25/12/2025
दीफू दास के पास कोई हथियार नहीं था।
उसके पास केवल उम्मीद थी।
वह सीमा पार कर बांग्लादेश गया—दुश्मन बनकर नहीं, बल्कि जीवन की तलाश में निकले एक मज़दूर के रूप में। लेकिन जहाँ राजनीति ज़हर बन चुकी थी और राष्ट्रवाद को नफ़रत से तौला जाने लगा था, वहाँ उसकी पहचान ही उसका अपराध बन गई।
नेता सुरक्षित मंचों से नारे लगाते रहे। मीडिया चैनलों ने डर फैलाया। आम लोगों को यह सिखाया गया कि अपनी असफलताओं के लिए किसे दोष देना है। और उसी गढ़े गए ग़ुस्से में दीफू दास एक आसान निशाना बन गया—एक नाम, एक चेहरा, एक शरीर, जिस पर राजनीतिक कुंठा उतारी जा सके।
उस रात भीड़ ने हमला किया, और व्यवस्था चुपचाप देखती रही। क़ानून सो गया। इंसानियत गायब हो गई। यह हत्या सिर्फ़ एक इंसान की नहीं थी, बल्कि ज़मीर की भी थी।
सुबह होते ही नेताओं के बयान आ गए, जाँच के वादे किए गए, और ज़िंदगी आगे बढ़ गई—जैसे हमेशा बढ़ जाती है, जब मरने वाला बेआवाज़ और बेबस होता है।
घर पर मातम था, लेकिन दुख़ के पास कोई माइक्रोफ़ोन नहीं था। माँ के आँसू टीवी पर नहीं दिखाए गए। परिवार का दर्द सोशल मीडिया पर ट्रेंड नहीं कर पाया। दीफू दास एक और आँकड़ा बन गया—राजनय, इनकार और राजनीतिक सुविधा के नीचे दबा हुआ।
उसकी मौत ने एक कड़वा सच उजागर कर दिया:
जब राजनीति इंसानों से ज़्यादा सत्ता को चुनती है,
तो सीमाएँ क़त्लगाह बन जाती हैं
और इंसान दुश्मन।
दीफू दास इसलिए नहीं मारा गया क्योंकि वह दोषी था—
बल्कि इसलिए कि नफ़रत को एक शिकार चाहिए था।