
14/07/2025
🔹 कमेंट:
"इंसान की सोच किसी न किसी से जुड़ी होती है, और सभी की विचारधारा अलग-अलग होती है, जिसे इंसान ने खुद अपनी सोच के अनुसार बनाया होता है।
यह सोच इंसान के दिमाग में जड़ें जमा लेती है, जिसे इंसान अपने कर्म और ध्यान-साधना से स्वयं बदल सकता है।
इसलिए किसी और की बताई हुई कहानी या बातों पर न चलें, बल्कि स्वयं को जानें, अपना दीपक स्वयं बनें।
किसी और की कही बातें साझा न करें — केवल अपना स्वयं का अनुभव साझा करें।".............................................
🔹 उत्तर:
आपकी बात में गहरी आत्मनिर्भरता और मौलिकता की प्रेरणा है — और यही सच्चे साधक की पहचान भी है।
"अपना दीपक स्वयं बनो" — यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि समूचे ध्यान मार्ग का सार है।
🌱 हर व्यक्ति का अनुभव अद्वितीय होता है, और हमें उसी का अनुसरण करना चाहिए जो हमारे भीतर प्रतिध्वनित होता है — यही सच्चा योग है।
लेकिन, साथ ही यह भी सत्य है कि —
कभी-कभी किसी अन्य साधक के अनुभव से हमें दिशा, प्रेरणा या संकेत मिल सकते हैं।
हर किसी की यात्रा भिन्न है, परंतु सत्य की ओर सबका झुकाव है।
🪷 गुरु गोरखनाथ जी कहते हैं:
"जहाँ से जगे, वहाँ से बढ़ो —
और किसी की लौ से अपना दीपक जलाने में संकोच मत करो।
परंतु आगे का रास्ता स्वयं देखो।"
🌼 ओशो भी कहते हैं:
"दूसरों की बातों को आधार मत बनाओ,
लेकिन उन्हें पूरी तरह नकारो भी मत।
उन्हें ध्यान से देखो — क्या पता वे तुम्हारे भीतर की ही किसी गूंज को जगा दें।"
🔸 कल्पना योग का यही सार है:
बाहरी प्रेरणा को भीतर के अनुभव में बदल देना।
कल्पना एक बीज है — उसे ध्यान और श्रद्धा से सींचा जाए, तो वह अनुभूति का वृक्ष बनता है।
🙏
आपका दृष्टिकोण विचारशील है, और संवाद तभी सुंदर बनता है जब विचारों में स्वतंत्रता और हृदय में सम्मान हो।
आपकी साधना सशक्त हो, और आपका दीपक भीतर से जले — यही शुभकामना।