Satyendra Kumar Sharma

Satyendra Kumar Sharma लेखक।कवि।स्वच्छता दूत-२०२१ नगर निगम वाराणसी।संस्थापक-मेरा देश मेरा दायित्व।पर्यावरण के प्रति सक्रिय।

लेखक:
१.एहसास की स्याही (१) काव्य संग्रह
२.नारी शक्ति और संकल्प
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३.Training Head (Personality Development)
४.मेरा देश मेरा दायित्व के संस्थापक व अध्यक्ष

संत रविदास जी: समता, कर्म और भक्ति के अद्वितीय प्रतीक---​संत रविदास (संत रैदास) भारतीय भक्ति आंदोलन के वे महान संत हैं, ...
04/08/2026

संत रविदास जी:
समता, कर्म और भक्ति के अद्वितीय प्रतीक---
​संत रविदास (संत रैदास) भारतीय भक्ति आंदोलन के वे महान संत हैं, जिनकी वाणी और विचार सदियों बाद भी समाज को नई दिशा और रोशनी दे रहे हैंमाघ पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर प्रकट हुए संत रविदास जी ने अपने जीवन और पदों के माध्यम से समाज को यह सिखाया कि इंसान अपने जन्म या जाति से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और विचारों से महान बनता है।

​सादगी और श्रम निष्ठा की मिसाल---
​संत रविदास जी ने हमेशा 'कर्म ही पूजा है' के सिद्धांत को जिया...
उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं और मोह-माया से दूर रहकर अपने हाथों से जूते बनाने का काम किया (चर्मकार) और अपनी मेहनत की कमाई से ही जीवन बिताया।
उनका यह संदेश आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है कि ईमानदारी की मेहनत से बड़ा कोई धर्म नहीं है।

​समतामूलक समाज की कल्पना: 'बेगमपुरा'
​संत रविदास जी ने एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की थी जहाँ किसी भी प्रकार का भेदभाव, ऊंच-नीच, दुःख या गरीबी न हो। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना में इस नगर का नाम 'बेगमपुरा' (यानी ऐसा शहर जहाँ कोई गम या चिंता न हो) रखा था:
​“ऐसी चाह राज मैं जहॉ मिलै सबहिं को अन्न।
छोटे-बड़े सब सम बसैं, रविदास रहै प्रसन्न।।”

​उनकी यह परिकल्पना एक ऐसे समतावादी और न्यायप्रिय समाज का सपना है, जहाँ हर व्यक्ति को स्वतंत्रता और सम्मान मिले।
​मानवता और प्रेम का संदेश---
​उन्होंने जात-पात और बाह्य दिखावे का कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट किया कि ईश्वर की नजर में सब बराबर हैं। उन्होंने कहा था:
​“जात-जात में जात हैं, जो केतन के पात।
रविदास मनुस ना जुड़ सकैं, जब तक जात न पात।।”

​उनके अनुसार, ईश्वर को पाने के लिए किसी कर्मकांड या जातिगत श्रेष्ठता की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इसके लिए शुद्ध अंतःकरण, प्रेम और सच्ची मानवता जरूरी है।

दोस्तों,​संत रविदास जी केवल एक संत नहीं, बल्कि एक सच्चे समाज सुधारक थे।
उनके विचार आज भी हमें अहंकार छोड़कर मानवता के मार्ग पर चलने और हर इंसान में ईश्वर का अंश देखने की प्रेरणा देते हैं।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है जो समाज को जोड़े और दिलों की दूरियों को मिटा दे।
#कलमसत्यकी ✍️©️

04/08/2026

सफलता_के_बेमिसाल_8_साल 🙏
मानवता की सेवा को पूर्ण हुए 8 साल।
आप सभी के प्रेम, सहयोग एंव आशीर्वाद से आप की अपनी संस्था *खाना_बैंक_ट्रस्ट* को आठ वर्ष हुए पूर्ण।

*घृणा,अविश्वास और भय से भरा मनुष्य सब से पहले "अपशब्द"* का हथियार इस्तेमाल करता है ! इस का उत्तर जो *मुस्कान* से दे दे वो निश्चित विजयी होता है !
विगत आठ वर्ष पूर्व आज ही के दिन जब सड़क किनारे संघर्ष कर रहे मजदूरो,पीड़ितों, वंचितों और शोषितों को भोजन कराने के संकल्प के साथ जब हम सभी ने भोजन वितरण प्रारंभ किया था तो भोजन प्राप्त करने वाले कि टिप्पणी से कभी-कभी मन व्याकुल हो जाता था। लेकिन वास्तव में उक्त टिप्पणियों को मैंने हथियार की भांति लिया, फलस्वरूप लोग आते गए और कारवाँ बनता गया और मुहिम इतना विस्तारित हो गया कि शायद ही कोई #खाना_बैंक_ट्रस्ट को आज की तिथि में नहीं जानता हो।
गौरतलब हो कि विगत आठ वर्षों में संगठन बिना एक भी दिन रुके अनवरत अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र है। जिसकी सकारात्मक प्रतिफल लोगों की जागरूक सोच है। जिसे हम अपने नगर में देख, समझ और महसूस कर रहे है।
जय हिन्द 🇮🇳

अंकित जी की कलम से Ankit S Tripathi

आप यूं ही ने कार्य करते रहिए ।बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद आप पर सदैव बना रहे। Ankit S Tripathi ji
04/08/2026

आप यूं ही ने कार्य करते रहिए ।
बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद आप पर सदैव बना रहे।
Ankit S Tripathi ji

 #कलमसत्यकी ✍️©️दौर चाहे कोई भी हो, चेहरे बदल जाते हैं,वक़्त की ढलान पर अपनों के तेवर बदल जाते हैं।
02/08/2026

#कलमसत्यकी ✍️©️
दौर चाहे कोई भी हो, चेहरे बदल जाते हैं,
वक़्त की ढलान पर अपनों के तेवर बदल जाते हैं।

25/07/2026

#कलमसत्यकी
Narendra Modi Shri Yogi Adityanath
आदरणीय मोदी जी।
सादर प्रणाम।
मुझे व्यक्तिगत रूप से धर्मेंद्र प्रधान जी का इस्तीफा अच्छा नहीं लगा।
इस पूरे धरना प्रदर्शन में जो कुछ मैंने देखा उससे यह समझ में आया कि यह लोग neet विद्यार्थियों के लिए नहीं अपितु भारत में जो सरकार है उसको गिराने के लिए आंदोलन कर रहे थे....
गंदी गालियां, अभद्र प्रदर्शन, नीच अभिव्यक्ति, यह किसी विद्यार्थी के लक्षण नहीं लगते हैं।
उसके बाद भारत को टुकड़े करने का आंदोलन, आतंकवादियों के लिये सहयोग आंदोलन, ऐसे प्रदर्शन जो किसी भी सभ्य समाज के लिए भद्दा हो सकता है वह सारे प्रदर्शन वह लोग कर रहे थे।
सनातन को गाली देना, ब्राह्मणवाद को गाली देना और साथ ही प्रतीकात्मक रूप में प्रधानमंत्री के मुंह में लिंग डालना,
इटली के प्रधानमंत्री मेलानी की गुप्त अंग और प्रधानमंत्री के गुप्त अंग का मिश्रण करना यह कहीं से भी किसी Neet विद्यार्थी का विचार नहीं हो सकता है।
उसके बाद यह बोलना की सड़क पर ही तय होगा कि संसद में क्या होगा, यह सभी बातें कहीं ना कहीं यह तय करता है कि वह लोग भारत के खिलाफ ही बात कर रहे थे।
इन सब बातों को सुनने के बाद भी अगर आप समर्पण करते हैं तो कहीं नहीं कहीं आप कमजोर हैं।
यह दिखाता है कि आपका स्वर्ण के लिए कोई मानसिकता सकारात्मक नहीं है।
अगर आने वाली सभी सरकारों को स्वर्ण के लिए कुछ नहीं करना है तो कम से कम कोई उन्हें गाली ना दे इसके लिए आपको काम करना पड़ेगा।
यह सवर्ण कोई लावारिस नहीं है।
मेरा देश मेरा दायित्व सेवा कुटीर सभी वृद्धो के लिए काम करता है, कभी जाति धर्म के पैमाने पर कोई काम नहीं करता है.....
अगर आपने इस आंदोलन के सामने समर्पण किया है तो कहीं नहीं कहीं यह साबित करता है कि आप स्वर्ण को नीचा दिखाना चाहते हैं और यह बहुत ही चिंताजनक है।
भीम कैसे भी बने यह दुनिया जानती है।
बुद्ध कैसे बुद्ध बने यह दुनिया जानती है।
आपका समर्पण और इस्तीफा कहीं ना कहीं बहुत ही निराशाजनक है।
क्या हम सवर्ण इसलिए बने हैं कि हम गाली खाएं।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी हम इतने कमजोर नहीं हैं।
जिलाधिकारी बनने के बाद, सांसद बनने के बाद, यह लोग कहते हैं कि हम दलित हैं।।।
यह कौन सी शिक्षा नीति है??
जंतर मंतर पर बैठकर देश विरोधी नारा लगाने वालों को आपने ताकत दे दी है ,यह कहीं ना कहीं बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

23/07/2026

#कलमसत्यकी ✍️©️
तू वो कर जो तू करना चाहता ह,
तू वो न कर जो तू करने को मजबूर है।

तू वो कर जो तेरा जमीर कहता है,
तू वो न कर जो तेरे कौम का अमीर कहता है।

तू वो कर जो करने के लिए ये जनम पाया है,
तू वो न कर जो बचपन से बंद कमरों में रटता आया है।

Father's Concern #पिता
23/07/2026

Father's Concern
#पिता

  MDMDT
18/07/2026

MDMDT

 #कलमसत्यकी ✍️©️समय की परछाइयां:बुजुर्गों के अनकहे दर्द और खामोश मुस्कान​उम्र का हर पड़ाव एक कहानी सुनाता है, लेकिन बुढ़ाप...
12/07/2026

#कलमसत्यकी ✍️©️
समय की परछाइयां:
बुजुर्गों के अनकहे दर्द और खामोश मुस्कान
​उम्र का हर पड़ाव एक कहानी सुनाता है, लेकिन बुढ़ापे की कहानी अक्सर खामोशी की स्याही से लिखी जाती है।
जब शरीर की गति धीमी होती है, तब मन की हलचलें तेज हो जाती हैं।
आज के भागदौड़ भरे युग में, हमारे घर के बुजुर्ग उस 'बीते कल' की तरह हैं, जिसे हम सहेजकर तो रखना चाहते हैं, लेकिन उसे समय देने की फुरसत किसी के पास नहीं।

​शरीर का दर्द: जो आँखों में दिखता है
​जो हाथ कभी घर की नींव मजबूत करते थे, आज वे चाय का प्याला थामने में भी कांपते हैं।
यह केवल जोड़ों का दर्द नहीं है, यह उस सामर्थ्य के खोने का दर्द है जो कभी उनकी पहचान हुआ करती थी।
डॉक्टरी भाषा में इसे 'गठिया' या 'कमजोरी' कहा जाता है, लेकिन असल में यह उन वर्षों का थकान है जो उन्होंने दूसरों के सपनों को पूरा करने में बिता दिए।

​एकांत का बोझ: सबसे बड़ा घाव
​अक्सर कहा जाता है कि बुजुर्गों को केवल दवाई और भोजन की जरूरत होती है। पर असलियत यह है कि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत 'संवाद' की होती है।
​अनसुनी बातें: जब वे पुरानी बातें दोहराते हैं, तो वह केवल यादें नहीं होतीं, वह उनका वर्तमान होता है जिसमें वे खुद को जिंदा महसूस करते हैं।
​डिजिटल दीवार:
आज के दौर की स्क्रीन ने पीढ़ियों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जहाँ बुजुर्ग अपने ही घर में 'डिजिटल रूप से बेघर' महसूस करते हैं।
​'उपयोगिता' का छिन जाना
​एक इंसान के लिए सबसे बड़ा दर्द है खुद को 'बेकार' महसूस करना। जीवन भर दूसरों की जरूरत बने रहने के बाद, जब उन्हें महसूस होता है कि अब उनकी सलाह या उपस्थिति को 'काम का बोझ' समझा जा रहा है, तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता है। वह खामोशी जो आप उनके कमरे से देखते हैं, वह कोई शांति नहीं, बल्कि अपनी प्रासंगिकता खोने का एक लंबा शोक है।
​हम क्या कर सकते हैं?
​उनकी दुनिया को फिर से रंगों से भरने के लिए किसी बड़े निवेश की नहीं, बस थोड़ी सी संवेदना की आवश्यकता है:
​"सम्मान और समय — ये दो चीजें बुजुर्गों के लिए किसी भी जीवन रक्षक औषधि से अधिक प्रभावी होती हैं।"
​सक्रिय श्रोता बनें: उनके पास बैठें, उनकी वही पुरानी कहानियां फिर से सुनें। उन्हें लगेगा कि उनकी मौजूदगी अभी भी मायने रखती है।
​छोटे कार्यों में भागीदारी: उन्हें घर के छोटे-मोटे फैसलों में शामिल करें। उन्हें यह एहसास दिलाना जरूरी है कि वे आज भी इस घर के 'स्तंभ' हैं।
​स्पर्श की शक्ति: एक बार उनका हाथ थामकर पूछ लेना कि "आज कैसा महसूस कर रहे हैं?", उनके आधे दर्द को कम करने के लिए पर्याप्त है।
​निष्कर्ष
बुजुर्ग हमारे घर की वे जड़ें हैं, जिन्हें हम देख तो नहीं पाते, लेकिन उन्हीं की बदौलत हम फले-फूले हैं।
बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का वह 'सुनहरा सूर्यास्त' है, जिसके लिए उन्हें किसी उपेक्षा की नहीं, बल्कि थोड़े से प्रेम और कृतज्ञता की दरकार है।
आइए, उनके इस सफर को थोड़ा और सहज और सम्मानजनक बनाएं।
मेरा देश मेरा दायित्व सेवा कुटीर बुजुर्गों के जीवन को बेहतरीन बनाने के लिए ही समर्पित है।
हम कोई वृद्ध आश्रम नहीं चलाते।
हम तो उनके साथ जीते हैं।
सुबह शाम उनकी आंखों को देखकर के उनके भाव को समझने का प्रयास करते हैं।
बहुत बहुत धन्यवाद।
सत्येंद्र शर्मा सत्य।
मेरा देश मेरा दायित्व।
सेवा कुटीर।
चंदापुर उदयपुर वाराणसी।

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