30/05/2026
सिंगरौली की जनता यह वीडियो ज़रूर देखे: महान एल्युमिनियम के CSR हेड संजय सिंह का 'ब्रिटिश हुकूमत' जैसा रवैया और मीडिया को जेब में समझने का घिनौना ढोंग
विशेष खोजी रिपोर्ट (बरगवां/सिंगरौली):
आज 30 मई 2026 को जब देश में हिंदी पत्रकारिता अपने गौरवशाली और संघर्षपूर्ण इतिहास के 200 वर्ष पूरे कर रही है, तब बरगवां की जमीनी हकीकत चौथे स्तंभ के चीरहरण की एक नई और शर्मनाक दास्तान बयां कर रही है। पैसे, सत्ता और रसूख के नशे में चूर 'महान एल्युमिनियम कंपनी' के सीएसआर हेड (CSR Head) संजय सिंह द्वारा आयोजित किया गया तथाकथित 'मीडिया सम्मान समारोह' दरअसल कोई सम्मान नहीं, बल्कि विशुद्ध पत्रकारिता को अपनी चौखट पर झुकाने का एक घटिया कॉरपोरेट प्रोपेगैंडा है।
यह आयोजन साबित करता है कि इस कंपनी और इसके अधिकारियों को सच दिखाने वाले, जनता की आवाज उठाने वाले और निष्पक्ष पत्रकार बिल्कुल पसंद नहीं हैं। इन्हें केवल और केवल अपने टुकड़ों पर पलने वाले वो चाटुकार पसंद हैं, जो इनके द्वारा जारी की गई झूठी और प्रायोजित 'प्रेस विज्ञप्तियों' (प्रेस नोट) को बिना किसी सवाल के ज्यों का त्यों छापते रहें।
ऑन-कैमरा औकात दिखाने वाले संजय सिंह के मुखारविंद से 'सम्मान' का ढोंग
इस कंपनी के पाखंड को समझने के लिए कुछ दिन पहले की उस खौफनाक और दुखद घटना को याद करना जरूरी है, जब महान एल्युमिनियम कंपनी के प्रभाव क्षेत्र में जगलाल बियार की पत्नी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई थी। जब स्थानीय पत्रकार इस मौत की जमीनी हकीकत, कंपनी की लापरवाही और पीड़ित परिवार के आंसू दिखाने ग्राउंड पर पहुंचे, तो कंपनी के गेट पर उनके स्वागत में लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए सीएसआर हेड संजय सिंह खुद खड़े थे।
इस पूरी बदतमीजी का साक्षात प्रमाण वीडियो फाइल "1008182164.mp4" में साफ तौर पर दर्ज है, जिसे सिंगरौली की जनता को देखना बेहद जरूरी है ताकि वे इस कॉरपोरेट का असली चेहरा पहचान सकें। वीडियो "1008182164.mp4" में संजय सिंह का कॉरपोरेट अहंकार सातवें आसमान पर दिखाई दे रहा है। वे कैमरे के सामने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर उंगली तानते हैं, उन्हें डराते हैं, धमकियां देते हैं और वीडियो बंद करने का हुक्म सुनाते हैं। उनके मुखारविंद से अहंकार में डूबा यह तानाशाही फरमान निकलता है:
«"आपकी मीडिया वहीं तक है जहां तक हमारी प्राइवेसी भंग न हो।"»
संजय सिंह का यह आचरण किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधिकारी का नहीं, बल्कि 'ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी' के उन दलालों और जमींदारों जैसा है जो भारतीयों को अपनी जूती की नोक पर रखते थे। यह मीडिया को डराने, दबाने और नियंत्रित करने का एक नग्न प्रयास था, ताकि पत्रकार इनसे पूछकर कैमरे खोलें और इनसे भीख मांगकर सच लिखें।
और आज सबसे बड़ा तमाशा देखिए! वही ऑन-कैमरा बदतमीजी करने वाले संजय सिंह, आज एक कागज का टुकड़ा (प्रशस्ति पत्र) थमाकर उसी मीडिया को 'सम्मानित' करने का स्वांग रच रहे हैं। कॉरपोरेट सोच यह मान चुकी है कि पैसे के दम पर सब कुछ खरीदा जा सकता है—कल जिस मीडिया को दुत्कारा था, आज उसे एक वातानुकूलित कमरे में समोसे-बिस्कुट और कागज के टुकड़े देकर अपनी जय-जयकार करवाई जा सकती है।
चाटुकारों की फौज और विशुद्ध पत्रकारिता का स्वाभिमान
महान एल्युमिनियम और संजय सिंह जैसे लोग कभी भी उस रीढ़ वाले पत्रकार का सम्मान नहीं कर सकते जो इनके प्रदूषण, आदिवासियों के विस्थापन और मजदूरों के शोषण पर खोजी रिपोर्टिंग करता है। इन्हें सिर्फ वो 'स्टेनोग्राफर' पसंद हैं जो इनके पीआर (PR) एजेंट बनकर काम करते हैं।
जो लोग आज इस कंपनी की चौखट पर जाकर खुद को सम्मानित महसूस कर रहे हैं और तालियां बजा रहे हैं, उन्हें अपने जमीर से पूछना चाहिए कि क्या वे पत्रकारिता के 200 साल के इतिहास को कलंकित नहीं कर रहे? जो मीडिया घराना अपने ही साथियों के अपमान और जगलाल बियार की पत्नी की मौत के सच को चंद कागजों के टुकड़ों के लिए भूल गया, वह पत्रकारिता के नाम पर एक धब्बा है।
«विशुद्ध पत्रकारिता सम्मान की भूखी नहीं होती:
जो पत्रकारिता सच में जमीन पर होती है, जो जनता के हक के लिए लड़ती है और सत्ता व कॉरपोरेट की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछती है, वह किसी संजय सिंह या किसी प्राइवेट कंपनी के खैरात में बटने वाले 'सम्मान' की भूखी नहीं होती। निष्पक्ष पत्रकार का असली सम्मान जनता का अटूट विश्वास है, जो किसी तिजोरी के पैसों से नहीं खरीदा जा सकता।»
क्या कॉरपोरेट कानून से ऊपर है? (मीडिया की असीमित शक्ति)
संजय सिंह और महान एल्युमिनियम के मैनेजमेंट को यह बात कान खोलकर सुन लेनी चाहिए कि वे भारत देश के भीतर व्यापार कर रहे हैं, किसी गुलाम टापू पर नहीं। इस देश में लोकतंत्र है और संविधान के नियम इन पर भी पूरी तरह लागू होते हैं।
1. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a): भारतीय संविधान हर नागरिक और मीडिया को अभिव्यक्ति और सूचना की स्वतंत्रता देता है। यदि किसी प्राइवेट कंपनी के भीतर कोई हादसा, मौत या अवैध गतिविधि होती है, तो वहां जाकर सच दिखाने की पूर्ण रूप से कानूनी शक्ति मीडिया और देश के आम नागरिक को प्राप्त है।
2. प्राइवेसी का बहाना और सुप्रीम कोर्ट का डंडा: देश की सर्वोच्च अदालत ने बार-बार साफ किया है कि जहां लोकहित (Public Interest) या मानवाधिकार का मामला हो, वहां कोई भी प्राइवेट सेक्टर 'निजी संपत्ति' या 'प्राइवेसी' का बोर्ड लगाकर मीडिया को सच दिखाने और वीडियो/साक्ष्य बनाने से नहीं रोक सकता।
3. सीएसआर (CSR) कोई दान नहीं, जनता का अधिकार है: संजय सिंह जिस सीएसआर विभाग के हेड बनकर अकड़ दिखा रहे हैं, वह कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के तहत आता है। इसके तहत कंपनियों को अपने मुनाफे का 2% स्थानीय क्षेत्र के विकास (स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण) पर खर्च करना ही पड़ता है। यह जनता का हक है, कंपनी का कोई अहसान नहीं। यदि इस फंड में कोई हेराफेरी होती है, तो मीडिया को इस पर तीखे सवाल उठाने का पूरा अधिकार है।
कलम की ताकत या कॉरपोरेट की गुलामी?
हिंदी पत्रकारिता दिवस के इस ऐतिहासिक मोड़ पर महान एल्युमिनियम के बंद कमरों में चल रहा यह 'सम्मान का नाटक' स्थानीय मीडिया के चरित्र की परीक्षा है। सिंगरौली की जनता को वीडियो "1008182164.mp4" देखकर यह समझना होगा कि कौन उनके हक के लिए खड़ा है और कौन कॉरपोरेट का गुलाम बन चुका है। संजय सिंह जैसे लोग यह मुगालता पालना बंद कर दें कि वे अपनी बदतमीजी को पैसों और प्रशस्ति पत्रों के नीचे दफन कर देंगे।
लोकतंत्र में असली सर्टिफिकेट जनता देती है, किसी कॉरपोरेट का सीएसआर हेड नहीं। अब फैसला सिंगरौली और बरगवां के पत्रकारों को करना है कि उन्हें जनता की बेबाक और दहाड़ती हुई आवाज बनना है या फिर इस 'ब्रिटिश मानसिकता' वाले तंत्र के आगे नस्तक होकर उनकी प्रेस विज्ञप्ति छापने वाला गुलाम।
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