08/08/2025
भगवद गीता – अध्याय 3 (कर्म योग)
अध्याय 3 का उद्देश्य
श्री कृष्ण ने इस अध्याय में अर्जुन को यह समझाया कि केवल ज्ञान प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्तव्य के रूप में कर्म करना आवश्यक है।
इसका मुख्य उद्देश्य है:
1. मनुष्य को अपने कर्तव्य कर्म बिना फल की इच्छा के करना चाहिए।
2. संसार में यज्ञचक्र चलता है — अर्थात परस्पर सहयोग और सेवा से जीवन चलता है।
3. केवल कर्म का त्याग करने से मुक्ति नहीं मिलती; कर्म को भगवान को समर्पित करके करना ही मुक्ति का मार्ग है।
4. काम और क्रोध ही मनुष्य के पतन का कारण हैं; इन्हें संयम और विवेक से वश में करना चाहिए।
अध्याय 3 का सार
अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार में दो मार्ग हैं — ज्ञानयोग (ध्यान, मनन) और कर्मयोग (कर्तव्य पालन)।
कर्म त्यागकर जीवन नहीं चलता, इसलिए नियत कर्म आवश्यक है।
कर्म को यज्ञभावना से करने पर वह बंधन नहीं देता।
श्रेष्ठ लोग कर्म करके समाज को प्रेरित करते हैं, इसलिए ज्ञानी भी कर्म करते हैं।
हर व्यक्ति को अपने स्वधर्म (अपना कर्तव्य) में लगे रहना चाहिए, चाहे वह कठिन ही क्यों न हो।
काम और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होकर ज्ञान को ढँक देते हैं; इन पर विजय पाना जरूरी है।
आत्मा इंद्रियों, मन और बुद्धि से भी श्रेष्ठ है, इसलिए बुद्धि से मन को वश में करके आसक्ति रहित कर्म करना ही सर्वोत्तम है।