Indigenous KrantiYoddha

Indigenous KrantiYoddha “Indigenous is future of this world.” Bhil Adivasi Community
Indigenous Environmental Artist & Activist.

22/02/2026

कानून का खेल
कितना अद्भुत खेल है —
जब हम बोलें तो अपराध,
जब वो बोलें तो आदेश।

हम चलें तो उल्लंघन,
वो चलें तो परंपरा।

सच पूछो तो
कानून की आँखों पर पट्टी नहीं,
पट्टी पर आँखें बंधी हैं।

यहाँ न्याय भी बोली लगाता है,
और सच भी फ़ाइल बन जाता है।

कलम उनकी तलवार है,
और हमारी कलम — सबूत माँगती है।

— हेमन्त डूंगात # #

18/02/2026

Part –2

वे कहते — खामोश रहो, यही कानून है,
जंगल कहता हे — सच बोलना ही खून है।

वे बंदूक से डर लिखना चाहते हैं,
हम पत्तों से इतिहास बताते हैं।

वे हमें मिटाकर नक्शा बनाना चाहते हैं,
हम जड़ों से ज़मीन हिलाना जानते हैं।

—हेमन्त डूंगात

{Forest, FRA, Displacement, Devlopment in Forest for mining, Adivasi Land, Indigenous Rights, Government, Force, Poem }

16/02/2026

वे कहते हैं विकास,
हम सुनते हैं विस्थापन—
एक ही शब्द
दो अलग दुनिया में जन्म लेता है।
उनकी ज़ुबान पर सपना होता है,
हमारी आँखों में उजड़ता घर,
और सच बीच में खड़ा चुप रहता है।

—हेमन्त डूंगात

{ Development, Displacement, Indigenous, Indigenous lands, Adivasi Land Rights, Poem, India }

आदिवासियों का भूत शायद बेहतरीन ओर खूबसूरत रहा होगा, मगर वर्तमान नहीं, वैसे से तो प्रकृति का नियम ही संघर्ष है, मगर आदिवा...
21/01/2026

आदिवासियों का भूत शायद बेहतरीन ओर खूबसूरत रहा होगा, मगर वर्तमान नहीं, वैसे से तो प्रकृति का नियम ही संघर्ष है, मगर आदिवासियों का वर्तमान ना बेहतर हे, ना खुशहाल है, क्योंकि भारत के सिस्टम ओर इस दुनिया में जिंदा बने रहने के लिए कोशिश कर रहा है।

हमें राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक ओर वैचारिक सभी शब्दों स्वायत्तता चाहिए, ना कि दोहरापन...

10/12/2025

हम आज ऐसे दौर में हैं जहाँ लगातार संस्कृतियों और सामाजिक प्रथाओं के मेल से हमारी पहचानें भी धीरे–धीरे बदलती जा रही हैं। कई बार यह मिश्रण इतना बढ़ जाता है कि हमारी अपनी पारंपरिक रूढ़ियाँ भी हमें पहचान नहीं पातीं।

हाल ही में एक सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में महिला के अधिकारों के आधार पर फैसला सुनाया गया। सामान्य समाज के कई पुरुषों ने इसका विरोध भी किया। लेकिन आदिवासी समाज की स्थिति इससे अलग है।

इतिहास में कई आदिवासी समुदायों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था की झलक मिलती है—जहाँ वंश, संपत्ति और सामाजिक अधिकारों में महिलाओं की भूमिका प्रमुख थी।

लेकिन जैसे-जैसे आदिवासी समुदायों का संपर्क पुरुष-प्रधान धर्मों और परंपराओं से बढ़ा, उनकी अपनी रूढ़ियाँ और व्यवस्था प्रभावित हुईं।

आज स्थिति यह है कि कई आदिवासी समुदाय भी पितृसत्तात्मक ढांचे की ओर झुक चुके हैं, जिसके कारण महिलाएँ अधिकारों की लड़ाई में पीछे रह जाती हैं और वो खाई साफ दिखती हैं।

हाल ही में छत्तीसगढ़ में यह निर्णय आया कि पिता की ज़मीन पर बेटी का भी अधिकार होगा।

कई आदिवासी मानते हैं कि यह उनकी पारंपरिक रूढ़ियों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि विरासत का तरीका उनके समुदाय के अपने नियमों पर आधारित होता है।

लेकिन आज जब आदिवासी समुदाय भी पितृसत्ता की ओर झुक चुका है, यानि आज पितृसत्ता जिस के कारण पुरुष स्थिर रहता हैं। अगर इसकी जगह मातृसत्ता होती तो इसमें महिला स्थिर होती। उन्हें वो सब मिलता जो आज पुरुषों को मिलता हैं।

अगर, महिलाएं दूसरे परिवार में शादी के बाद खुद के घर को नियंत्रित करेगी,तो उससे ना सिर्फ उसकी घर की व्यवस्था बिगड़ेगी बल्कि दोनों घरों में सम्बन्ध खट्टे रहेंगे। यह बात मातृसत्ता ओर पितृसत्ता दोनों में लागू होती हैं।

हमने स्वयं ही समय के साथ अपनी कई परंपराओं को कमजोर कर दिया है—कभी सुविधा के लिए, कभी दूसरे समाजों की नकल में। ऐसे में स्वाभाविक है कि अदालतें भी मिश्रित और आधुनिक परिस्थितियों को देखते हुए फैसले देंगी।

अगर हम पूरी तरह स्वतंत्र और सांस्कृतिक रूप से मज़बूत रहते, तो हमारी रूढ़ियों का सम्मान भी अधिक होगा।

ST का दर्जा— धर्म पर नहीं, विशेषताओं पर आधारित
कुछ भ्रम दूर करना भी ज़रूरी है। ST (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा धर्म आधारित नहीं होता।
ST की पहचान निम्न आधारों पर तय होती है:
विशिष्ट जनजातीय/आदिम विशेषताएँ, भौगोलिक पृथकता, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराएँ आदि।

इसके विपरीत, SC (अनुसूचित जाति) का दर्जा कई बार धर्म बदलने पर बदल सकता है। जैसे—ईसाई या मुस्लिम बनने पर कई मामलों में SC दर्जा मान्य नहीं रहता।

लेकिन ST दर्जा धर्म परिवर्तन से समाप्त नहीं होता, क्योंकि यह सांस्कृतिक और सामाजिक विशेषताओं पर आधारित है,धर्म पर नहीं।

अगर समुदाय अपनी परंपराओं और संस्कृति को मजबूत रखता है, तो बाहरी हस्तक्षेप कम होगा।
लेकिन जब हम स्वयं ही मिश्रण की प्रक्रिया में अपनी पहचान कमजोर कर रहे है, तो न्याय और फैसले भी उसी मिश्रण का प्रतिबिंब बनकर भविष्य में सामने आएंगे।

Indigenous KrantiYoddha

एक घटना ने इस लेख को लिखने पर मजबूर कर दिया कि जो आदिवासी हजारों वर्षों से अपने दम प्रकृति में संघर्ष कर जिन्दा रहे, आज ...
06/11/2025

एक घटना ने इस लेख को लिखने पर मजबूर कर दिया कि जो आदिवासी हजारों वर्षों से अपने दम प्रकृति में संघर्ष कर जिन्दा रहे, आज वो सरकारों से बीज ओर अनाज की मांगने को मजबूर हो गए... इसके लिए सरकारों, प्रशासनों से हाथाजोड़ी, ज्ञापन दे रहे हैं।

आखिर क्या वजह रही कि आदिवासियों की आज यह स्थिति हो गई है..?

असल में देखा जाए तो आज अधिकतर आदिवासियों के पास खुद के खाने के लिए शुद्ध अनाज तक नहीं है, मगर बेचने के लिए भरपूर अनाज है..

[Adivasi In India, Adivasi Identity, Adivasi Life in India, Indigenous]

आज का युवा वर्ग आक्रोशित है। वह यह महसूस करता है कि देश जिस स्थिति में होना चाहिए, वहाँ नहीं है। उनकी पीड़ा और ग़ुस्सा ज...
10/09/2025

आज का युवा वर्ग आक्रोशित है। वह यह महसूस करता है कि देश जिस स्थिति में होना चाहिए, वहाँ नहीं है। उनकी पीड़ा और ग़ुस्सा जायज़ है, लेकिन इस ऊर्जा का रास्ता भटक जाना चिंता का विषय है। सरकार की नीतियों और नेताओं की जवाबदेही पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या संसद जैसी संस्थाओं पर हमला करना किसी भी आंदोलन की सही पहचान नहीं हो सकती।

विद्रोह ओर आंदोलन का अर्थ लूटपाट या विध्वंस नहीं है। आंदोलन का अर्थ है – विचार, सवाल और परिवर्तन की माँग। जब नई पीढ़ी सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाती है, तो वह उसी घर को तोड़ती है जहाँ राष्ट्र के आज और कल की दिशा तय होती है।

फिर भी, युवाओं के आक्रोश को नकारा नहीं जा सकता। नेताओं की स्वार्थपूर्ण राजनीति, भ्रष्टाचार और दोहरे चरित्र ने ही यह स्थिति पैदा की है। देश के धन से अपने बच्चों को विदेश भेजना, उन्हें विलासिता का जीवन देना और जनता को खोखले वादों से बरसों तक छलना – यही आज की राजनीति का चेहरा बन चुका है। ऊपर से नीचे तक फैला भ्रष्टाचार हर स्तर पर जनता का विश्वास तोड़ता है।

हम अक्सर देशभक्ति का ढोंग करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ता और व्यवस्था से जुड़े अधिकांश लोग केवल निजी लाभ के लिए काम कर रहे हैं। पैसा कमाना, आलीशान मकान और बेशुमार ज़मीनें इकट्ठी करना ही उनका असली मकसद बन चुका है। यही कठोर हकीकत है, और यही कारण है कि युवाओं में निराशा और विद्रोह की भावना बढ़ रही है।

लेकिन सबसे बड़ी ग़लती सरकार की है, जो जनता की आवाज़ को सुनने और समाधान खोजने के बजाय उसे दबाने में लगी है। जब आंदोलनकारियों ने सड़कों पर उतरकर अपनी माँग रखी, तो सत्ता ने संवाद और समझौते के रास्ते को चुना ही नहीं, बल्कि गोली से जवाब दिया। यह किसी लोकतंत्र का नहीं, बल्कि दमनकारी शासन का संकेत है। जनता पर गोलियाँ चलाना, अपने ही देश के भविष्य को कुचलने जैसा है। मारे गए लोग आँकड़े नहीं, बल्कि इस देश के सपनों और संभावनाओं का हिस्सा थे।

अब ज़रूरत है कि युवा अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें – तोड़फोड़ या हिंसा नहीं, बल्कि जागरूकता, संगठन और वैचारिक संघर्ष की ओर। क्योंकि बदलाव केवल गुस्से से नहीं, बल्कि विचार और प्रयास से आता है।

आख़िर में, नेपाल के परिवर्तन के आंदोलन/ विद्रोह में सरकार की गोलियों से मारे गए युवाओं को श्रद्धांजलि ओर हूल जोहार...

{ Nepal, Nepal Protest, Gen Z Protest, Kathmandu }



आदिवासी भारत के मूलवासी हैं, जिनकी संस्कृति संविधान , सरकार वेदों ओर  धर्मों से भी प्राचीन है। हमने सदैव प्रकृति और पूर्...
06/09/2025

आदिवासी भारत के मूलवासी हैं, जिनकी संस्कृति संविधान , सरकार वेदों ओर धर्मों से भी प्राचीन है। हमने सदैव प्रकृति और पूर्वजों की पूजा की, न कि लिखित शास्त्रों की। आज हमारी सबसे बड़ी लड़ाई अपनी पहचान को बचाए रखने की है, ताकि इतिहास हमें केवल “जंगल का वासी” कहकर न भूल जाए..!

हम आदिवासियों ने न ग्रंथ, वेद, न पुराण पढ़े ओर लिखे, फिर हम इन्हें ओर इनके आधार अंदर की कहानियों ओर किरदारों कैसे अपना मान ले,

हमारी पहचान हमेशा प्रकृति, जंगल और पूर्वजों से जुड़ी रही। धर्मों और ग्रंथों से अलग हमारी संस्कृति ही हमारी असली शक्ति है।

{ Adivasi, Nature Worship, Moolvasi, Culture, Indigenous Identity, Indigenous, India }

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