01/01/2026
" 1 जनवरी की इस बेरहम, ठिठुरती खामोशी में, तुम्हारी यादों की अलाव तापते हुए।"
मेरी जान,
बाहर दिसंबर अपनी पूरी हेकड़ी के साथ खड़ा है। हवाएं ऐसे चल रही हैं जैसे किसी पुराने दुश्मन ने बदला लेने की कसम खा ली हो। शहर ने कोहरे की एक मटमैली चादर ओढ़ रखी है, ठीक वैसे ही जैसे उदासी मेरे मन को ओढ़े रहती है जब तुम पास नहीं होती। खिड़की के शीशे पर जमा हुई धुंध उस झीनी सी उम्मीद की तरह लग रही है, जिसके पार देखने की मैं हर रोज़ कोशिश करता हूँ–कि शायद तुम उस मोड़ से आती दिखाई दे जाओ।
तुम्हें पता है? ठंड महज़ तापमान का गिरना नहीं है। यह एक अवस्था है–अकेलेपन की, इंतज़ार की, और उस सिहरन की जो स्वेटर की तीन परतों को भेदकर सीधे रूह को छू जाती है। आज की सुबह सूरज भी ऐसे उगा है जैसे कोई सरकारी मुलाज़िम बेमन से दफ्तर आया हो। उसकी धूप में वो तपिश नहीं है, वो तो बस एक रस्म अदायगी है। ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारे बिना मेरी ज़िंदगी की तमाम खुशियाँ–महज़ रस्म अदायगी भर हैं।
मैं यहाँ अपने कमरे में बैठा हूँ। रजाई की गर्माहट भी अब एक छलावा लगने लगी है। मुझे लगता है कि सर्दी हड्डियों में नहीं, बल्कि उन खाली जगहों में घुस गई है जो तुम्हारे जाने के बाद मेरे वजूद में बन गई हैं। लोग कहते हैं कि अलाव जला लो, हीटर चला लो। उन्हें कौन समझाए कि यादों की नमी से भीगी हुई लकड़ियाँ कभी जलती नहीं, बस सुलगती रहती हैं, धुआं देती हैं। और मैं, उसी धुएं में अपनी आँखें मलते हुए तुम्हें खत लिख रहा हूँ।
यह मौसम बड़ा ज़ालिम है, प्रिये। यह हमें मजबूर करता है कि हम अपनी बांहें सिकोड़ लें, खुद को समेट लें। तुम्हारे होने का एहसास, उस अदरक वाली चाय के पहले घूंट जैसा है जो हलक से नीचे उतरते ही, मुर्दा पड़ी नसों में जान फूंक देता है। पर अफ़सोस, आज चाय भी ठंडी हो गई है और तुम... तुम तो खैर दूर हो ही।
सर्दियों की रातें लंबी नहीं होतीं, वो अनंत होती हैं। ऐसा लगता है कि समय ने अपने पैरों में भारी बूट पहन लिए हैं और वो चल नहीं रहा, बस घिसट रहा है। सन्नाटा इतना गहरा है कि मुझे अपनी धड़कनें किसी घड़ी की टिक-टिक की तरह सुनाई देती हैं, एक-एक पल का हिसाब मांगती हुई। हर धड़कन गवाही देती है कि इस कड़कड़ाती ठंड में, मुझे किसी ऊनी लिबास की नहीं, तुम्हारे लफ़्ज़ों की, तुम्हारी सांसों की आंच की ज़रूरत है।
तुम्हें याद है वो पिछली सर्दी? जब हम साथ थे। तब ठंड, ठंड नहीं लगती थी, बल्कि एक बहाना लगती थी,करीब आने का। तब ये कोहरा डरावना नहीं लगता था, बल्कि एक पर्दा लगता था जिसने दुनिया की नज़रों से हमें छिपा रखा हो। लेकिन आज? आज वही कोहरा एक दीवार है। एक ऐसी दीवार जिसे न मैं लांघ सकता हूँ, न तोड़ सकता हूँ। बस इस पार खड़ा होकर, उस पार तुम्हारी आहट महसूस करने की नाकाम कोशिश कर सकता हूँ।
मैंने सुना है कि ठंड में चीज़ें सिकुड़ जाती हैं। सड़कें सूनी हो जाती हैं, दिन छोटे हो जाते हैं। मगर अजीब विरोधाभास है न? मेरे अंदर तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा विरह इस ठंड में सिकुड़ने की बजाय और फैलता जा रहा है। जैसे पानी बर्फ बनकर ज्यादा जगह घेर लेता है, वैसे ही तुम्हारी यादें मेरे ज़हन के हर कोने को जमा चुकी हैं। मैं एक चलता-फिरता हिमयुग बन गया हूँ, जिसके पिघलने की शर्त सिर्फ तुम्हारा स्पर्श है।
आजकल मैं बादलों को बहुत गौर से देखता हूँ। वो भी तो मेरी तरह हैं। भारी, बोझिल, और बरसने को बेताब, लेकिन ठंड ने उन्हें भी जमा दिया है। मेरी स्थिति उन पक्षियों जैसी है जो इस उम्मीद में पलायन नहीं करते कि शायद मौसम बदल जाए, शायद कोई चमत्कार हो जाए। मैं अपनी जगह पर जमा हुआ हूँ, तुम्हारी प्रतीक्षा में। यह प्रतीक्षा ही अब मेरा एकमात्र मौसम है।
तुम्हें लिखते हुए मेरी उंगलियां सुन्न हो रही हैं, लेकिन दिल... दिल अजीब तरह से जल रहा है। विरह की आग भी बड़ी विचित्र होती है, जान। ये जलाती नहीं, बस पिघलाती है, धीरे-धीरे, कतरा-कतरा। जैसे मोमबत्ती का वजूद खत्म होता है रोशनी देते हुए, वैसे ही मैं भी खर्च हो रहा हूँ तुम्हारे इंतज़ार में।
जब तुम यह खत पढ़ोगी, शायद वहाँ भी मौसम सर्द हो। शायद तुम भी अपनी हथेलियों को रगड़कर गर्म करने की कोशिश कर रही हो। बस एक गुज़ारिश है, जब हवा का कोई झोंका तुम्हारे बालों को छेड़े, तो उसे हवा मत समझना। वो मेरी भेजी हुई एक अदृश्य छुअन होगी, जो मीलों का सफर तय करके, सिर्फ यह बताने आई होगी कि यहाँ कोई है, जो अपनी हर सांस को गिरवी रखकर तुम्हारे लौटने की राह देख रहा है।
जल्दी आना। इससे पहले कि यह ठंड मुझे पूरी तरह पत्थर बना दे। इससे पहले कि कोहरा मेरी आँखों में हमेशा के लिए बस जाए। आ जाओ, कि हम मिलकर इस दिसंबर को हरा सकें।