10/09/2025
1990s में एक आम भारतीय सुबह अख़बार से होती थी, शाम को डीडी न्यूज़ या लोकल चैनल। ज़्यादा से ज़्यादा 5-10 खबरें, सीमित दायरे से यानि दिल्ली का नागरिक दिल्ली की खबरें जानता था, कोटा का अपना फोकस होता था।
लेकिन 4G इंटरनेट, सस्ते स्मार्टफोन और social media apps (Facebook, WhatsApp, X/Twitter, Instagram, YouTube Shorts) ने गाँव के व्यक्ति को भी एक साथ लद्दाख से केरल और बस्तर से गाज़ीपुर तक की खबरों से जोड़ दिया। अब न सिर्फ़ खबरें बढ़ गईं, बल्कि हर खबर एक क्लिक पर है। और खबरें भी ऐसी जो “Breaking” या “Sensational” बनने के लिए edit की जाती हैं।
Information Overload का Psychological और Behavioural Impact
1. Apathy (उदासीनता):
जब रोज़ 100 तरह की घटनाएँ दिखती हैं बच्चा borewell में गिरा, किसी नेता का scandal, सड़क पर हादसा, लव जिहाद, मर्डर..तो दिमाग उन्हें process नहीं कर पाता।
इंसान emotional burnout में चला जाता है.इसे “Empathy Fatigue” या “Compassion Collapse” भी कहते हैं.
2. Constant Engagement ka Pressure:
हर चीज़ पर राय बनाना, पोस्ट करना, स्टोरी शेयर करना एक pressure है.
बेसिकली “Opinion Manufacturing Culture”
जहां silence को भी guilt माना जाता है।
3. Toxic Comparison and Outrage Addiction:
Reels में किसी की success, किसी का tragedy सब कुछ एक ही स्क्रॉल में। इससे self-worth गिरती है और outrage-based content dopamine देता है और Audience खुद anger economy का हिस्सा बन जाती है।
बीते ३० साल में दुनिया बहुत तेजी से बदली है लेकिन पिछले १० साल में जो इनफार्मेशन ओवरलोड बढ़ा है उसके बहुत बुरे परिणाम आने वाले समय में हम समाज में देखेंगे.