21/01/2026
एक शहर के कोने में, कूड़े के ढेर के पास, फटी-पुरानी कपड़ों में लिपटी एक छोटी-सी बच्ची बैठी थी। उसके नन्हे हाथों में आधा सा बन था—वही उसका आज का भोजन और शायद उसकी पूरी दुनिया। आँखों में भूख थी, पर शिकायत नहीं। चेहरे पर दर्द था, पर होंठों पर कोई सवाल नहीं।
लोग आते-जाते रहे…
कोई रुका नहीं।
कोई झुका नहीं।
वह बच्ची चुपचाप बन खाती रही और मन ही मन आसमान की ओर देखती रही। न उसने माँगा, न रोई—बस बैठी रही। उसी क्षण, बादलों के बीच से एक दिव्य प्रकाश फैलने लगा। आकाश शांत हो गया, जैसे समय थम गया हो।
वहाँ प्रकट हुए महादेव—भस्म से अलंकृत शरीर, जटाओं से बहती गंगा, मस्तक पर चंद्रमा और हाथ में त्रिशूल। उनकी आँखों में कठोरता नहीं, केवल करुणा थी। उन्होंने नीचे देखा—उस छोटी बच्ची को।
महादेव ने आशीर्वाद का हाथ उठाया।
एक उजली किरण बच्ची पर पड़ी।
उसके भीतर कुछ बदल गया—भूख अब भी थी, पर मन को शांति मिल गई। जैसे किसी ने कह दिया हो,
“तू अकेली नहीं है।”
उस दिन बच्ची को कोई धन नहीं मिला, कोई महल नहीं मिला…
पर उसे मिला विश्वास।
और जब विश्वास मिल जाए, तो जीवन की सबसे बड़ी भूख मिट जाती है।
क्योंकि
भगवान मंदिरों में नहीं,
बेबस दिलों में प्रकट होते हैं।
🔱 ॐ नमः शिवाय 🔱