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12/05/2026

ईदगाह | मुंशी प्रेमचंद

रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है! वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं हैं, पड़ोस के घर से सूई-तागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना। दोपहर के पहले लौटना असंभव है।
लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं; लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं।
महमूद गिनता है—एक-दो-दस-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों से अनगिनती चीजें लाएँगे—खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या!

हामिद और अमीना
और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पाँच साल का गरीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता न चला कि क्या बीमारी है। कहती भी तो कौन सुनने वाला था! दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल ही में सहती थी और जब न सहा गया तो संसार से विदा हो गई।
अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रुपए कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएँगे। अम्मीजान अल्लाहमियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज़ है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है। हामिद के पाँवों में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आएँगी, तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा, महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से इतने पैसे निकालेंगे!
अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन है और उसके घर में दाना नहीं! आज इबादत का दिन है या मातम का? इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद-भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।
हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है— "तुम डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।"
अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे कैसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्हीं-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैरों में छाले पड़ जाएँगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेगी; लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहाँ तो घंटों चीजें जमा करने में लगेंगे। माँगे का ही तो भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिए थे, आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए; लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती? हामिद के लिए कुछ नहीं है, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पाँच अमीना के बटुए में। यही तो बिसात है और ईद का त्योहार! अल्ला ही बेड़ा पार लगाए।

ईदगाह का सफर
गाँव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब-के-सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतज़ार करते। ये लोग इतना धीरे-धीरे क्यों चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है?
शहर का उपांत आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चहारदीवारी बनी हुई है। पेड़ों में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशाना लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फर्लांग पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को कैसा उल्लू बनाया है!
बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह मदरसा है, यह क्लब-घर है। इतने बड़े मदरसे में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछें हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं! न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हैं, बिल्कुल तीन कौड़ी के, रोज़ मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे और क्या!
आगे चले। हलवाइयों की दूकानें शुरू हुईं। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रुपए देता है, बिल्कुल ऐसे ही रुपए।
बस्ती घनी होने लगी। ईदगाह जाने वालों की टोलियाँ नज़र आने लगीं। एक-से-एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, संतोष और धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज़ की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से बार-बार हॉर्न की आवाज़ होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।

नमाज़ का दृश्य
सहसा ईदगाह नज़र आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम बिछा हुआ है। और रोज़ेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ति में सम्मिलित हो गए।
कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं, और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं। कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ, और यही क्रम चलता रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।

मेले की रौनक
नमाज़ खत्म हो गई है। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकानों पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है।
यह देखो, हिंडोला है! एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होंगे, कभी ज़मीन पर गिरते हुए। यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट छड़ों से लटके हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मज़ा लो।
महमूद और मोहसिन और नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊँटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई ज़रा-सा चक्कर खाने के लिए वह नहीं दे सकता।
सब चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। इधर दूकानों की कतारें लगी हुई हैं। तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबिन और साधु। वाह! कितने सुंदर खिलौने हैं। अब बोला ही चाहते हैं।
महमूद सिपाही लेता है, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधे पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता है अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए है। मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी उँडेलना ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्वत्ता है उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं।
ये सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। ज़रा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा? किस काम के!
मोहसिन कहता है— "मेरा भिश्ती रोज़ पानी दे जाएगा साँझ-सवेरे।" महमूद— "और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा। कोई चोर आएगा तो फौरन बंदूक से फायर कर देगा।" नूरे— "और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।" सम्मी— "और मेरी धोबिन रोज़ कपड़े धोएगी।"
हामिद खिलौनों की निंदा करता है— "मिट्टी ही के तो हैं, गिरें तो चकनाचूर हो जाएँ।" लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि ज़रा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हैं, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचाता रह जाता है।

मिठाइयाँ और हामिद का संयम
खिलौनों के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ ली हैं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक् है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है।
मोहसिन कहता है— "हामिद, रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!" हामिद को संदेह हुआ, यह केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है। लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद, नूरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।
मोहसिन— "अच्छा, अबकी ज़रूर देंगे हामिद, अल्ला कसम, ले जा।" हामिद— "रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं?" सम्मी— "तीन ही पैसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगे?" महमूद— "हमसे गुलाबजामुन ले जा हामिद। मोहसिन बदमाश है।" हामिद— "मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं।" मोहसिन— "लेकिन दिल में कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?" महमूद— "हम समझते हैं इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाएँगे, तो यह हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।"
लोहे की दूकान और चिमटे की खरीद
मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीज़ों की हैं, कुछ गिलट और नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं।
हामिद लोहे की दूकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया—दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज़ हो जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं। ज़रा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई आँख उठाकर नहीं देखता। या तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट कर बराबर हो जाएँगे या छोटे बच्चे जो मेले में नहीं आए हैं, ज़िद करके ले लेंगे और तोड़ डालेंगे। चिमटा कितने काम की चीज़ है! रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हे में सेंक लो। कोई आग माँगने आए तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्माँ बेचारी को कहाँ फुरसत है कि बाज़ार आए और इतने पैसे ही कहाँ मिलते हैं? रोज़ हाथ जला लेती हैं।
हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सब-के-सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं। इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाएँ मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुंसियाँ निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराएँगे और मार खाएँगे। किताब में झूठी बातें थोड़ी ही लिखी हैं! मेरी जबान क्यों खराब होगी? अम्माँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी— 'मेरा बच्चा अम्माँ के लिए चिमटा लाया है। हजारों दुआएँ देंगी। फिर पड़ोस की औरतों को दिखाएँगी। सारे गाँव में चर्चा होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है! इन लोगों के खिलौनों पर कौन दुआ देगा?'
बड़ों की दुआएँ सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं। मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसी से तो मोहसिन और महमूद यों मिज़ाज दिखाते हैं। मैं भी इन्हें मिज़ाज दिखाऊँगा। खेलें खिलौने और खाएँ मिठाइयाँ। मैं नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिज़ाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता! आखिर अब्बाजान कभी-न-कभी आएँगे। अम्माँ भी आएँगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सुलूक किया जाता है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियाँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सब-के-सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हँसें! मेरी बला से!
उसने दूकानदार से पूछा— "यह चिमटा कितने का है?" दूकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा— "तुम्हारे काम का नहीं है जी!" "बिकाऊ है कि नहीं?" "बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?" "तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?" "छः पैसे लगेंगे।"
हामिद का दिल बैठ गया। "ठीक-ठीक बताओ।" "ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं तो चलते बनो।"
हामिद ने कलेजा मज़बूत करके कहा— "तीन पैसे लोगे?" यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दूकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दूकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। ज़रा सुनें, सब-के-सब क्या-क्या आलोचनाएँ करते हैं!

चिमटे का विजय अभियान
मोहसिन ने हँसकर कहा— "यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसका क्या करेगा?"
हामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटककर कहा— "ज़रा अपना भिश्ती ज़मीन पर गिरा दो। सारी पसलियाँ चूर-चूर हो जाएँगी बच्चू की।"
महमूद बोला— "तो यह चिमटा कोई खिलौना है?"
हामिद— "खिलौना क्यों नहीं है! अभी कंधे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मँजीरे का काम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएँ, मेरे चिमटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर है चिमटा।"
सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला— "मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।"
हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा— "मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खँजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। ज़रा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आँधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।"
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया; लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कबके बज गए, धूप कड़ी हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही है। बाप से ज़िद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।
अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं; हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रार्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हो गया! दूसरे पक्ष से जा मिला; लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए तो मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जाएँ; मियाँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागें; वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुँह छिपाकर ज़मीन पर लेट जाएँ। मगर यह चिमटा, यह रुस्तमे-हिन्द, लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी आँखें निकाल लेगा।
मोहसिन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर कहा— "अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?"
हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा— "भिश्ती को एक डाँट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।" मोहसिन परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई— "अगर बच्चा पकड़ जाएँ तो अदालत में बँधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के ही पैरों पड़ेंगे।"
हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा— "इसे पकड़ने कौन आएगा?"
नूरे ने अकड़कर कहा— "यह सिपाही बंदूकवाला।"
हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा— "यह बेचारे हम रुस्तमे-हिन्द को पकड़ेंगे! अच्छा लाओ, अभी ज़ोर आजमाई हो जाए। इसकी सूरत देखकर चोर भाग जाएँगे। पकड़ेंगे क्या बेचारे!"
मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई— "तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज़ आग में जलेगा।"
उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा। लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया— "आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब! आग में कूदना वह काम है जो रुस्तमे-हिन्द ही कर सकता है। तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लोंडियों की तरह घर में घुस जाएँगे।"
महमूद ने एक ज़ोर और लगाया— "वकील साहब कुरसी-मेज़ पर बैठेंगे, तुम्हारा चिमटा तो बावर्चीखाने में ज़मीन पर पड़ा रहेगा।"
इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया। कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने! चिमटा बावर्चीखाने में पड़े रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धाँधली शुरू की— "मेरा चिमटा बावर्चीखाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कुरसी पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा।"
बात कुछ बनी नहीं। खासी गाली-गलौज थी। लेकिन कानून को पेट में डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए। मानो कोई धेलचा कनकौआ किसी गंडेदार कनकौए को काट गया हो! कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज़ है। उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रुस्तमे-हिन्द है। अब इसमें मोहसिन, महमूद, नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।
विजेता को हारने वालों से जो सत्कार मिलना स्वाभाविक है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज़ न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाएँगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों!
संधि की शर्तें तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा— "ज़रा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो।" महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।
हामिद को इन शर्तों के मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं! हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे— "मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच! यह लोहे का चिमटा भला इन मिट्टी के खिलौनों की क्या बराबरी करेगा! मालूम होता है, अब बोले, तब बोले।" लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।
मोहसिन— "लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा!" महमूद— "दुआ को लिए फिरते हो। उलटे मार न पड़े! अम्माँ ज़रूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?" हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी।
घर वापसी और खिलौनों का अंत
ग्यारह बजे गाँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे! इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दोनों खूब रोए। उनकी अम्माँ यह शोर सुनकर आईं और दोनों को दो-दो चाँटे और लगाए।
मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके शान के अनुकूल इससे भी ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील ज़मीन पर या ताक पर तो बैठ नहीं सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में दो खूँटियाँ गाड़ी गईं। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज़ का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालतों में खस की टट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं। क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गरमी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगा। मालूम नहीं पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े ज़ोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थियाँ घूरे पर डाल दी गईं।
अब रहा महमूद का सिपाही। उसे तुरंत गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया; लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए, जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह 'छोनेवाले, जागते लहो' पुकारते चलते हैं। मगर रात तो अँधेरी ही होनी चाहिए। महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बंदूक लिए ज़मीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है। महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डॉक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिल गया है जिससे वह टूटी टाँग को आन-फानन में जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जोड़ दी जाती है; लेकिन सिपाही को ज्यों ही खड़ा किया जाता है, टाँग जवाब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई! तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है!

दादी का प्यार
अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी। "यह चिमटा कहाँ था?" "मैंने मोल लिया है।" "कै पैसे में?" "तीन पैसे दिए।"
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुई, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?
हामिद ने अपराधी भाव से कहा— "तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे लिया।"
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद हो गया।
और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बच्ची अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!

‘Guerrilla Warfare’ by the revolutionary Ernesto Che Guevara written in 1960 has become a how-to manual for thousands of...
20/04/2026

‘Guerrilla Warfare’ by the revolutionary Ernesto Che Guevara written in 1960 has become a how-to manual for thousands of guerrilla fighters in various countries around the world. Guevara intended it to be a guidebook on guerrilla warfare as inspiration for the revolutionary movement. Fascinating to admirers and adversaries alike he captured the minds of millions with his leadership and his belief in guerrilla warfare as the only effective agent to achieve political change. Here in his own classic text on revolution Che draws on his first-hand experience of the Cuban campaign to document all aspects of guerrilla warfare from its aims to its organization and training. He analyses how in Cuba against all odds a small band of dedicated fighters grew in strength with the support of the people to defeat a dictator's army. Guevara emphasizes that guerrilla warfare is a favorable method against totalitarian regimes where political opposition and legal civil struggle is impossible to conduct.



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The Power of Awareness' allows those who rebelled against a rigid religious upbringing to renew some of the images etche...
20/04/2026

The Power of Awareness' allows those who rebelled against a rigid religious upbringing to renew some of the images etched in their consciousness only in a more loving positive and universal way. Neville shows how change of consciousness is the critical factor in life for consciousness is the only reality the first and only cause-substance of the phenomena of life. Take an internal journey that will transform your daily life! In this his most important work he focuses on: • Consciousness • The truth that sets you free • Attitude • Subjective control • Free will • Faith • Destiny



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The Art of War' is an ancient Chinese military treatise written by Sun Tzu, a high-ranking military general, strategist ...
20/04/2026

The Art of War' is an ancient Chinese military treatise written by Sun Tzu, a high-ranking military general, strategist and tactician. The text is composed of 13 chapters, each of which is devoted to one aspect of warfare. It is commonly known to be the definitive work on military strategy and tactics of its time. It has been the most famous and influential of China's Seven Military Classics, and for the last two thousand years it remained the most important military treatise in Asia, where even the common people knew it by name.Sun Tzu believed war to be an essential wrongdoing that must be got rid of whenever it can be. The war should be fought fleetingly to reduce economic decline. Sun Tzu harped on the significance of placement in military tactics. The planning to position an army must be dependent on the stipulations in the physical surroundings and the subjective thoughts of various militants in those conditions. He believed that strategy cannot be considered as planning with respect to glancing through a previously decided list. It is better represented by the fact that it needs speedy and suitable reactions to altering situations. Planning gives results in restrained surroundings. But in case of an altering environment, similar plans come in each other's ways and give rise to undesired outcomes. It has had an influence on Eastern and Western military thinking, business tactics, legal strategy and beyond.ABOUT THE AUTHOR:Sun Tzu, also known as Sun Wu or Sunzi, was an ancient Chinese military strategist believed to be the author of the acclaimed military text, 'The Art of War'. Details about Sun Tzu's background and life are uncertain, although he is believed to have lived C 544-496 BCE. Sun Tzu believed in the use of the military sciences to effect outcomes that would result in peace.



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20/04/2026

Feeling is the secret' Shows readers how they can quickly attain their goals simply by refining their imagination. Your thoughts shape your life create your reality and ultimately limit or expand your true potential. The book describes how our thoughts and feelings affect who we become and what we achieve. When we have the power to change them we gain the power to change our circumstances our health and our life's purpose. There is a treasure in it a clearly defined road to the realization of your dreams.



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A classic work on Eastern philosophy ‘Zen in the Art of Archery’ is a charming and deeply illuminating story of one man’...
20/04/2026

A classic work on Eastern philosophy ‘Zen in the Art of Archery’ is a charming and deeply illuminating story of one man’s experience with Zen. Eugen Herrigel a German professor of Philosophy in Tokyo took up the study of archery as a step toward an understanding of Zen Buddhism. This book is the account of the six years he spent as a student of one of Japan’s great kyudo (archery) masters and of how he gradually overcame his initial inhibitions and began to feel his way toward new truths and ways of seeing.



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B.R. Ambedkar’s 'Annihilation of Caste' is one of the most important yet neglected works of political writing from India...
20/04/2026

B.R. Ambedkar’s 'Annihilation of Caste' is one of the most important yet neglected works of political writing from India. Written in 1936 it is an audacious denunciation of Hinduism and its caste system. Ambedkar – a figure like W.E.B. Du Bois – offers a scholarly critique of Hindu scriptures scriptures that sanction a rigidly hierarchical and iniquitous social system. The world’s best-known Hindu Mahatma Gandhi responded publicly to the provocation. The hatchet was never buried.



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Autobiography of A Yogi' tells the life story of Paramahansa Yogananda one of the best spiritual books ever written. Thi...
20/04/2026

Autobiography of A Yogi' tells the life story of Paramahansa Yogananda one of the best spiritual books ever written. This introduces western readers to India's ancient science of Yoga. This book is a must read for anyone interested in spirituality God-realization and the laws behind miracles. The book covers Yogananda’s remarkable childhood and describes his search for his guru Yukteswar Giri. Yogananda then spent ten years in training to become a yoga master. He taught many others The Science of Kriya Yoga a technique that was initiated by Yukteswar. The Yogi also established a school by the name of Yogoda Satsanga Brahmacharya Vidyalaya.



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Along with Sun Tzu's The Art of War The Book of Five Rings is considered to be one of the most insightful texts on the s...
20/04/2026

Along with Sun Tzu's The Art of War The Book of Five Rings is considered to be one of the most insightful texts on the subtle arts of confrontation and victory to emerge from Asia. It analyzes the process of struggle and mastery over conflict that underlies every level of human interaction. For Musashi the way of the martial arts was a mastery of the mind rather than simply technical prowess—and it is this path to mastery that is the core teaching in The Book of Five Rings. This brilliant manifesto is written not only for martial artists but for anyone who wants to apply the timeless principles of this text to their life.



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First published in 1919 it is a brilliant journey of the psyche written by one of Germany's most influential writers and...
20/04/2026

First published in 1919 it is a brilliant journey of the psyche written by one of Germany's most influential writers and thinkers—Herman Hesse. A young man awakens to selfhood and to a world of possibilities beyond the conventions of his upbringing. Emil Sinclair is a quiet boy drawn into a forbidden yet seductive realm of petty crime and defiance. His guide is his precocious mysterious classmate Max Demian who provokes in Emil a search for self-discovery and spiritual fulfilment.Demian is a classic coming-of-age story that continues to inspire generations of readers in its exploration of good and evil morality and self-discovery.



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