19/05/2026
जगत् मिथ्या, मोमो सत्य!
आदि शंकराचार्य ने कहा था— "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या", परंतु आधुनिक 'मोमो वेदांत' के आचार्यों ने इसका एक अत्यंत संशोधित और स्वादिष्ट संस्करण प्रस्तुत किया है— "मोमो सत्यं, जगन्मिथ्या, चटनी तु परब्रह्म स्वरूपिणी!"
कहते हैं कि यह संसार माया है। धन, दौलत, पद, प्रतिष्ठा—सब क्षणभंगुर हैं। लेकिन जैसे ही गली के नुक्कड़ पर भाप उड़ाते मोमो दिखाई देते हैं, अंतरात्मा स्वयं उद्घोष कर उठती है— "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः"। अर्थात् खाली पेट आत्मज्ञान संभव नहीं! पहले दो प्लेट मोमो, फिर मोक्ष की चर्चा।
मोमो दर्शन के अनुसार जब-जब भूख बढ़ती है, तब-तब मोमो अवतरित होते हैं। "यदा यदा हि भूखस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् मोमोनां तदात्मानं सृजाम्यहम्॥" वहीं "असतो मा सद्गमय" का आधुनिक अर्थ है— "कच्चे मोमो से पके मोमो की ओर ले चल।" और "कर्मण्येवाधिकारस्ते" का वास्तविक रहस्य यह है कि तुम्हारा अधिकार केवल मोमो खाने पर है, कैलोरी गिनने पर नहीं।
मोमो दर्शन का अगला सूत्र कहता है कि "तीखा जितना गहरा होगा, वैराग्य उतना ही तीव्र होगा।" जब लाल चटनी जीभ पर लगती है, तो आँखों से जो अश्रु बहते हैं, वे संसार के दुखों के नहीं बल्कि मोमो-भक्ति के सात्विक आँसू होते हैं। वहीं मेयोनेज़ मीमांसा बताती है कि यदि तीखी चटनी संसार की माया है, तो मेयोनेज़ ईश्वर की कृपा है, जो दुखों को शांत करती है। दोनों मिलकर अंततः साधक को 'शून्य' अर्थात् खाली प्लेट की अवस्था तक पहुँचा देते हैं।
ज्ञानी कहता है— "यह शरीर नश्वर है।" लेकिन मोमो वाला पूछता है— "भैया, स्टीम या फ्राइड?" और सारा वैराग्य उसी क्षण देह त्याग देता है। जो व्यक्ति सुबह तक संसार को मिथ्या बता रहा था, वही शाम को अतिरिक्त लाल चटनी के लिए मोमो वाले से गहन तर्क-वितर्क करता पाया जाता है।
और अब परम सत्य सुनिए— जो व्यक्ति मोमो खाने के बाद प्लेट में बची हुई अतिरिक्त चटनी को उंगली से चाटकर साफ नहीं करता, उसका ज्ञान अभी अधूरा है। वह अभी भी लोक-लाज की सांसारिक माया में फँसा हुआ है।
निष्कर्ष यही है कि संसार परिवर्तनशील है। रिश्ते बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, मोबाइल के मॉडल बदलते हैं, लेकिन भूखे मनुष्य और गर्म मोमो का आकर्षण सनातन है।
"मोमोऽहम्, मोमोऽहम्, न चान्योऽस्मि कदाचन।"
(मैं मोमोमय हूँ, मेरे भीतर भी मोमो, बाहर भी मोमो।)
ॐ शांतिः शांतिः... मोमो क्रिस्पी क्रंच शांतिः! 🙏🤣
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