R P Rajak

R P Rajak झाड़ू छोड़ो कलम उठाओ, परिवर्तन आ जायेगा!

27/04/2026

कई बार हमारी हार का कारण हमारी मेहनत नहीं, हमारी ज़ुबान होती है।
लोग आपकी योजनाएँ सुनते नहीं, वे उन्हें तोड़ने के रास्ते ढूँढ़ते हैं, इसलिए अपनी चाल, अपने सपने और अपनी रणनीति ज़रूरत से पहले किसी को मत बताइए।
मनोविज्ञान कहता है —
मौन आपकी ऊर्जा की रक्षा करता है और गोपनीयता आपकी सफलता की।
गूंगा शेर भी जंगल का राजा होता है और मुँह बंद रखने वाली मछली जाल में नहीं फँसती।

19/04/2026
07/03/2026

मुस्कुराहटों का एक मुखौटा, वो हर सुबह पहन लेता है,
अपने नम आंसुओं को, बंद पलकों के पीछे कहीं चुन लेता है।
​कहने को तो समंदर-सा शांत दिखता है वो बाहर से,
पर भीतर ही भीतर, रोज़ एक नए तूफान से लड़ लेता है।
​'मर्द को दर्द नहीं होता', इस एक झूठ का बोझ उठाते-उठाते,
वो अपने हिस्से की धूप को, अपनों की छाँव में बदल देता है।
​और जब थक कर वो गिरना चाहता है किसी के कांधे पर टूटकर,
तो फिर से 'ज़िम्मेदारी' का वही बेताल, उसे मज़बूती से थाम लेता है।

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01/03/2026

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जीवन हमें अक्सर दो अतियों के बीच लाकर खड़ा कर देता है— एक ओर मधुमास, जहाँ सब कुछ हरा-भरा, संतुलित और पूर्ण प्रतीत होत....

09/02/2026

मुझे लगता है, हर किसी की ज़िंदगी में कम से कम एक बार
वो लम्हा ज़रूर आता है—
जब कोई सकुचाते हुए कह देता है,
“मुझे आपसे लगाव-सा हो गया है…”
और उसी पल दुनिया जैसे स्लो-मोशन में चलने लगती है।
मन इस हक़ीक़त को मानने से इनकार कर देता है
कि वो कहकर आगे बढ़ गया है,
और आप… वहीं ठिठक कर खड़े रह जाते हैं।
असल में,
प्रपोज़ डे तो वही दिन होता है।

26/01/2026

पढ़ाई-लिखाई से क्या ही हो जाएगा। कौन-सी नौकरी लग जाएगी। कहीं जॉब्स बची ही नहीं हैं। मैकेनिक, प्लंबर, मिस्त्री, ड्राइवर, सब्ज़ी/किराना वाले—सब डिग्रीधारी, पढ़े-लिखे गधों से ज़्यादा कमा रहे हैं।
उपरोक्त व्हाट्सएप ट्रैश बड़ी तेज़ी से हर जगह घुमाया जा रहा है। “सहमत”, “सटीक”, “क्या ख़ूब कहा”, “एकदम सही बात है”—जैसे अनगिनत कमेंट्स भी।
पर याद रखिए, इट्स अ ट्रैप।
एकदम भीषण वाला जाल। इंद्रजाल, मायाजाल से भी बड़ा—सबसे बड़ा जाल।
बस कमा लो, इतना कमा लो कि ज़िंदा रह लो, अपने परिवार को ज़िंदा रख सको—यह भी कोई ज़िंदगी हुई? इतना तो जानवर भी कर लेते हैं।

पढ़ाई के बाद पैसा सबसे ज़रूरी है, इसमें कोई शक नहीं, इस पर कोई सवाल ही नहीं बनता।
लेकिन पढ़ाई का मतलब सिर्फ़ डिग्री लेना, नौकरी पकड़ना या बैंक बैलेंस बढ़ाना नहीं है।
पढ़ाई तुम्हारे दिमाग़ की खिड़कियाँ खोलती है।
ऐसी खिड़कियाँ, जिन्हें ‘सिस्टम जी’ बंद ही रखना चाहते हैं।
यह उम्मीद जगाती है कि कभी तुम्हें समझ आएगा कि तुम सिर्फ़ “हम बनाम वे” करने के लिए पैदा नहीं हुए।
यह सिखाती है कि शासक चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह इंसान ही है।
उसके फ़ैसले भी ग़लत हो सकते हैं।
उससे सवाल किए जा सकते हैं।
तर्क और बहस की जा सकती है।

पढ़ना सिविक सेंस जगाता है।
यह समझ आता है कि सड़क पर गंदगी फैलाना, कूड़ा फेंकना, लाइन तोड़ना या किसी की आवाज़ दबाना सिर्फ़ “छोटी-सी बात” नहीं, बल्कि समाज के साथ विश्वासघात है।

यह अच्छे-बुरे की तमीज़ सिखाता है।
न सिर्फ़ किताबी नैतिकता, बल्कि वह नैतिकता, जो रोज़ की ज़िंदगी में परखी जाती है।
पढ़ाई यही हिम्मत देती है।
बराबरी पर खड़े होने के मौक़े देती है।
सवाल पूछने के, ‘न’ कहने के और सही के लिए लड़ने के।
आज के ज़माने में बिना पढ़े इंसान मशीन बन सकता है, प्यादा बन सकता है—लेकिन जी नहीं सकता।

इक़रा—पढ़ो।
इसलिए कि तुम्हारी आँखें खुली रहें, दिमाग़ जागता रहे और दिल इतना मज़बूत हो कि तुम जान सको—हम सिर्फ़ सर्वाइव करने नहीं आए, बेहतर ज़िंदगी जीने, समझने और बदलाव लाने भी आए हैं।
पढ़ाई दिमाग़ को इतना बड़ा कर देती है कि छोटी-छोटी चीज़ें अब छोटी नहीं लगतीं।
एक ग़लत फ़ैसला, एक अन्याय, एक झूठ—ये सब सिर्फ़ “होता है, चलता है” वाली बातें नहीं रह जातीं।
ये चुभती हैं, क्योंकि अब समझ आ जाती है कि हर चीज़ का असर होता है—बटरफ्लाई इफ़ेक्ट की तरह।
तुम पर, समाज पर, आने वाली पीढ़ी पर।
तुम अकेले नहीं हो।
तुम्हारी सड़क, तुम्हारा शहर, तुम्हारा देश—ये सब तुमसे जुड़े हैं।
अगर तुम चुप रहे, तो वह चुप्पी भी एक फ़ैसला है।
अगर तुमने आवाज़ नहीं उठाई, तो वह ख़ामोशी भी हिस्सेदारी है।
पढ़ाई अच्छे-बुरे की सीमा को धुंधला नहीं करती, बल्कि उसे और साफ़ करती है।
किताबें, विचार—ये सब मिलकर एक आइना बन जाते हैं, जिसमें तुम ख़ुद को देखते हो।
पढ़ाई सवाल बार-बार पूछवाती है और जवाब की ताक़त भी देती है।
ज़िम्मेदारों से सवाल करना कोई बग़ावत नहीं, ज़िम्मेदारी है।
क्यों?
कैसे?
किसके लिए?
और अगर जवाब संतोषजनक न हों, तो बदलाव की माँग।
इसीलिए पढ़ा-लिखा इंसान चुभता है।
लोग कहते हैं—पढ़े-लिखे ज़्यादा जाहिल हैं, कट्टर हैं, नफ़रती हैं, मूर्ख हैं।
होंगे।
सब कुछ होंगे।
लेकिन वे सब प्रिविलेज्ड हैं—यह भी याद रखें।
ग़रीबों के लिए, शोषितों के लिए, निचले तबकों के लिए पढ़ना बेहद ज़रूरी है।
पढ़ाई को किसी क़ीमत पर सैक्रिफ़ाइस नहीं करना है।
हर हाल में पढ़ना है—
फिर चाहे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी तुम्हें दिन, घंटे, महीने की कितनी ही कमाई का गणित क्यों न पकड़ाए।
#पढ़ाई #शिक्षा

नया साल नई रौशनी लेकर आए,बीते ग़मों को ख़ामोशी में छोड़ जाए।हर सुबह उम्मीदों से भरी हो आपकी,हर शाम सुकून बनकर लौट आए।नवव...
01/01/2026

नया साल नई रौशनी लेकर आए,
बीते ग़मों को ख़ामोशी में छोड़ जाए।
हर सुबह उम्मीदों से भरी हो आपकी,
हर शाम सुकून बनकर लौट आए।
नववर्ष 2026 मुबारक हो 🌟💐🙏

 #आर्थिक_सहयोग_की_अपील (महत्वपूर्ण अपडेट)आप सभी साथियों को अवगत कराना है कि आज दिनांक 31 दिसंबर 2025, दोपहर 12:00 बजे तक...
31/12/2025

#आर्थिक_सहयोग_की_अपील (महत्वपूर्ण अपडेट)

आप सभी साथियों को अवगत कराना है कि आज दिनांक 31 दिसंबर 2025, दोपहर 12:00 बजे तक, दीपक कनौजिया के इलाज हेतु क्राउड फंडिंग के माध्यम से कुल ₹3,96,000 (तीन लाख छियानवे हजार रुपये) की राशि एकत्र हो चुकी है।

डॉक्टरों द्वारा जारी अनुमानित खर्च का पर्चा इस संदेश के साथ संलग्न है। चिकित्सकों के अनुसार इलाज पर कुल अनुमानित खर्च लगभग ₹10,00,000 (दस लाख रुपये) है।

कल दिनांक 1 जनवरी 2026 को दीपक का ऑपरेशन प्रस्तावित है। अतः ऑपरेशन से पूर्व शेष धनराशि जुटाना अत्यंत आवश्यक और समय-संवेदी हो गया है।

जिन सभी साथियों ने अब तक दिन-रात अथक परिश्रम कर सहयोग जुटाने में योगदान दिया है, उन सभी का हम हृदय से आभार और धन्यवाद प्रकट करते हैं। 🙏

हालाँकि अभी लक्ष्य पूर्ण नहीं हुआ है और हमें और अधिक प्रयास व सहयोग की आवश्यकता है।

आप सभी से विनम्र निवेदन है कि कृपया इस अपील को पूरी गंभीरता के साथ अधिक से अधिक साझा करें और अपनी क्षमता अनुसार आर्थिक सहयोग प्रदान करें, ताकि दीपक का समय पर उपचार संभव हो सके।

सहयोग हेतु दीपक का बैंक डिटेल निम्नवत है-
खाता धारक का नाम: दीपक कन्नौजिया
खाता संख्या: 34189559186
बैंक का नाम: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई)
शाखा: इलाहबाद यूनिवर्सिटी
आईएफएससी कोड: SBIN0001621
मोबाइल नंबर: 7237891326
UPI- deepak.kannaujiya4@ybl (दीपक)
UPI- kannaujiyakavita21@oksbi (कविता, छोटी बहन)
UPI- 7235939408@ibl (शालिनी, बड़ी बहन)
UPI -6389181252@ibl(सुगम छोटी बहन

आपका छोटा सा सहयोग किसी के जीवन को बचा सकता है।

निवेदक:दीपक कनौजिया का परिवार एवं मित्रगण 🙏

AI की दुनिया में असली राजा कौन निकला — Intel या NVIDIA?90s और 2000s के दौर में जब पर्सनल कंप्यूटर घर-घर पहुँच रहे थे, तब...
29/12/2025

AI की दुनिया में असली राजा कौन निकला — Intel या NVIDIA?

90s और 2000s के दौर में जब पर्सनल कंप्यूटर घर-घर पहुँच रहे थे, तब एक ही नाम का दबदबा था — Intel।
“Intel Inside” सिर्फ़ एक स्टिकर नहीं, बल्कि पावरफुल कंप्यूटर की गारंटी माना जाता था। CPU ही कंप्यूटिंग का सेंटर था: वही गेम चलाता, वही ऑफिस सॉफ़्टवेयर संभालता, वही सर्वर चलाता।
फिर गेम बदला।
लोगों को रियलिस्टिक ग्राफ़िक्स, स्मूथ फ्रेम रेट और विज़ुअली रिच अनुभव चाहिए थे। इसी ज़रूरत के बीच एक अपेक्षाकृत छोटी कंपनी ने एंट्री ली — NVIDIA।
काम सिर्फ़ एक: ग्राफ़िक्स कार्ड बनाना।
Intel के पास भी ग्राफ़िक्स थे, लेकिन वो इसे “साइड बिज़नेस” जैसा समझता रहा। फोकस हमेशा CPU पर रहा, वहीं NVIDIA चुपचाप एक अलग दिशा में सोच रहा था।

AI की थ्योरी नई नहीं है।
इसके बेसिक कॉन्सेप्ट 1960s से रिसर्च में हैं। असली समस्या दिमाग़ की नहीं, मशीन की थी।
CPU डिजाइन ही इस तरह का है कि वह कम काम करता है, लेकिन बेहद जटिल काम एक-एक करके, सीरियल तरीके से करता है। यह ऑपरेटिंग सिस्टम, ब्राउज़र, डेटाबेस और बिज़नेस लॉजिक के लिए शानदार है — लेकिन आधुनिक AI के लिए पर्याप्त नहीं।

AI को चाहिए कुछ और:
लाखों छोटे-छोटे कैलकुलेशन, एक साथ।
यानी massive parallel processing।

यहीं पर NVIDIA ने वो देख लिया जो ज़्यादातर नहीं देख पाए।

GPU का नेचर ही अलग है।
हज़ारों कोर जो एक ही तरह के ऑपरेशन को पैरलल में दोहराते हैं — मैट्रिक्स और टेंसर ऑपरेशन, जो डीप लर्निंग की जान हैं। शुरू में लगा कि ये सब सिर्फ़ गेमिंग के लिए है, लेकिन NVIDIA ने 2006 में CUDA लॉन्च करके GPU को एक कम्प्यूट प्लेटफ़ॉर्म में बदल दिया। रिसर्च लैब्स, हाई-परफॉर्मेंस कम्प्यूटिंग और बाद में डीप लर्निंग ने इसी इंफ्रास्ट्रक्चर को अपनाया — और कहानी यहीं से पलटनी शुरू हुई।
जैसे-जैसे न्यूरल नेटवर्क गहरे और बड़े होते गए, AI ट्रेनिंग की ज़रूरतें explode करती गईं।
डेटा अधिक, पैरामीटर बिलियन में, और टाइम-टू-मार्केट कम। ऐसे में CPU क्लस्टर बनाना महंगा, धीमा और एनर्जी-इनेफिशिएंट साबित हुआ, जबकि NVIDIA के GPU क्लस्टर वही काम कई गुना तेज़ और बेहतर efficiency के साथ करने लगे। OpenAI से लेकर Google, Meta, Amazon तक — हर बड़े AI प्लेयर ने अपने सबसे क्रिटिकल मॉडल्स को NVIDIA GPU पर ट्रेन और डिप्लॉय करना शुरू कर दिया।

Intel इस दौरान क्या कर रहा था?
Intel ने CPUs में अपनी लीड बरकरार रखी, सर्वर और PC मार्केट में आज भी उसका रोल बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन AI के हाई-एंड ट्रेनिंग सेगमेंट में उसने उतनी जल्दी, उतने फोकस के साथ GPU-प्लस-सॉफ्टवेयर-प्लेटफ़ॉर्म पर दांव नहीं लगाया, जितना NVIDIA ने लगाया।
NVIDIA ने सिर्फ़ चिप नहीं बनाए — पूरा इकोसिस्टम बनाया: CUDA, लाइब्रेरीज़, डेवलपर टूल्स, फ्रेमवर्क इंटीग्रेशन, क्लाउड पार्टनरशिप। वहीं Intel की एंट्री बाद में और टुकड़ों में दिखी — अलग-अलग प्रोडक्ट, लेकिन एक यूनिफाइड AI प्लेटफ़ॉर्म की ताक़त उतनी नहीं बन पाई।

पर सबसे दिलचस्प ट्विस्ट यह है कि NVIDIA ने शुरुआत में उसी इकोसिस्टम पर अपना बिज़नेस खड़ा किया, जहाँ CPU का किंग Intel था।
लेकिन समय के साथ वही GPU, जिनके लिए कभी powerful CPU की ज़रूरत होती थी, अब AI वर्कलोड का असली इंजन बन गए। डेटा सेंटर में आज कई जगह CPU सिर्फ़ “enabler” बन गया है — सिस्टम को बूट करने, मैनेज करने और orchestration के लिए — जबकि भारी-भरकम AI वर्क GPU संभाल रहा है।

एक समय था जब बात होती थी:
“कौन सा प्रोसेसर है?”
आज सवाल बदल चुका है:
“कितने GPU हैं और कौन से हैं?”

इस कहानी में दो बड़ी सीख हैं:

1. जो भविष्य के वर्कलोड को समझ ले, वही अगली सदी के इंफ्रास्ट्रक्चर का मालिक बनता है। Intel ने कंप्यूटिंग के पिछले युग को परिभाषित किया, NVIDIA अगले युग — AI कम्प्यूट — को डिफाइन कर रहा है।

2. सिर्फ़ हार्डवेयर नहीं, पूरा प्लेटफ़ॉर्म बनाना पड़ता है। NVIDIA ने चिप से आगे बढ़कर सॉफ्टवेयर, टूलिंग और इकोसिस्टम पर इन्वेस्ट किया, और वहीं उसकी असली moat बनी। जो कंपनियाँ सिर्फ़ आज के प्रोडक्ट में आराम कर लेती हैं, वो कल के प्लेटफ़ॉर्म पर सिर्फ़ इतिहास पढ़ती हैं।

CPU ने कंप्यूटर को चलाया।
GPU इंसान की सोच की स्पीड बदल रहा है।
आज जब भी AI के बारे में सोचा जाता है, एक बात साफ़ दिखती है:
जो कंपनियाँ सिर्फ़ present को optimize कर रही हैं, वे पीछे छूट रही हैं।
जो quietly future के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बना रही हैं — वही अगली revolution लिखेंगी।

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