08/08/2026
मेहमानों के जाते ही बहू ने पकोड़ों की खाली थाली मेज़ पर पटककर कहा—"रिश्ते निभाने हैं तो अपने खर्च पर निभाइए, हमारे घर को धर्मशाला मत बनाइए!" लेकिन उसी रात 10:40 बजे आए एक फोन ने हमारे पूरे परिवार के होश उड़ा दिए...
PART 1
दोपहर के साढ़े तीन बजे थे। उदयपुर की चुभती हुई धूप खिड़की के शीशों से छनकर कमरे में आ रही थी।
मैं उठी और बहू नेहा के कमरे की तरफ गई। वह अपने चेहरे पर हाथ रखे सो रही थी। सुबह छह बजे से वह रसोई में लगी हुई थी, इसलिए मेरा मन उसे जगाने का बिल्कुल नहीं था। लेकिन क्या करती, बाहर बैठक में मेहमान बैठे थे।
मैंने धीरे से उसके कंधे को छुआ।
— बहू, सुनो ना... उठ जाओ। जयपुर से मेहमान आए हैं।
वह झटके से उठी। उसने सामने दीवार घड़ी देखी। उसके चेहरे पर साफ़ चिढ़ दिख रही थी। वह बिना कुछ बोले सीधी बाथरूम चली गई।
थोड़ी देर बाद वह हल्की हरी साड़ी पहनकर बाहर आई। बैठक में मेरी ननद का बेटा विवेक और उसकी पत्नी मीरा बैठे थे। वे घूमकर लौट रहे थे और रास्ते में हमसे मिलने चले आए थे।
नेहा ने चेहरे पर एक फीकी मुस्कान लाकर नमस्ते किया। फिर वह सीधे रसोई में चली गई।
मैं भी उसके पीछे-पीछे रसोई में पहुँची। वह गैस पर चाय का बर्तन चढ़ा रही थी।
— ये लोग अचानक कैसे आ गए मम्मी जी? बिना बताए कोई ऐसे कैसे आ सकता है?
उसके लहज़े में गुस्सा साफ़ था। मैंने फ्रिज से आलू-प्याज़ निकालते हुए कहा—
— शहर आए थे बहू, तो मिलने आ गए। अपनों के यहाँ आने में कैसा पूछना?
उसने पत्ती का डिब्बा बहुत ज़ोर से स्लैब पर रखा।
— तो घूमकर सीधे घर जाते। यहाँ आकर हमारी दिनचर्या बिगाड़ने की क्या ज़रूरत थी?
मेरे हाथ रुक गए। मुझे उसका इस तरह बोलना बुरा लगा, पर मैं शांत रही।
— बहू, कल को तुम्हारे बच्चे भी अपने किसी रिश्तेदार के घर जाएँगे। अगर वे भी ऐसा सोचेंगे तो तुम्हें कैसा लगेगा?
उसने चाय में चीनी डाली और मुड़कर मुझे देखा।
— मैं अपने बच्चों को सिखाऊँगी कि किसी के घर बिना बुलाए बोझ न बनें। रिश्तेदारी का मतलब यह नहीं होता कि किसी के घर को मुफ़्त का होटल समझ लिया जाए। और सच कहूँ मम्मी जी, मुसीबत में ये रिश्तेदार कभी काम नहीं आते।
मेरे पास उसकी इस बात का कोई जवाब नहीं था। मैंने चुपचाप बेसन निकाला और फेटने लगी।
— अब यह किसलिए बना रही हैं?
— दूर से आए हैं बहू, चाय के साथ पकोड़े बना देते हैं।
नेहा ने एक गहरी साँस ली, चाकू उठाया और तेज़ी से आलू काटने लगी। रसोई में पकोड़ों की महक फैल गई, लेकिन मेरे दिल में एक अजीब सी भारीपन भर गई थी।
चाय-पकोड़े लेकर जब हम बाहर पहुँचीं, तो बातें होने लगीं। तभी विवेक की नज़र दीवार पर लगी मेरे बेटे नितिन की दुकान की तस्वीर पर पड़ी।
विवेक ने चाय का घूँट लिया और मुझसे पूछा—
— बुआ जी, नितिन भैया अब भी चेक पर पहले से साइन करके अपने पार्टनर महेश को दे देते हैं क्या?
मैं चौंकी।
— मुझे नहीं पता बेटा। नितिन दुकान की बातें घर पर नहीं करता।
मीरा ने अपने बैग से एक भूरा लिफाफा निकाला। उस पर नीला धागा बँधा था। उसने विवेक को दिया और विवेक ने वह लिफाफा मेरी तरफ बढ़ा दिया।
— बुआ जी, इसे संभालकर रख लीजिए। नितिन भैया आएँ तो उनके सामने ही खोलिएगा।
— इसमें क्या है विवेक?
— कुछ ज़रूरी कागज़ हैं। पहले मैं नितिन से बात कर लूँगा।
शाम छह बजे विवेक और मीरा जाने के लिए उठे। नेहा दरवाज़े पर खड़ी रही। जैसे ही उनकी गाड़ी गली के मोड़ से ओझल हुई, नेहा अंदर आई।
उसने मेज़ पर रखी पकोड़ों की खाली थाली उठाई और ज़ोर से मेरे सामने पटक दी।
— मम्मी जी, घर में नमकीन-बिस्कुट रखे थे। फिर भी आपने तेल, बेसन और गैस सब फुंकवा दिया। ऊपर से मेरी नींद खराब हुई सो अलग।
मैंने थाली उठानी चाही तो उसने थाली पीछे खींच ली।
— रिश्ते निभाने हैं तो अपने खर्च पर निभाइए! हमारे घर को धर्मशाला मत बनाइए!
उसकी आवाज़ सीधी मेरे कलेजे में चुभी। मैंने सिर्फ़ इतना कहा—
— ठीक है बहू। आज के बाद तुम्हें रसोई के काम के लिए नहीं कहूँगी।
मेरी शांति देखकर वह थोड़ा ठिठकी, फिर पैर पटकती हुई बर्तन धोने चली गई।
रात नौ बजे नितिन घर आया। थका हुआ था। खाना खाते समय भी वह बार-बार अपना फोन देख रहा था। उसने बताया कि बैंक वाले पुराने कागज़ माँग रहे हैं और महेश सब संभाल रहा है। मैंने अलमारी में रखे उस भूरे लिफाफे को निकालने की सोची, लेकिन नेहा कमरे में ही थी, इसलिए रुक गई।
रात दस बजकर चालीस मिनट पर नितिन का फोन बजा।
वह बात करने बालकनी में गया। दो मिनट बाद जब वह वापस लौटा, तो उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। उसके हाथ काँप रहे थे।
नेहा घबराकर उठी।
— क्या हुआ नितिन?
नितिन के होंठ सूख चुके थे। उसने टूटी आवाज़ में कहा—
— बैंक ने हमारी कंपनी का अकाउंट सीज़ कर दिया है। महेश भाग गया है... और बैंक कह रहा है कि अड़तालीस लाख के कर्ज़ के कागज़ों पर मेरे दस्तखत हैं।
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
मेरी नज़र सीधे अलमारी के उस नीले धागे वाले भूरे लिफाफे पर गई।
लेकिन असली खेल तो उस लिफाफे के खुलने के बाद शुरू होना बाकी था...