30/05/2026
आज से ठीक 159 साल पहले, 30 मई 1866 को सहारनपुर ज़िले के देवबंद कस्बे में एक ऐसे इदारे की बुनियाद रखी गई जिसने आगे चलकर पूरे हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाई — “दारुल उलूम देवबंद”।
1857 के इंकलाब के बाद जब मुग़ल सल्तनत का अंत हो चुका था और हिंदुस्तान पर अंग्रेज़ी हुकूमत का दबदबा बढ़ रहा था, उस दौर में कई मुस्लिम उलेमा को यह एहसास हुआ कि दीन, इल्म और इस्लामी तहज़ीब की हिफ़ाज़त के लिए एक मज़बूत तालीमी इदारे की ज़रूरत है। इसी सोच के तहत मौलाना मुहम्मद क़ासिम नानौतवी, मौलाना रशीद अहमद गंगोही, हाजी आबिद हुसैन और उनके साथियों ने देवबंद में दारुल उलूम की नींव रखी।
दिलचस्प बात यह है कि दारुल उलूम की शुरुआत किसी भव्य इमारत से नहीं हुई थी। इसकी पहली कक्षा देवबंद की छत्ता मस्जिद में एक अनार के पेड़ के नीचे लगाई गई थी और पहले उस्ताद मौलाना महमूद देओबंदी थे, जबकि पहले छात्र मौलाना महमूद हसन बने, जिन्हें बाद में “शैख़ुल हिंद” के नाम से जाना गया।
मौलाना क़ासिम नानौतवी का नाम सिर्फ़ तालीम से नहीं बल्कि 1857 की जद्दोजहद से भी जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार वह “शामली की जंग” में मौलाना इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की और मौलाना रशीद अहमद गंगोही के साथ अंग्रेज़ी फौज के खिलाफ मौजूद थे। हालांकि यह लड़ाई इंकलाबी फ़ौज के हक़ में नहीं रही, लेकिन इसके बाद उलेमा ने इल्म और तालीम के ज़रिये अपनी तहरीक को ज़िंदा रखा।
उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दौर में भारतीय मुसलमानों के भीतर तालीम को लेकर अलग-अलग सोच उभर रही थीं। एक तरफ़ सर सैय्यद अहमद ख़ाँ आधुनिक और अंग्रेज़ी शिक्षा को अपनाने पर ज़ोर दे रहे थे, वहीं देवबंद के उलेमा पारंपरिक इस्लामी तालीम और दर्स-ए-निज़ामी के संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बना रहे थे। दोनों की राह अलग थी, लेकिन दोनों अपने-अपने तरीके से मुस्लिम समाज की बेहतरी चाहते थे।
आगे चलकर देवबंद से जुड़े कई उलेमा भारतीय आज़ादी की तहरीकों में भी सक्रिय दिखाई देते हैं। मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना किफ़ायतुल्लाह देहलवी और दूसरे कई उलेमा ने 1919 में “जमीयत उलेमा-ए-हिंद” की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। अंग्रेज़ी हुकूमत के विरोध के कारण इनमें से कई उलेमा को जेलों में भी डाला गया और कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ा।
आज दारुल उलूम देवबंद दक्षिण एशिया के सबसे प्रभावशाली इस्लामी शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है और इसके फ़ारिग़ीन दुनिया के कई देशों में दीन, तालीम और समाजी ख़िदमत के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
📚 References:
• Syed Mehboob Rizwi, History of Darul Uloom Deoband, Vol. 1, pp. 111–118 (स्थापना और शुरुआती दौर)
• Syed Mehboob Rizwi, History of Darul Uloom Deoband, Vol. 1, pp. 54–62 (शामली की जंग और 1857)
• Barbara D. Metcalf, Islamic Revival in British India: Deoband 1860–1900, pp. 34–47, 90–96
• Mohammad Mian, Ulama-e-Hind Ka Shandaar Maazi, Vol. 1, pp. 223–240 (जमीयत उलेमा-ए-हिंद)
• Husain Ahmad Madani, Naqsh-e-Hayat, Vol. 2, pp. 70–85
• Darul Uloom Deoband Official History (Foundation: 31 May 1866 / 15 Muharram 1283 AH)