17/12/2025
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और अपने धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसे कारकों के अधीन है, और राज्य सामाजिक सुधारों के लिए धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा सकता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह अधिकार धर्मनिरपेक्षता और मौलिक अधिकारों के साथ संतुलन में रहे। संवैधानिक अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। इसमें अपनी धार्मिक पहचान के अनुसार कपड़े पहनना भी शामिल है।
लोकतंत्र में सत्ता का सबसे पहला धर्म यह होता है कि वह नागरिक की गरिमा की रक्षा करे, न कि उसे मंच पर खड़ा करके अपमानित करे,
लेकिन पटना के उस सरकारी कार्यक्रम में जो हुआ, वह किसी गलती या हल्की-फुल्की हरकत के दायरे में नहीं आता, वह एक ऐसी मानसिकता का प्रदर्शन था, जिसमें सत्ता खुद को हर सीमा से ऊपर समझने लगती है,
एक महिला डॉक्टर, जो अपनी मेहनत, पढ़ाई और योग्यता के बल पर सरकारी सेवा में चुनी गई, मंच पर खड़ी है, उसके सिर पर हिजाब है, जो उसके लिए सिर्फ़ कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान, आस्था और निजता का हिस्सा है, और उसी क्षण, मुख्यमंत्री द्वारा उसका हिजाब खींच लेना, दरअसल उस महिला की व्यक्तिगत सीमा (personal boundary) को सार्वजनिक रूप से रौंद देना है,
यह सवाल यहाँ धर्म का नहीं है, यह सवाल हिजाब का भी नहीं है, यह सवाल है, क्या सत्ता को किसी नागरिक के शरीर, कपड़े और पहचान पर अधिकार है?
अगर यही काम किसी सड़क पर, किसी दफ़्तर में या किसी आम आदमी ने किया होता, तो उसे छेड़छाड़ और अपमान कहा जाता, लेकिन जब यही हरकत सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति करता है, तो उसे अनजाने में हो गया या इरादा नहीं था कहकर हल्का करने की कोशिश की जाती है, यही दोहरा मापदंड लोकतंत्र को खोखला करता है,
इस घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि उस महिला डॉक्टर ने अब सरकारी सेवा ज्वाइन न करने का फैसला किया है,
सोचिए, देश में डॉक्टरों की कमी पर भाषण देने वाली सरकारें, एक डॉक्टर को अपने व्यवहार से सिस्टम से बाहर धकेल देती हैं, यह सिर्फ़ एक नौकरी छोड़ने का मामला नहीं है, यह एक संदेश है कि सिस्टम इतना असुरक्षित है कि एक शिक्षित, प्रोफेशनल डिग्री रखने वाली महिला खुद को उसमें सुरक्षित नहीं महसूस करती,
इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा चुभने वाली चीज़ है, सरकारी चुप्पी, सरकार की तरफ से न माफ़ी मांगी गई, न संवेदना प्रकट की गई, मानो एक महिला की गरिमा कोई महत्व ही न रखती हो,