25/01/2026
चर्चा में क्यों?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में समता के संवर्द्धन से संबंधित विनियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसका उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव का उन्मूलन करना है।
UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
जाति-आधारित भेदभाव की व्यापक व्याख्या: इन विनियमों में जाति-आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विरुद्ध किसी भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है। इससे OBC को स्पष्ट कानूनी सुरक्षा मिलती है और पिछले मसौदा ढाँचे में मौजूद बड़ी कमी को सुधारा गया है।
भेदभाव की विस्तारित परिभाषा: भेदभाव को किसी भी अनुचित, पक्षपाती या भिन्न व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष और यह जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान, या विकलांगता जैसे आधारों पर लागू होता है। इसमें ऐसे कृत्य भी शामिल हैं जो शिक्षा में समता को बाधित करें या मानव गरिमा का उल्लंघन करें।
अनिवार्य समान अवसर केंद्र (EOC): प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान के लिये समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा, जिसका उद्देश्य समता, सामाजिक समावेशन एवं समान पहुँच को बढ़ावा देना तथा परिसरों में भेदभाव से संबंधित शिकायतों का समाधान करना है।
प्रत्येक संस्थान को EOC के तहत एक समता समिति बनानी होगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। समिति में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), दिव्यांग व्यक्ति और महिलाएँ अनिवार्य रूप से प्रतिनिधित्व करेंगी, जिससे समावेशी निर्णय-प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।
रिपोर्टिंग और अनुपालन ढाँचा: EOC को छह-मासिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जबकि संस्थानों को समानता से संबंधित उपायों पर वार्षिक रिपोर्ट UGC को सौंपनी अनिवार्य है, जिससे संस्थागत जवाबदेही सुदृढ़ होती है।
संस्थानों पर स्पष्ट ज़िम्मेदारी: इन विनियमों में भेदभाव उन्मूलन और समानता संवर्द्धन की स्पष्ट ज़िम्मेदारी संस्थानों को निर्दिष्ट की गई है तथा संस्थान के प्रमुख को प्रभावी कार्यान्वयन और अनुपालन के लिये सीधे उत्तरदायी बनाया गया है।
राष्ट्रीय स्तर का निगरानी तंत्र: UGC एक राष्ट्रीय निगरानी समिति स्थापित करेगा, जिसमें सांविधिक निकायों और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति कार्यान्वयन की निगरानी, शिकायतों की समीक्षा और निवारक उपाय सुझाने का कार्य करेगी तथा कम-से-कम वर्ष में दो बार बैठक करेगी।
अनुपालन न करने पर दंड: विनियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थान UGC योजनाओं से बहिष्कृत किये जा सकते हैं, डिग्री, डिस्टेंस या ऑनलाइन कार्यक्रम प्रदान करने पर रोक लग सकती है या उन्हें UGC मान्यता से हटाया जा सकता है। इससे ये नियम सिर्फ सलाहकार नहीं, बल्कि प्रवर्तनीय बन जाते हैं।
महत्त्व
ये विनियम उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध कानूनी और संस्थागत ढाँचे को सुदृढ़ करते हैं तथा वर्ष 2019 के IIT दिल्ली अध्ययन में उठाई गई गंभीर चिंता को संबोधित करते हैं, जिसमें पाया गया कि ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों के 75% छात्र परिसर में भेदभाव का सामना करते हैं।
OBC को शामिल करना सामाजिक न्याय के लिये एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
सख्त दंड यह संकेत देते हैं कि अब ये नियम केवल सलाहकारी दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि प्रवर्तनीय विनियम हैं।
UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)
भारत में राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने का पहला प्रयास वर्ष 1944 के सार्जेंट रिपोर्ट से शुरू हुआ, जिसमें एक विश्वविद्यालय अनुदान समिति गठित करने की सिफारिश की गई थी।
वर्ष 1945 में गठित इस समिति ने आरंभ में अलीगढ़, बनारस और दिल्ली विश्वविद्यालयों का पर्यवेक्षण किया। वर्ष 1947 तक इसके दायरे में सभी मौज़ूदा विश्वविद्यालय शामिल हो गए।
वर्ष 1948 में डॉ. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने इसे UK मॉडल के अनुरूप पुनर्गठित करने की सिफारिश की।
वर्ष 1952 में केंद्र सरकार ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिये अनुदान की देखरेख हेतु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को नामित किया।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा 1953 में औपचारिक रूप से उद्घाटन किये जाने के बाद यह वर्ष 1956 में एक वैधानिक निकाय बन गया।
UGC का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है, जिसमें एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त दस अन्य सदस्य होते हैं।
इसके प्रमुख कार्यों में विश्वविद्यालयों को अनुदान आवंटित करना, उच्च शिक्षा सुधारों पर सलाह देना और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता व मानकों को बढ़ावा देना शामिल हैं।