06/12/2025
भाजपा संगठन : ताक़त, चुनौतियाँ और ज़मीनी हकीक़त का आईना
महमूदाबाद विधानसभा में भाजपा के टिकट अभ्यर्थियों की संख्या भले ही एक दर्जन के आसपास हो, परन्तु संगठन की गहराई, संरचना और वास्तविक शक्ति को समझ पाना हर किसी के बूते की बात नहीं। संगठन केवल पदाधिकारियों या बड़े नेताओं की परिक्रमा के सहारे नहीं चलता—संगठन उन हज़ारों कार्यकर्ताओं की धड़कनों से जीवित रहता है, जिनकी निष्ठा और मेहनत पार्टी की जीत का मार्ग प्रशस्त करती है।
संगठन की बुनियाद इतनी विशाल… पर सक्रियता कहाँ?
चार मंडलों की संरचना, प्रत्येक में 16 सदस्यीय सक्रिय कार्यकारिणी, 60 के लगभग सेक्टरों में सेक्टर प्रमुख व संयोजक, 400 से अधिक बूथ अध्यक्ष, और लगभग 13,000 पन्ना प्रमुख… इतना विशाल नेटवर्क किसी भी राजनीतिक दल को मजबूत आधार देता है। इसके अलावा मोर्चा, प्रकोष्ठ और विभिन्न इकाइयाँ मिलाकर लगभग 18,000 से 20,000 कार्यकर्ता एक विधानसभा में समाहित होते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इन सभी को वह महत्व मिला, जिसकी वे अपेक्षा रखते हैं?
2014 से 2022 के बीच नेतृत्व के अभाव में संगठन दिशाहीन रहा। 2022 में नेतृत्व भले सुधरा, पर संगठन का महत्व लगभग शून्य हो गया। कई पन्ना प्रमुख कागज़ों तक सीमित रह गए, और बड़ी संख्या में बूथ अध्यक्ष केवल नाम के रह गए।
टिकट चाहने वालों के लिए सबसे बड़ी सीख
टिकट के दावेदारों को समझना होगा कि राजनीति केवल बड़े नेताओं की कृपा भर से नहीं चलती। टिकट भले मिल जाए, लेकिन जीत दिलाने का काम उन्हीं 18-20 हजार कार्यकर्ताओं का है, जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
अगर अभ्यर्थी वास्तव में दावेदार हैं, तो उन्हें—
बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से मेलजोल बढ़ाना होगा
अपने प्रति विश्वास और स्वीकार्यता पैदा करनी होगी
यह महसूस कराना होगा कि जीत के बाद भी वे उनके साथ खड़े रहेंगे
नेताओं के इर्द-गिर्द घूमने से टिकट मिल भी जाए,
पर जीत दिलाने वाले चेहरे तो यही जमीनी कार्यकर्ता होते हैं।
निर्देशक समिति की अनदेखी क्यों?
भाजपा की सांगठनिक व्यवस्था में निर्देशक समिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें वे वरिष्ठ कार्यकर्ता शामिल होते हैं जिन्होंने संगठन के निर्माण में महती भूमिका निभाई है। उनका मार्गदर्शन नियमित रूप से लिया जाए, यह बेहद आवश्यक है।
ऐसी समिति की सक्रियता न केवल संगठन को जीवंत बनाती है, बल्कि नए कार्यकर्ताओं और दावेदारों को दिशा भी देती है।
जनता अब ‘सजग’ ही नहीं… ‘निर्णायक’ भी है
2024 ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनता मनमाने प्रत्याशियों को स्वीकार नहीं करेगी।
इस बार मतदाताओं ने दबकर नहीं बल्कि सोचकर मतदान किया।
उन्हें विकल्प चाहिए—और सही विकल्प न देने पर वे दिशा बदलने से नहीं हिचकते।
पद की तड़प और संगठन की सीख
राजनीति में पद उसी प्रकार होता है,
जैसे पुरुष के लिए पत्नी और महिला के लिए पति—
कुछ समय बाद उसका उत्साह सामान्य हो जाता है,
पर असली पीड़ा तब होती है जब यह पद छिन जाता है।
कई लोग पद जाने के बाद खुद को शून्य मानने लगते हैं, डिप्रेशन में चले जाते हैं।
इसलिए जरूरी है कि—
राजनीति पद की नहीं, स्वीकृति की राजनीति बने।
और यह स्वीकृति केवल जनता और कार्यकर्ताओं से ही मिलती है,
उच्च नेतृत्व की चापलूसी से नहीं।
अंतिम संदेश
भाजपा का संगठन किसी भी एक व्यक्ति की सफलता का साधन नहीं,
यह लाखों कार्यकर्ताओं की तपस्या से निर्मित व्यवस्था है।
अभ्यर्थियों को चाहिए कि—
जमीनी कार्यकर्ताओं का सम्मान करें
बूथ से लेकर मंडल तक संपर्क बनाएँ
अपने लिए विश्वास का आधार तैयार करें
और संगठन के मूल सिद्धांतों को समझें
क्योंकि चुनाव केवल टिकट पर नहीं जीते जाते,
चुनाव कार्यकर्ताओं की इच्छा और जनता की स्वीकार्यता से जीते जाते हैं। 🙏