21/11/2025
1962 का भारत चीन युद्ध भारत की घोर पराजय और चीनी विश्वासघात के रूप में इतिहास में दर्ज है पर इस युद्ध से जुड़ी एक घटना और उससे जुड़े योद्धा मेजर "शैतानसिंह" की कहानी बताती है कि भारतीय सैनिक अपने राष्ट्र की रक्षा के लिये किस स्तर तक संघर्ष करने पर आमादा हो जाते है, अपने प्राणोत्सर्ग कर देते है पर मैदान से पीठ दिखाकर नहीं भागते...।
1962 में चीन के साथ विवाद आक्साई चिन सीमा से शुरू हुआ था। चुशूल सेक्टर सीमा से बस पन्द्रह मील दूर था और वह क्षेत्र लद्दाख की सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। जून 1962 में चीन-भारत युद्ध के दौरान 13वीं कुमायूं बटालियन चुशूल सेक्टर में तैनात थी। उस ब्रिगेड की कमान ब्रिगेडियर टी.एन. रैना संभाल रहे थे। अम्बाला से जब यह ब्रिगेड जम्मू कश्मीर पहुँची तो उन्होंने पहली बार बर्फ देखी। इसके पहले उन्हें कभी पर्वतीय सीमा पर तैनात नहीं किया गया था पर अब उन्हें दुनिया के सबसे ज्यादा बर्फीले और उंचे क्षेत्र में लड़ना था।
उनके सामने चीन की सेना सिंकियांग से थी, जो ऐसे युद्ध क्षेत्र में लड़ने की अभ्यस्त थी। चीन की सेना के पास सभी #आधुनिक_शस्त्र तथा भरपूर गोला-बारूद था, जबकि भरतीय सैनिकों के पास एक बार में एक गोली की मार करने वाली राइफलें थीं, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद बेकार घोषित कर दी गई थीं। मौसम की मार और हथियारों की कमी के बावजूद 13 कुमाँयू की 'सी कम्पनी' के मेजर #शैतान_सिंह आत्मविश्वास से भरपूर थे कि उनके "रेजांग ला" के मोर्चे पर अगर दुश्मन हमला करता है तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। चीन की ओर से सब तरफ आटोमेटिक बन्दूकों तथा मोर्टार की घेरा बन्दी की जा चुकी थी और वे विजय को लेकर आश्वस्त थे किंतु जब चीनी फौजों ने अचानक हमला किया तो उन्हें भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। युद्ध भूमि दुश्मन सैनिकों की लाशों से भर गई। जब चीनी दुश्मन का यह हमला नाकाम हो गया तो उसने #रेजांग_ला_पर_मोर्टार_तथा_रॉकेटों_से बंकरों पर गोलीबारी शुरू कर दी। ऐसे में किसी भी बंकर के बचे रह जाने की सम्भावना नहीं थी फिर भी मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी ने वहाँ से पीछे हटने का नाम नहीं लिया।
जब सामने से मोर्टार के हमले ने आगे की सैन्य पंक्ति को साफ कर दिया, तब चीनी फौजों ने अपना ध्यान प्लाटून के बीच में केन्द्रित किया। मेजर शैतान सिंह पूरी तरह से घिर गए थे।
मेजर शैतान सिंह का शौर्य और पराक्रम चीन के ख़िलाफ़ लड़ते हुए रेजांग ला मोर्चे पर अंतिम बार 18 नवम्बर 1962 को नज़र आया था।
इस बटालियन में ज्यादातर सैनिक #हरियाणा_के_रेवारी_गांव_के_थे।
गौरतलब है कि चीन के 5000 से ज्यादा सैनिकों के जवाब में उस समय भारत के महज 120 सैनिक ही मौजूद थे।
लेकिन दुश्मन की परवाह न करते हुए इंडियन आर्मी ने जबरदस्त आक्रमण करने की ठानी और थोड़ी ही देर में दोनों तरफ से भयंकर गोलीबारी होने लगी। सैनिकों की तादाद के साथ ही चीन के पास आधुनिक हथियारों की भी कोई कमी नहीं थी, लेकिन भारतीय सैनिक जानते थे कि दुश्मन का डटकर मुकाबला करना ही एकमात्र उपाय है न कि पीठ दिखाकर भागना...।
गोला-बारूद खत्म होने के बाद भी भारत के जवानों ने 1300 चीनी सैनिकों को मार गिराया और ये काम मेजर शैतान सिंह की देख-रेख में अंजाम दिया गया। कई जवानों ने तो अपने हाथों से इन सैनिकों को मार गिराया।
#भारतीय_गुप्तचर_एजेंसी_रॉ (रिसर्च एंड एनेलिसेस विंग) के पूर्व अधिकारी "आरके यादव" ने अपनी किताब '‘मिशन आर एंड डब्लू’' में "रेज़ांग ला" की लड़ाई का वर्णन करते हुए लिखा है कि इन बचे हुए जवानों में से एक #सिंहराम ने बिना किसी हथियार और गोलियों के चीनी सैनिकों को पकड़-पकड़कर मारना शुरु कर दिया।
मल्ल-युद्ध में माहिर कुश्तीबाज सिंहराम ने अनेक चीनी सैनिक को बाल से पकड़ा और पहाड़ी से टकरा-टकराकर मौत के घाट उतार दिया। इस तरह से उन्होंने दस चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।
भारत के इन 120 योद्धाओं में से 114 जवान शहीद हो गए, पांच जवानों को चीन ने युद्ध कैदी के तौर पर गिरफ्तार कर लिया। हालांकि ये जवान बाद में रिहा होकर बच निकलने में कामयाब रहे। वहीं ैनिक_को_मेजर_शैतानसिंह_ने_वापस_भेज_दिया, ताकि वह पूरे घटनाक्रम को दुनिया के सामने बयान कर सके।
मेजर शैतान सिंह युद्ध के दौरान जब अपने सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए एक पलटन से दूसरी पलटन की तरफ घूम रहे थे, तभी चीनी सेना की फायरिंग से घायल हो गए लेकिन घायल होने के बावजूद उन्होंने लड़ना जारी रखा, जिसके बाद चीनी सेना ने उन पर मशीन गन से हमला कर दिया...।
चीन की सेना से मेजर शैतान सिंह को बचाने के लिए एक सैनिक ने उनके जख्मी शरीर को अपने शरीर के साथ बांधा और पहाड़ों में लुढ़कते हुए उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर लेटा दिया, जहां बाद में उनकी मृत्यु हो गयी।
फरवरी 1963 में मेजर शैतान सिंह का शरीर उसी जगह पाया गया, जहां वो सैनिक उनको लिटाकर गया था, तब तक उनका #पूरा_शरीर_बर्फ_में_जम_चुका_था पर #मेजर_मौत_के_बाद_भी_अपनी_रायफल_को_मजबूती_से_थामे_हुए_उसी_स्थान_पर_डटे_हुऐ_थे। मेजर शैतान सिंह को अपने अद्भुत साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए शहीद होने के बाद परमवीर चक्र से नवाज़ा गया.
उल्लेखनीय है कि "लता मंगेशकर" द्वारा गाए अमर देशभक्ति गीत ेरे_वतन_के_लोगों को लिखने की प्रेरणा भी "कवि प्रदीप" को मेजर शैतान सिंह और उनके बहादुर साथियों के बलिदान से ही मिली थी...आज वहीं मेजर शैतानसिंह के बलिदान का #रेजांग_ला_दिवस_है।
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१०८ॐकार न्युज