29/12/2025
सर्द रातों में इंसानियत की साइकिल: शाहजहांपुर का सलमान जो ठिठुरती गायों के लिए जागता है
शाहजहांपुर। जब सर्द रातों में शहर रजाइयों में सिमट जाता है, तब शाहजहांपुर की गलियों में एक साइकिल चलती है—जिसका मकसद न प्रचार है, न राजनीति, बल्कि सिर्फ इंसानियत। इस साइकिल पर सवार हैं सलमान, जो ठंड से कांप रही बेसहारा गायों को राहत देने के लिए हर रात निकल पड़ते हैं।
सलमान अपने खर्चे से बोरे खरीदते हैं और शहर में जहां भी सड़क किनारे ठिठुरती गाय दिखती है, उसे अपने हाथों से ओढ़ाते हैं। कई बार तो वे बोरे को सुई-धागे से वहीं सी भी देते हैं, ताकि ठंड से सही तरह बचाव हो सके। उनका मानना है कि केवल तिरपाल डाल देना काफी नहीं, जब तक सीधे गाय के शरीर को गर्मी न मिले।
गरीबी में पली संवेदना, सेवा में बदली जिंदगी
सदर बाजार थाना क्षेत्र के मोहल्ला लोधीपुर निवासी सलमान एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता मुश्किल से रोज़ी-रोटी चला पाते हैं, लेकिन सलमान ने अभावों के बीच भी करुणा और प्रेम की भाषा सीखी। पढ़ाई पूरी न हो सकी, मगर सेवा को ही उन्होंने अपना जीवन उद्देश्य बना लिया।
सलमान कहते हैं—
“गाय को धर्म में बांटना गलत है। वह किसी एक धर्म की नहीं, इंसानियत की जिम्मेदारी है।”
मजाक से सम्मान तक का सफर
बहादुरगंज क्षेत्र में बीती एक रात सलमान ने सात गायों को ठंड से बचाया। पास ही कुछ लोग कॉफी पीते हुए खड़े थे, जिन्होंने पहले उनका मजाक उड़ाया। लेकिन जब सलमान बिना किसी परवाह के गायों को बोरे पहनाने लगे, तो वही लोग उनके साथ खड़े हो गए और मदद भी की। मजाक सम्मान में बदल गया।
समाज से विरोध, लेकिन हौसले अडिग
सलमान के इस काम पर उनके अपने समुदाय के कुछ लोगों ने नाराजगी भी जताई। यहां तक कि जब उन्होंने अपने घर में गाय पाली, तब भी विरोध झेलना पड़ा। लेकिन सलमान कहते हैं—
“अगर किसी बेजुबान को राहत देना गुनाह है, तो ये गुनाह मैं करता रहूंगा।”
गाय ही नहीं, इंसान की भी सेवा
सलमान सिर्फ पशुओं तक सीमित नहीं हैं। कुछ समय पहले उन्होंने मोहल्ले की गीता देवी के इलाज के लिए गले में पीपा टांगकर भीख मांगी और इलाज कराया। बाद में उनके निधन पर सलमान ने उनकी अर्थी को कंधा दिया और श्मशान घाट तक साथ गए। इस पर भी उन्हें विरोध झेलना पड़ा, लेकिन वे पीछे नहीं हटे।
आस्था का सम्मान, हर धर्म के साथ
करीब छह महीने पहले सोशल मीडिया पर भगवान राम के अपमान की घटना सामने आई थी। सलमान ने उस पर कार्रवाई की मांग को लेकर 15 दिन तक धरना दिया। शुरुआत में मजाक बना, लेकिन बाद में हर धर्म के लोग उनके साथ आ खड़े हुए। यह साबित हुआ कि आस्था की रक्षा के लिए धर्म नहीं, संवेदना चाहिए।
शहर कर रहा सलाम
अब शहर के लोग सलमान को पहचानने लगे हैं। दुकानदार अंकित कहते हैं—
“जो नेता बड़ी बातें करते हैं, वे कहां हैं? सलमान जैसे लोगों को सम्मान मिलना चाहिए। ये दो धर्मों के बीच की दूरी मिटा रहे हैं।”
सलमान जैसे लोग ही असली पहचान हैं
सलमान की कहानी बताती है कि सच्ची सेवा न नाम देखती है, न धर्म। ठंडी रातों में चलती एक साइकिल आज शाहजहांपुर में इंसानियत की पहचान बन चुकी है।