेरी बेटी बिकाऊ नहीं है — कविता ने कमज़ोर आवाज़ में कहा।
विक्रम ने मेज़ पर एक फाइल रखी।
— इसमें साफ़ लिखा है कि किसी शारीरिक संबंध की बाध्यता नहीं होगी। वह सिर्फ़ एक रात मेरे मालिक के घर रहेगी। चाहे तो वहाँ पहुँचकर तुरंत लौट सकती है। रकम फिर भी दी जाएगी।
यही बात सबसे अधिक डरावनी थी।
कोई आदमी सिर्फ़ किसी अनजान लड़की की मौजूदगी के लिए इतना पैसा क्यों देगा?
सना ने अनुबंध कई बार पढ़ा। उसने फाइल के हर पन्ने की तस्वीर भी ले ली।
फिर उसकी नजर माँ की दवाइयों पर गई। आरव की फटी हुई स्कूल-बैग कुर्सी पर पड़ी थी।
उसने हस्ताक्षर कर दिए।
शाम सात बजे एक काली कार उसे दक्षिण मुंबई के समुद्र की ओर खुलने वाले एक बेहद आलीशान पेंटहाउस तक ले गई।
दरवाजा खुला तो सना ने जिस आदमी की कल्पना की थी, सामने वैसा कोई व्यक्ति नहीं था।
अर्जुन मल्होत्रा 40 साल का था, देश की बड़ी लॉजिस्टिक्स और निवेश कंपनियों में हिस्सेदारी रखता था और उद्योग जगत में उसका नाम जाना जाता था। फिर भी उस शाम उसने महँगा सूट नहीं बल्कि साधारण सफ़ेद शर्ट पहन रखी थी।
और उसने सना के पास आने की भी कोशिश नहीं की।
— सबसे पहले एक बात समझ लो — अर्जुन ने कहा। — पैसे तुम्हारे परिवार को भेज दिए गए हैं। इसके बदले तुम्हें मुझे कुछ नहीं देना।
— तो आपने मुझे बुलाया क्यों?
अर्जुन ने उत्तर देने से पहले पानी का गिलास उठाया।
— क्योंकि मैं यह जानना चाहता था कि एक रात ऐसी कैसी होती है जिसमें घर में कोई दूसरा इंसान हो।
सना को लगा उसने गलत सुना है।
उन्होंने साथ खाना खाया। अर्जुन ने उसके कॉलेज, आरव और उसके शिक्षक बनने के सपने के बारे में पूछा। फिर रात बढ़ी तो उसने अपनी कहानी बतानी शुरू की।
उसकी माँ की मृत्यु तब हो गई थी जब वह 8 साल का था। उसके पिता ने उसे यह विश्वास दिलाते हुए बड़ा किया कि प्रेम आदमी को कमजोर बनाता है और हर रिश्ता अंततः पैसे या स्वार्थ पर आकर टूटता है।
18 साल की उम्र में अर्जुन ने पहली बार किसी लड़की पर भरोसा किया था। बाद में उसे पता चला कि वह उसके परिवार के संपर्कों और पैसे तक पहुँच पाने के लिए उसके करीब आई थी।
कुछ साल पहले परिवार के दबाव में उसकी सगाई हुई। वह रिश्ता भी तब खत्म हो गया जब अर्जुन ने अपनी मंगेतर को अपने बिज़नेस पार्टनर के साथ संबंध रखते और कंपनी की गोपनीय जानकारी साझा करते पकड़ा।
उसके बाद उसने किसी को अपने करीब नहीं आने दिया।
— इसलिए आपने किसी लड़की को पैसे देकर बुलाया?
अर्जुन ने शर्म से सिर झुका लिया।
— मुझे लगा खरीदी हुई ईमानदारी झूठे प्यार से कम खतरनाक होगी।
सना का गुस्सा अचानक कम हो गया।
रात के लगभग तीन बजे दोनों खिड़की के पास बैठे मुंबई की रोशनी देख रहे थे।
अर्जुन ने पहली बार उसकी ओर हाथ बढ़ाया, मगर बीच में ही रोक लिया।
— क्या मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूँ?
सना ने चुपचाप अपना हाथ आगे कर दिया।
अर्जुन की उँगलियाँ काँप रही थीं।
— आप मुझसे डर रहे हैं?
उसके चेहरे पर एक उदास मुस्कान आई।
फिर उसने ऐसी बात कही जिसकी सना ने कल्पना भी नहीं की थी।
— सना, मैं 40 साल का हूँ… और आज तक किसी महिला के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाया। मैं अब भी वर्जिन हूँ।

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“हमारा बेटा नहीं बचा” — प्रसव के बाद मेरा हाथ थामते हुए मेरे पति ने कहा; कुछ ही घंटों बाद मुझे पता चला कि जब मैं अस्पताल...
16/08/2026

“हमारा बेटा नहीं बचा” — प्रसव के बाद मेरा हाथ थामते हुए मेरे पति ने कहा; कुछ ही घंटों बाद मुझे पता चला कि जब मैं अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थी, वह उस औरत के साथ एक नई ज़िंदगी शुरू करने का जश्न मना रहा था जिसे मैं अपनी सबसे अच्छी दोस्त मानती थी—लेकिन उस धोखे के पीछे उसी अस्पताल में छिपी एक और भी भयानक सच्चाई थी।

— अगर वह प्रसव के बाद बच भी गई, तो बाद में देख लेंगे। आज रात सबसे ज़रूरी है कि बच्चा उसके पास न पहुँचे।
दिल्ली के एक बड़े निजी अस्पताल के प्रसूति विभाग में भर्ती अनन्या मेहरा ने यह वाक्य दवा-कक्ष के आधे खुले दरवाज़े से सुना। अगली ही क्षण तेज़ प्रसव पीड़ा ने उसके पूरे शरीर को मोड़ दिया, लेकिन वे शब्द उसके दिमाग़ में अटक गए।
अनन्या खुद स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ रह चुकी थी। शादी के बाद उसने अस्पताल की नौकरी छोड़कर अपने पिता द्वारा स्थापित हेल्थकेयर फाउंडेशन का काम संभाल लिया था। इसलिए वह मॉनिटर की बदलती धड़कन, नर्सों की घबराई नज़रें और बिना कारण बदली जा रही दवाओं को समझती थी।
एक बात सबसे अधिक अजीब थी—उसका पति अर्जुन मल्होत्रा वहाँ नहीं था।
आठ साल की शादी में अर्जुन ने शायद ही कभी किसी बड़े पारिवारिक अवसर को छोड़ा था। फिर उसने इसी अस्पताल में प्रसव कराने पर इतना ज़ोर क्यों दिया था और अब सबसे ज़रूरी रात में गायब क्यों था?
डॉ. नंदिनी राव तेज़ी से कमरे में आईं। उन्होंने सलाइन के पास रखी दवा की शीशी उठाई और तुरंत नर्स से पूछा:
— यह डोज़ किसने लिखी?
नर्स ने डरते हुए बताया कि निर्देश अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. विक्रम सहगल के खाते से आए थे।
नंदिनी ने दवा रोक दी।
जाँच करते समय वह अनन्या के कान के पास झुकीं।
— जब तक मैं यहाँ हूँ, कोई भी तुम्हें अतिरिक्त सेडेटिव नहीं देगा। जागती रहो।
उसी समय दक्षिण दिल्ली के एक आलीशान बैंक्वेट हॉल के निजी कमरे में अर्जुन शीशे के सामने अपनी शेरवानी ठीक कर रहा था।
उसके सामने खड़ी थी काव्या सूद—अनन्या की कॉलेज के दिनों से सबसे करीबी दोस्त।
कानूनी रूप से अर्जुन अनन्या से विवाहित था, इसलिए वह काव्या से वैध विवाह नहीं कर सकता था। लेकिन उस रात दोनों ने परिवार के चुने हुए लोगों के सामने एक निजी प्रतीकात्मक रस्म रखी थी। साथ ही अर्जुन के वकील नकली अलगाव दस्तावेज़, एक कथित तलाक़ याचिका और ऐसे कॉरपोरेट कागज़ तैयार कर रहे थे जिनसे अनन्या के अक्षम घोषित होते ही काव्या मेहरा-मल्होत्रा फाउंडेशन में उसकी जगह ले सके।
— अगर वह मर गई तो सब आसान होगा — काव्या ने धीरे से कहा।
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
— और अगर नहीं मरी, तो उसे मानसिक रूप से अस्थिर साबित कर देंगे।
उसका फोन बजा।
संदेश छोटा था: “बच्चा पैदा हो गया।”
काव्या ने घबराकर पूछा:
— बच्चा?
— उसकी व्यवस्था हो रही है।
अस्पताल में उसी क्षण नवजात बच्चे का रोना गूँजा।
अनन्या की आँखों से आँसू निकल पड़े।
— आरव...
उसने अपने बेटे के लिए महीनों पहले चुना हुआ नाम फुसफुसाया।
लेकिन बच्चे को मुश्किल से कुछ सेकंड दिखाने के बाद वरिष्ठ नर्स शालिनी उसे नीली चादर में लपेटकर बाहर ले गई।
— उसे कहाँ ले जा रही हैं? — नंदिनी ने पूछा।
कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला।
फिर अनन्या को तेज़ रक्तस्राव शुरू हो गया। डॉक्टरों की आवाज़ें तेज़ हो गईं। दवाएँ, रक्त की थैलियाँ, आदेश—सब कुछ धुँधला पड़ने लगा।
बेहोश होने से ठीक पहले अनन्या ने अपने बेटे की नीली चादर को दरवाज़े के पार गायब होते देखा।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, अर्जुन उसके बिस्तर के पास बैठा था।
उसने अनन्या की उँगलियाँ पकड़ने की कोशिश की।
— हमारा बेटा नहीं बचा।
अनन्या ने हाथ खींच लिया।
अर्जुन के कपड़ों पर किसी और स्त्री के परफ्यूम की खुशबू थी। उसके कुर्ते के कॉलर के पास मेकअप का हल्का निशान भी था। वह खुशबू अनन्या पहचानती थी।
काव्या।
— मैंने आरव को रोते सुना था — अनन्या ने कहा।
डॉ. विक्रम तुरंत बोले:
— भारी रक्तस्राव, एनेस्थीसिया और सदमे के बाद याददाश्त भ्रमित हो सकती है।
— मुझे उसका शरीर दिखाइए।
कमरे में अचानक चुप्पी छा गई।
किसी ने जवाब नहीं दिया।
कुछ घंटों बाद नंदिनी अकेली लौटीं। उन्होंने दरवाज़ा बंद किया और बताया कि अस्पताल के मूल रिकॉर्ड में “जन्म के बाद रोना” और “नियोनेटल ऑब्ज़र्वेशन” दर्ज था। लेकिन आधी रात के बाद रिकॉर्ड बदलकर “जन्म के तुरंत बाद मृत्यु” कर दिया गया।
आरव के नाम से दो अलग-अलग पहचान बैंड भी प्रिंट किए गए थे।
और वह नर्स जिसने बच्चे को बाहर निकाला था, अचानक ड्यूटी से गायब थी।
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
पहली बार उसे अपने बेटे की मौत पर नहीं, उसके जीवित होने की संभावना पर डर लगा।
क्योंकि अगर आरव जीवित था, तो किसी ने उसे केवल उससे छीना नहीं था—किसी ने पहले से तय किया था कि पूरी दुनिया को बताया जाएगा कि वह मर चुका है।..

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