22/09/2026
बधाई का ‘टैक्स’ और लाचार खुशियां
कहते हैं कि बेटियां घर में लक्ष्मी का रूप बनकर आती हैं। हमारे घर भी लक्ष्मी आई, तो चारों तरफ खुशियों का माहौल था। हर कोई मुस्कुरा रहा था, लेकिन तभी दरवाजे पर एक ऐसी ‘सशस्त्र सेना’ ने दस्तक दी, जिसके आगे अच्छे-अच्छे सूरमाओं के पसीने छूट जाते हैं। जी हां, हमारे आंगन में किन्नर पधार चुके थे।
परंपरा कहती है कि किन्नर दुआएं देने आते हैं, लेकिन आज की हकीकत यह है कि वे दुआओं का 'प्रीपेड रिचार्ज' करवाने आते हैं, और वह भी अपनी मर्जी के महंगे प्लान के साथ!
जैसे ही उन्हें पता चला कि घर में बेटी हुई है, उनके चेहरों पर दुआओं से ज्यादा 'रिकवरी एजेंट' वाली चमक आ गई। उन्होंने सीधे पांच अंकों वाली एक ऐसी धनराशि की मांग रख दी, जिसे सुनकर लगा कि शायद वे बच्ची का नामकरण करने नहीं, बल्कि उसका कॉलेज फंड एडवांस में लेने आए हैं। जब हमने विनम्रतापूर्वक वाराणसी प्रशासन और पुलिस की गाइडलाइंस का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने नेग की सीमा तय की है, तो उनका रूप बदल गया।
फिर शुरू हुआ कुतर्कों का वह दौर, जिसके सामने देश के बड़े से बड़े वकील भी फेल हो जाएं। ताली बजाने की गति के साथ उनकी भाषा का स्तर भी नीचे गिरने लगा। जो जुबान कुछ देर पहले 'जुग-जुग जियो' कहने के लिए खुली थी, वह अब अभद्रता और ऐसी गंदी बातों की बौछार कर रही थी कि कान बंद करने पड़ जाएं।
देश में इनकम टैक्स, जीएसटी और न जाने कितने टैक्स हैं, जिनसे बचने के लिए सरकार नियम बनाती है। लेकिन इस 'बधाई टैक्स' का कोई ऑडिट नहीं होता। यहां न तो कोई रसीद मिलती है और ना ही कोई डिस्काउंट। अगर आप इनके मनमुताबिक पैसे न दें, तो ये अपनी दुआओं को तुरंत 'श्राप' के सॉफ्टवेयर में अपग्रेड करने की धमकी देने लगते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या किसी की दुआएं इतनी कमजोर और बिकाऊ हो सकती हैं कि चंद कागजी नोट कम मिलने पर वे बददुआ में बदल जाएं? संस्कृति और परंपरा के नाम पर चल रही यह गुंडागर्दी आखिर कब तक चलेगी?
सरकार व प्रशासन ने ट्रांसजेंडर टॉयलेट व नियम तो बना दिए हैं कि शादी पर ₹1100 और बच्चे के जन्म पर ₹500 से ज्यादा जबरन नहीं लिया जा सकता, लेकिन इन नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए जब ये लोग घर में घुसकर हंगामा करते हैं, तो शरीफ इंसान अपनी इज्जत बचाने के लिए झुक जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि समाज इस अभद्रता के खिलाफ एकजुट हो, क्योंकि खुशियां कभी किसी के दबाव या डर की मोहताज नहीं होनी चाहिए।
बधाई मांगना कभी एक लोक-परंपरा थी, जहाँ दुआओं की महत्ता होती थी और पैसों की हैसियत महज़ एक शगुन की। लेकिन आज के 'आधुनिक' किन्नर समाज ने इस पवित्र परंपरा को एक हाई-प्रोफाइल 'रिकवरी बिजनेस' में बदल दिया है। ऐसा लगता है कि अब दुआएं दिल से नहीं, बल्कि सीधे बैंक के लॉकर से निकलती हैं।
आज के कुछ गुटों का रवैया देखकर लगता है कि उन्होंने बाकायदा एक 'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी' खोल ली है। शहर के वार्ड और मुहल्ले इनके 'बिजनेस टेरिटरी' (व्यापारिक क्षेत्र) बन चुके हैं, जहाँ किसी दूसरे गुट की एंट्री का मतलब है—गैंगवार!
किन्नर समाज के लिए सोचने वाली बात यह है:
अगर पाँच अंकों की रकम मिली, तो दुआओं का नेटवर्क 'फुल 5G' स्पीड से काम करेगा। और अगर किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार ने अपनी जेब के हिसाब से शगुन थमा दिया, तो दुआएं तुरंत 'बददुआ और अभद्रता' के वायरस में बदल जाती हैं। क्या दुआओं का कोई 'मिनिमम सपोर्ट प्राइस' (MSP) होता है?
ताली की गूँज बनाम खौफ: किसी ज़माने में आपके आने की ताली सुनकर लोग खुश होते थे कि घर में कोई मंगल काम होने वाला है। आज लोग ताली की आवाज़ सुनते ही दरवाज़े और खिड़कियाँ ऐसे बंद कर लेते हैं जैसे कोई टैक्स वसूलने वाला 'विजिलेंस दस्ता' आ गया हो। सम्मान की जगह खौफ पैदा करना कहाँ की समझदारी है?
संस्कार और भाषा की गिरावट: समाज में आपकी पहचान एक विशिष्ट और पूजनीय स्थान की थी। लेकिन सरेआम गंदी बातें करना, गाली-गलौज करना और अभद्रता पर उतर आना आपके अपने ही समाज की गरिमा को तार-तार कर रहा है।
एक कड़वा सच:जिस आदर और अधिकारों (Transgender Rights) के लिए सिनेमा से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी गई, उसे चंद लालची गुटों की बदतमीजी सड़क पर नीलाम कर रही है। जब तक आप अपने ही समाज के भीतर बैठे इन 'वसूली भाईयों' को नहीं रोकेंगे, तब तक आम जनता के दिल में आपके प्रति सम्मान की जगह सिर्फ डर और नफ़रत ही बचेगी। सच्ची दुआ वो है जो स्वेच्छा से मिले ₹1100 में भी उतनी ही शिद्दत से निकले, जितनी ₹10,000 में निकलती है। वरना ज़बरदस्ती छीनी गई रकम को 'नेग' नहीं, 'उगाही' कहते हैं!
अंत में बस इतना ही रुपए-पैसे तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो सम्मान एक बार चला जाए, वह दोबारा लौटकर नहीं आता। असली नेग वो है जो इंसान अपनी खुशी से, मुस्कुराते हुए आपकी झोली में डाले, चाहे वह एक छोटा सा सिक्का ही क्यों न हो। डर की छांव में वसूली गई रकम से कभी किसी का घर नहीं फलता-फूलता। काश, यह समाज फिर से अपनी उसी पुरानी गरिमा को पहचान पाए, जहाँ पैसों की भूख से बड़ी दुआओं की ताकत हुआ करती थी।
महादेव सद्बुद्धि दे 🙌
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