26/11/2025
मानना पड़ेगा त्यागी जी के “त्याग” को,
देश को खोखला करने के हर एक राग को।
स्वहित नहीं, राष्ट्रहित का नाटक रच डाला,
फर्जी सिस्टम में करियर का दीया जलाया।
"डिग्री नहीं, दलाली का युग चल रहा है!"
जब दलाल तय करें डॉक्टर और अफसर, तो देश कैसे बचे?
ये लड़ाई किसी एक की नहीं है साथी,
ये लूट हमारे सपनों की बारात थी बाकी।
जब तक चुप रहेगा नौजवान बेपरवाह,
तब तक बिकती रहेगी सच्चाई सरेआम राह।
देशसेवा के नाम पर उन्होंने डिग्रियों को ऐसा पवित्र रूप दिया कि
कागज़ों में ज्ञान और असल में दलाली — यही बन गया नया राष्ट्रधर्म!
जहाँ एक युवा सालों मेहनत करता है सरकारी नौकरी के लिए,
वहीं कुछ लोग फर्जी डिग्रियों की फैक्ट्री खड़ी कर
पूरे सिस्टम को दीमक की तरह खोखला करने में लगे हैं।
जब शिक्षा बिके, नौकरी बिके और सिस्टम चुप रहे —
तो समझिए देश को खोखला करने की स्कीम पूरी सरकारी हो चुकी है।
दुश्मन सीमा पार नहीं,
डेस्क के इस पार बैठा है।