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"श्रीमद्भगवद्गीता का सार — आसान भाषा में"

अध्याय 3 – कर्मयोग (कर्म का महत्व)श्लोक 4न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥...
24/01/2026

अध्याय 3 – कर्मयोग (कर्म का महत्व)
श्लोक 4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥३-४॥

अनुवाद:
केवल कर्मों का त्याग करने से कोई निष्कर्म (कर्म से मुक्ति) को प्राप्त नहीं होता, और केवल संन्यास लेने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
सरल अर्थ:
सिर्फ़ काम छोड़ देने या संन्यासी बन जाने से मुक्ति नहीं मिलती।

अद्ध्याय-३ (कर्मयोग) श्लोक 4न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥३-४॥अनुवाद:के...
05/09/2025

अद्ध्याय-३ (कर्मयोग)

श्लोक 4

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥३-४॥

अनुवाद:
केवल कर्मों का त्याग करने से कोई निष्कर्म (कर्म से मुक्ति) को प्राप्त नहीं होता, और केवल संन्यास लेने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

सरल अर्थ:
सिर्फ़ काम छोड़ देने या संन्यासी बन जाने से मुक्ति नहीं मिलती।

श्लोक 3श्रीभगवानुवाच —लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥३-३॥अनुवाद...
05/09/2025

श्लोक 3

श्रीभगवानुवाच —
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥३-३॥

अनुवाद:
श्रीभगवान बोले – हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा बताई गई है – सांख्य योगियों के लिए ज्ञानयोग और कर्मयोगियों के लिए कर्मयोग।

सरल अर्थ:
भगवान कहते हैं – दो मार्ग हैं: (1) ज्ञान का मार्ग और (2) कर्म का मार्ग। दोनों ही अपने-अपने स्थान पर उचित हैं।

अध्याय 3 – कर्म योगश्लोक 2व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥सरल अर्थ:आप...
10/08/2025

अध्याय 3 – कर्म योग
श्लोक 2
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥

सरल अर्थ:
आपके मिश्रित वचनों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है। कृपा करके निश्चित रूप से बताइए कि मेरे लिए क्या श्रेष्ठ है।

अध्याय 3 – कर्म योगश्लोक 1अर्जुन उवाच:ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥सरल...
09/08/2025

अध्याय 3 – कर्म योग
श्लोक 1
अर्जुन उवाच:
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

सरल अर्थ:
अर्जुन बोले — हे जनार्दन! यदि ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे इस भयानक युद्ध में क्यों लगाते हैं?

भगवद गीता – अध्याय 3 (कर्म योग)अध्याय 3 का उद्देश्यश्री कृष्ण ने इस अध्याय में अर्जुन को यह समझाया कि केवल ज्ञान प्राप्त...
08/08/2025

भगवद गीता – अध्याय 3 (कर्म योग)
अध्याय 3 का उद्देश्य
श्री कृष्ण ने इस अध्याय में अर्जुन को यह समझाया कि केवल ज्ञान प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्तव्य के रूप में कर्म करना आवश्यक है।
इसका मुख्य उद्देश्य है:
1. मनुष्य को अपने कर्तव्य कर्म बिना फल की इच्छा के करना चाहिए।
2. संसार में यज्ञचक्र चलता है — अर्थात परस्पर सहयोग और सेवा से जीवन चलता है।
3. केवल कर्म का त्याग करने से मुक्ति नहीं मिलती; कर्म को भगवान को समर्पित करके करना ही मुक्ति का मार्ग है।
4. काम और क्रोध ही मनुष्य के पतन का कारण हैं; इन्हें संयम और विवेक से वश में करना चाहिए।

अध्याय 3 का सार
अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार में दो मार्ग हैं — ज्ञानयोग (ध्यान, मनन) और कर्मयोग (कर्तव्य पालन)।
कर्म त्यागकर जीवन नहीं चलता, इसलिए नियत कर्म आवश्यक है।
कर्म को यज्ञभावना से करने पर वह बंधन नहीं देता।
श्रेष्ठ लोग कर्म करके समाज को प्रेरित करते हैं, इसलिए ज्ञानी भी कर्म करते हैं।
हर व्यक्ति को अपने स्वधर्म (अपना कर्तव्य) में लगे रहना चाहिए, चाहे वह कठिन ही क्यों न हो।
काम और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होकर ज्ञान को ढँक देते हैं; इन पर विजय पाना जरूरी है।
आत्मा इंद्रियों, मन और बुद्धि से भी श्रेष्ठ है, इसलिए बुद्धि से मन को वश में करके आसक्ति रहित कर्म करना ही सर्वोत्तम है।

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 72 का अर्थ:-हे अर्जुन! यह स्थिति ब्रह्म में स्थित होने की है। जो इसमें स्थित होता है, वह ...
19/07/2025

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 72 का अर्थ:-

हे अर्जुन! यह स्थिति ब्रह्म में स्थित होने की है। जो इसमें स्थित होता है, वह कभी भ्रमित नहीं होता। और जो अंत समय में भी इसी स्थिति में रहता है, वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 71 का अर्थ:-जो मनुष्य सभी कामनाओं को त्यागकर, निरासक्त, निस्वार्थ और अहंकाररहित होकर चलता...
19/07/2025

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 71 का अर्थ:-

जो मनुष्य सभी कामनाओं को त्यागकर, निरासक्त, निस्वार्थ और अहंकाररहित होकर चलता है – वही सच्ची शांति को प्राप्त करता है।

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 70 का अर्थ:-जैसे नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं पर वह स्थिर रहता है, वैसे ही जो व्यक्त...
19/07/2025

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 70 का अर्थ:-

जैसे नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं पर वह स्थिर रहता है, वैसे ही जो व्यक्ति कामनाओं से घिरा होने पर भी विचलित नहीं होता, वही शांति को प्राप्त करता है, न कि जो इच्छाओं के पीछे भागता है।

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 69 का अर्थ:-जो बात सामान्य लोगों के लिए रात (अंधकार और अज्ञान) के समान है, उसमें संयमी व्...
19/07/2025

अध्याय 2 (सांख्य योग) के श्लोक 69 का अर्थ:-

जो बात सामान्य लोगों के लिए रात (अंधकार और अज्ञान) के समान है, उसमें संयमी व्यक्ति जागरूक रहता है; और जिसमें सामान्य लोग जागते हैं (भोग-विलास में), उसमें ज्ञानी पुरुष अंधकार देखता है।

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