18/11/2025
रानी लक्ष्मीबाई
(जन्म का नाम मणिकर्णिका) 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख वीरांगना थीं, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें झांसी की रानी के नाम से भी जाना जाता है।
जीवन परिचय और विद्रोह
प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म 19 नवंबर, 1828 को वाराणसी में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्हें प्यार से 'मनु' कहा जाता था। उन्होंने कम उम्र में ही घुड़सवारी और अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुणता हासिल कर ली थी।
विवाह और गोद लेना: 1842 में, उनकी शादी झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवलेकर से हुई और वह झांसी की रानी बन गईं। राजा की मृत्यु के बाद, अंग्रेजों ने 'व्यपगत के सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) के तहत उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव (जिन्हें पहले आनंद राव के नाम से जाना जाता था) को झांसी का वैध उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया।
संघर्ष: अंग्रेजों के इस निर्णय के विरुद्ध रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी झांसी को बचाने का संकल्प लिया और कहा, "मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी"। उन्होंने एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया, जिसमें महिलाओं को भी शामिल किया गया।
युद्ध और बलिदान: 1858 में, उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भीषण युद्ध लड़ा। झांसी से निकलकर वे कालपी और फिर ग्वालियर पहुँचीं, जहाँ उन्होंने तात्या टोपे के साथ मिलकर लड़ाई जारी रखी। युद्ध के दौरान, उन्होंने अपने बेटे को पीठ पर बांधकर दुश्मनों से लोहा लिया। अंत में, 18 जून, 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुईं।
रानी लक्ष्मीबाई का साहस, नेतृत्व क्षमता और बलिदान उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अमर प्रतीक बनाता है। सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी" उनकी वीरता का गुणगान करती है।