07/11/2025
कहते हैं, कुछ रिश्ते वक्त के पार भी सांस लेते रहते हैं। कुछ मोहब्बतें ऐसी होती हैं जो अधूरी रहकर भी अमर हो जाती हैं। अभिनेत्री और गायिका सुलक्षणा पंडित और महान अभिनेता संजीव कुमार का रिश्ता शायद ऐसा ही था। दोनों की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं—एक ऐसी दास्तान जो प्रेम, विरह, और दर्द के सागर में डूबी हुई है। हैरानी की बात तो यह है कि सुलक्षणा पंडित का निधन ठीक उसी तारीख को हुआ जिस दिन 40 साल पहले संजीव कुमार इस दुनिया को अलविदा कह गए थे — 6 नवंबर।
मौत की वही तारीख… क्या ये महज संयोग था या किस्मत की डोर?
71 वर्षीय सुलक्षणा पंडित पिछले कुछ समय से बीमार चल रही थीं और मुंबई के नानावटी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। जिस दिन उनके निधन की खबर आई, उसी दिन यादों का एक तूफ़ान लोगों के मन में उमड़ पड़ा — वो यादें जब सुलक्षणा पंडित ने संजीव कुमार के लिए अपने दिल में जगह बनाई थी, मगर बदले में उन्हें मिला सिर्फ़ इंतज़ार और तन्हाई। दोनों का जन्म भी एक ही महीने में हुआ था — संजीव कुमार 9 जुलाई 1938 को और सुलक्षणा 12 जुलाई 1954 को। 16 साल का फर्क होने के बावजूद उनका रिश्ता दिल से जुड़ा था।
संगीत में जन्मी सुलक्षणा, सुरों की विरासत
सुलक्षणा का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां संगीत खून में बहता था। उनके पिता प्रताप नारायण पंडित एक जाने-माने संगीतज्ञ थे, और उनके चाचा पंडित जसराज भारतीय शास्त्रीय संगीत के महानतम स्तंभों में से एक थे। यही नहीं, उनके भाई जतिन-ललित की जोड़ी ने बॉलीवुड संगीत को एक नया आयाम दिया। बहन विजेयता पंडित ने फिल्मों में अभिनय किया, जबकि उनके पति आदर्श श्रीवास्तव भी संगीतकार थे। यह पूरा परिवार संगीत और कला का जीता-जागता रूप था।
नौ साल की उम्र में शुरुआत, सुरों से अभिनय तक का सफर
सुलक्षणा ने महज़ नौ साल की उम्र में फिल्म तक़दीर (1967) में गाना गाया। लता मंगेशकर के साथ कोरस में गाए गए गीत “सात समंदर पार से” में उनकी आवाज़ भी शामिल थी। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को एक पार्श्व गायिका के रूप में स्थापित किया। 1975 में आई फिल्म संकल्प के गीत “तू ही सागर है, तू ही किनारा” के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला — उनके करियर का सबसे बड़ा सम्मान। उन्होंने रफ़ी साहब और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों के साथ भी गाया।
किशोर दा की सलाह — “तुम हीरोइन बनो”
एक दौर में जब सुलक्षणा पंडित किशोर कुमार के साथ स्टेज परफॉर्मेंस करती थीं, तब किशोर दा ने उनसे कहा — “तुम्हारी आवाज़ ही नहीं, तुम्हारा चेहरा भी खूबसूरत है। तुम्हें फिल्मों में अभिनय करना चाहिए।” यह 1971 की बात थी। उसी समय किशोर दा अपनी फिल्म दूर का राही बना रहे थे और उन्होंने सुलक्षणा को उसके एक गीत “बेकरार दिल गाए जा” में मौका दिया। यह उनका पहला डुएट था और यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।
‘उलझन’ से पर्दे पर आगमन और संजीव कुमार से मुलाकात
चार साल बाद 1974 में फिल्म उलझन से सुलक्षणा ने बतौर अभिनेत्री डेब्यू किया। किस्मत देखिए, उनकी पहली ही फिल्म में नायक थे संजीव कुमार। शूटिंग के दौरान सुलक्षणा का दिल संजीव कुमार पर आ गया। उन्होंने अपने दिल की बात भी कह दी — शादी का प्रस्ताव रखा। लेकिन उस वक्त संजीव कुमार का दिल हेमा मालिनी के लिए धड़कता था। उन्होंने सुलक्षणा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। सुलक्षणा का दिल टूट गया, मगर प्यार नहीं मरा। उन्होंने तय कर लिया कि वो किसी और से शादी नहीं करेंगी।
दो अधूरे लोग — एक हेमा के लिए तन्हा, एक संजीव के लिए विरह में जिंदा
संजीव कुमार हेमा मालिनी को नहीं पा सके, और सुलक्षणा पंडित संजीव कुमार के बिना रह नहीं सकीं। दोनों की ज़िंदगी तन्हाई में बीती। एक दिन किस्मत ने और बड़ा वार किया — 1985 में संजीव कुमार का निधन हो गया। उसी पल सुलक्षणा की दुनिया बिखर गई। वो मानसिक रूप से टूट गईं, लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया। फिर कुछ साल बाद उनकी मां भी गुजर गईं और वो पूरी तरह अकेली हो गईं।
आखिरी गीत और मौन की ज़िंदगी
भाई के आग्रह पर 1996 में खामोशी: द म्यूज़िकल के लिए उन्होंने एक आखिरी गीत गाया — “सागर किनारे भी दो दिल हैं प्यासे।” इसके बाद उनकी आवाज़ फिर कभी सुनाई नहीं दी। वो दुनिया से कट गईं, अपने ही अतीत में जीने लगीं। शायद मन में कहीं ये उम्मीद बाकी थी कि एक दिन वो संजीव कुमार से फिर मिलेंगी — चाहे इस दुनिया में नहीं, पर किसी और लोक में जरूर।
6 नवंबर — जब इतिहास ने खुद को दोहराया
और फिर वही तारीख — 6 नवंबर। जिस दिन 40 साल पहले उनके जीवन का प्यार चला गया था, उसी दिन सुलक्षणा पंडित ने भी अपनी अंतिम सांस ली। क्या यह संयोग था या किसी अधूरे रिश्ते का पुनर्मिलन? शायद दोनों की आत्माएं वहीं कहीं एक-दूसरे को पा चुकी होंगी।
सुलक्षणा पंडित — वो नाम जो हमेशा ज़िंदा रहेगा
साल 2025 ने कई दिग्गज कलाकारों को हमसे छीन लिया, लेकिन सुलक्षणा पंडित की कहानी अलग है। उनकी ज़िंदगी एक याद दिलाती है — कि सच्चा प्यार सिर्फ़ पाने का नाम नहीं, बल्कि उस एहसास को निभाने का नाम है, जो ज़िंदगी से भी लंबा चलता है।
सुलक्षणा पंडित जी को शत-शत नमन। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।