24/03/2026
पहचान, न सुविधाएं, न सहारा—विशेष जनजाति की महिला आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रही है
हमर उत्थान सेवा समिति ने उठाए सवाल:- विशेष जनजाति के लिए बनी योजनाएं आखिर जरूरतमंदों तक क्यों नहीं पहुंच रहीं ?
सूरजपुर जिले के प्रेमनगर विकासखंड के ग्राम पंचायत महोरा के खेखड़ानाला नालापारा में जीवन आज भी संघर्ष की धीमी और थकी हुई सांसों में चल रहा है। यह पण्डो जनजाति की बस्ती है, जिसे कागजों में विशेष संरक्षित जनजाति कहा जाता है और जिसके विकास के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है।
इसी बस्ती में रहने वाली उर्मिला पण्डो की जिंदगी इस सच्चाई को साफ-साफ बयां करती है। उम्र के इस पड़ाव पर, जब शरीर को सहारे की जरूरत होती है, उर्मिला अब भी रोज संघर्ष करने को मजबूर हैं। चेहरे पर उभरी झुर्रियां, धूप से झुलसी त्वचा और कमजोर पड़ते हाथ-पांव उनके बीते जीवन की कठिनाइयों की गवाही देते हैं, लेकिन हालात ऐसे हैं कि रुकना उनके लिए संभव नहीं।
कभी गांव की निर्वाचित पंच रह चुकी उर्मिला आज पूरी तरह अकेली हैं। माता-पिता और पति का साया उनके सिर से उठ चुका है। बहनें अपने-अपने घर बसाकर अलग हो चुकी हैं। उनके हिस्से में बचा है एक खाली घर और जीवन का लंबा संघर्ष।