roti kapda or makan

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03/07/2026
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"मुसलमान दुश्मन होते हैं, मुसलमान क्रूर होते हैं, मुसलमान दोस्ती की आड़ में तुम्हें ख़त्म कर देने की घात में लगे हुए हैं" ...
12/16/2025

"मुसलमान दुश्मन होते हैं,
मुसलमान क्रूर होते हैं,
मुसलमान दोस्ती की आड़ में तुम्हें ख़त्म कर देने की घात में लगे हुए हैं" .... ये तमाम डर हिन्दू पुनरुत्थान वालों ने अभी सौ गुज़रे साल में बनाए हैं ये विचार अंग्रेज़ो की शह पर पैदा किया गया कि हिन्दू ने मुसलमानों से दोस्ती की तो हिन्दू खत्म हो जाएगा... लेकिन इससे पहले इतिहास में हिंदुओं को कभी ये डर नही था,

आज के किस्साबाज़ लोग राजपूतों और मुसलमानों को एकदूसरे का दुश्मन दिखाते हैं... जबकि इतिहास में ऐसा कोई बंटवारा नही था, राजपूत शासकों की सेना में मुसलमान भरे रहते थे मुग़ल शासकों की सेना में राजपूत भरे रहते थे, उनकी ज़िन्दगी में धर्म बहुत होता था लेकिन धार्मिक नफरत नाममात्र की भी नही होती थी...

मुसलमान राजपूतों को मारकाट के इस्लाम कुबूल करवा रहे थे, ये भी एक कल्पना से ज़्यादा कुछ नहीं... क्योंकि अगर मुसलमान ज़बरदस्ती करते तो पूरे शहर को जबरन मुसलमान बनाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बल्कि कुछ राजपूत मुसलमान बने, और उनकी प्रजा हिन्दू ही रही, यहां तक कि उन राजपूतों के छोटे भाई भी कई बार हिन्दू ही बने रहे, जबकि उनके सरपरस्त बड़े भाई मुसलमान बन गए थे... ऐसा तभी हो सकता था जब इस्लाम कुबूलने वालों ने स्वेच्छा से इस्लाम को कुबूल किया हो........ जैसा मैंने बताया था कि राजपूतों के मुस्लिम बनने के अलग अलग बहुत से कारण थे, और वो अलग अलग समयों में किसी न किसी वजह से मुसलमान बनते रहे.... हमारे एक बुजुर्ग ने अपने बुजुर्गों से इस्लाम कुबूल करने का जो किस्सा सुनाया था, वो ये था कि जब जीते हुए मुस्लिम राजा के सामने हारे हुए हमारे ग़ैरमुस्लिम पूर्वज राजपूत राजा को लाया गया तो मुस्लिम राजा ने पूछा कि "तुम अपने साथ क्या सुलूक चाहते हो ?"
हमारे राजपूत बुज़ुर्ग ने जवाब दिया कि "हमारे देश मे हारने वाले राजा को मार डाला जाता है और हार चुके राजा की प्रजा को जीतने वाले राजा के धर्म का पालन करना होता है... तुम भी हमारे साथ यही करो"... इस पर मुस्लिम राजा ने कहा कि "किसी हार मान चुके इंसान का कत्ल करना हमारे लिए गुनाह है, और ज़बरदस्ती किसी का मज़हब तब्दील करवाना भी हमें मना है, तुम हमारे अधीन शासन करो, और तुम्हें अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी है..."..... ये परंपरा हमारे बुज़ुर्ग के लिये एकदम अनसुनी और नई थी, उन्होंने मुसलमान राजा का बहुत शुक्रिया अदा किया कि उसने जीत जाने के बावजूद उनके मंदिर नही तोड़े, पराजित राजा के परिवार वालों को अपमानित नही किया और प्रजा के साथ ज़बरदस्ती नही की, .... ये सब देखकर हारे हुए राजा ने कहा कि "हमारी परंपरा यही है कि हारने वाले राजा को अगर मारा न जाये तो उसे जीतने वाले राजा के देवता की भक्ति करना पड़ती है... भले ही आप मुझे मजबूर ना करें, लेकिन मेरी परम्परा के मुताबिक मैं अबसे आपके देवता की ही पूजा करूंगा...".... जब मेरे उन बुज़ुर्ग रिश्तेदार ने ये किस्सा सुनाया था तो मुझे ये फ़र्ज़ी किस्सा लगा, लेकिन बाद में जब इतिहास पढ़ा तो वाकई ऐसी परम्परा पाई जहां हिन्दू राजा ही हिन्दू मंदिरों को तोड़ डालते थे

इतिहास में लिखा है कि राजपूतों के हर समूह का अपना एक अलग कुलदेवता या कुलदेवी होते थे और एक देवता का पूजक दूसरे के कुलदेवता को कोई भी सम्मान नही देता था

कई भारतीय अभिलेखों में ज़िक्र मिलता है कि एक समूह यदि दूसरे राजा से हार जाता था, तो विजेता राजा दूसरे समूह के कुलदेवता का मंदिर ध्वस्त कर दिया करता था, और पराजित राजा मार डाला जाता था और उसकी रानियां व परिवार को दास बना लिया जाता था, पराजित राजा को अपमानित करने के लिए राजपरिवार के लोगों और स्त्रियों तक के अंग भंग कर दिए जाते थे.... और प्रजा को नए देवता की पूजा करने का आदेश दे दिया जाता था... ऐसा बार बार होने की वजह से देवता का बदला जाना राजपूत समाज मे एक आम बात हो चुकी थी, इसलिये कुलदेवता बदलने वाले राजपूतों से दूसरे राजपूतों के मन मे कोई नाराज़गी भी नही रहती थी, यही रवैया उन्होंने इस्लाम अपना लेने वाले अपने भाइयों के साथ भी रखा था
..... और मुस्लिम बनने के बावजूद राजपूताना में हिंदू और मुस्लिम राजपूत एक परिवार की तरह एकदूसरे को मानते रहे, जब तक कि अंग्रेजों ने आकर हिन्दू मुसलमान के बीच लड़ाई डालनी नही शुरू की थी....
... सदियों हिन्दू और मुसलमान साथ रहे एक दूसरे के सुख दुख के साझी रहे, अंग्रेजों के आने से पहले कभी भारत मे हिन्दू मुस्लिम दंगा नही हुआ था... मुसलमान शक्तिशाली थे इसके बावजूद कभी हिंदुओं का उत्पीड़न नही किया गया ...मुग़लों के ज़माने में मीरा, तुलसी, रसखान सब अपने धर्म का प्रचार करते रहे, भव्य मंदिर मुगलों की सहायता से बनवाये जाते रहे, शाही दरबारों में होली दिवाली के भव्य आयोजन होते रहे, ... बहुत सारी ललित कलाएं विकसित होती रहीं..... मुसलमानों से हिंदुओं को कभी कोई खतरा नही रहा...
... असल मे देखा जाए तो हिन्दू धर्म को खतरा अपने ही तथाकथित हितैषियों से है, हिन्दू किसी एक बड़े स्केल वाले देवता को मानने वाले लोगों का नाम है ही नही, बल्कि हर एक कुल और कस्बे के अपने देवता हों वो समाज, हिन्दू समाज कहलाता है .... लेकिन मुसलमानों के धर्म के मुकाबले में उतना ही बड़ा धर्म खड़ा करने के चक्कर मे खुद तथाकथित हिन्दू हितैषियों ने कितने ही देवी देवताओं की पूजा बन्द करवा कर कुछ चुनिंदा बड़े देवी देवताओं की पूजा पर ही ज़ोर डाला...
बंगाल में उत्तर भारत के देवी देवता नही बल्कि दुर्गा पूजी जाती हैं, उड़ीसा के स्थानीय देवता जगन्नाथ हैं, दक्षिण के अयप्पा हैं, महाराष्ट्र के कार्तिकेय हैं इन सबके मूल स्वरूप को खुद हिन्दू पुरुत्थान वालों ने ही मिटाया है और सब देवताओं को विष्णु जी शिव पार्वती से जोड़ दिया है, स्थिति ऐसी बनाई जा रही है कि अगले सौ पचास सालों में हिंदुओं के लिये एक या दो ही देवता रह जाएंगे, खत्म ये खुद तमाम हिन्दू परम्पराओं को कर रहे हैं, बना ये खुद हिंदुओं के धर्म को मुसलमानों के धर्म जैसा रहे हैं, लेकिन दुश्मन मुसलमानों को दिखा रहे हैं, डर मुसलमानों का दिखा रहे हैं........ असल में हिंदुओं को किसी से ख़तरा है ही नही, किसी का डर है ही नही, दुनियाभर में हिन्दू रहता है तो अपनी परम्परा और विदेशी परम्परा में बड़ा खूबसूरत सामंजस्य बना लेता है, जब तमाम विधर्मियों के बीच एक हिन्दू अपने धर्म के साथ निर्भीक रह सकता है तो उसे तमाम हिंदुओं वाले देश मे सौ सालों से लगातार डराकर क्यों रखा जा रहा है ??

हज़रत अहमद बिन इस्काफ़ दमिश्की (रहमतुल्लाह अलैह) ने बैतुल्लाह के हज के इरादे से कई सालों में एक बड़ी रक़म जमा की थी। हज ...
12/16/2025

हज़रत अहमद बिन इस्काफ़ दमिश्की (रहमतुल्लाह अलैह) ने बैतुल्लाह के हज के इरादे से कई सालों में एक बड़ी रक़म जमा की थी। हज से कुछ दिन पहले उन्होंने अपने बेटे को किसी काम से पड़ोसी के घर भेजा। थोड़ी देर बाद वह मुँह फुलाकर (दुखी होकर) वापस आया।
इब्न इस्काफ़ (रह.) ने पूछा, "बेटा, सब ठीक तो है, तुम रो क्यों रहे हो?" उसने कहा, "हमारे पड़ोसी गोश्त-रोटी खा रहे थे, मैं देखता रह गया और उन्होंने मुझे पूछा तक नहीं।" इब्न इस्काफ़ (रह.) दुखी होकर पड़ोसी के घर गए और कहा, "सुभान अल्लाह! पड़ोसियों का यही हक़ होता है जो तुमने अदा किया! मेरा कमसिन बच्चा देखता रह गया और तुम गोश्त-रोटी खाते रहे, इस मासूम को एक लुक्मा ही दे दिया होता।"
यह सुनकर पड़ोसी फूट-फूट कर रोने लगा और कहने लगा, "हाय अफ़सोस! अब हमारा राज फ़ाश हो गया! न बताऊँ तो मुश्किल, बताऊँ तो मुश्किल! खुदा की कसम, पाँच दिन से मेरे घर वालों के मुँह में एक दाना तक नहीं गया, लेकिन मेरी ग़ैरत (आत्म-सम्मान) किसी के सामने हाथ फैलाने से रोकती थी। जब हालत तबाही तक पहुँची तो मजबूरन जंगल गया। एक जगह मरी हुई बकरी पड़ी थी, उसका थोड़ा सा गोश्त ले लिया और उसी को उबालकर हम खा रहे थे। यही कारण था कि हमने आपके बच्चे को कुछ नहीं दिया, वरना यह कैसे हो सकता था कि हम गोश्त-रोटी खाएँ और आपका बच्चा देखता रहे।"
यह सुनकर अहमद बिन इस्काफ़ (रह.) पर रक़्क़त (कोमलता/भावुकता) तारी हो गई। वह बार-बार कहने लगे, "ऐ अहमद! तुझ पर अफ़सोस है कि तेरे घर में तो हज़ारों दिरहम-दीनार पड़े हों और तेरे पड़ोसियों पर फ़ाके गुज़र रहे हों! क़यामत के दिन तू अल्लाह को क्या मुँह दिखाएगा और तेरा हज कैसे क़बूल होगा?" फिर वह घर गए और हज की नियत से जमा किए गए सारे दिरहम और दीनार चुपके से लाए और ज़ोर देकर पड़ोसी को दे दिए, और खुद अपने घर में बैठकर याद-ए-इलाही (अल्लाह की इबादत) में मशगूल हो गए।
हज का ज़माना आया तो हाजियों में मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग हज़रत ज़ुन्नून मिस्री (रह.) भी शामिल थे। उन्होंने जबले अरफ़ात पर एक ग़ैबी आवाज़ सुनी कि, "इस साल अहमद बिन इस्काफ़ दमिश्की (रह.) ने हज की नियत की थी, लेकिन वह न आ सका। हमने उसे हज्ज-ए-अकबर का सवाब (सबसे बड़े हज का पुण्य) अता किया है और दूसरे बहुत से हाजियों का हज भी उसी के सबब क़बूल फ़रमाया है।" हज़रत ज़ुन्नून मिस्री (रह.) बहुत हैरान हुए कि नामعلوم अहमद बिन इस्काफ़ (रह.) की कौन सी अदा अल्लाह तआला को भा गई है जो उन पर इतना फ़ज़ल-ओ-करम किया गया है।
हज से फ़ारिग होकर वह सीधे दमिश्क गए और अहमद बिन इस्काफ़ (रह.) से मुलाक़ात करके उनसे हज पर न जाने का कारण पूछा।
उन्होंने पूरा वाकया बयान किया तो ज़ुन्नून (रह.) ने फ़रमाया, "मुबारक हो! अल्लाह तआला ने तुम्हारा हज क़बूल फ़रमा लिया, बल्कि हज्ज-ए-अकबर का सवाब अता फ़रमाया।" अहमद बिन इस्काफ़ (रह.) यह सुनकर रोने लगे और बार-बार अल्लाह तआला का शुक्र अदा करते रहे। अगले साल अल्लाह ने उन्हें इतना माल दिया कि वह खुद फ़र्ज़-ए-हज की अदायगी के लिए तशरीफ़ ले गए।
واللہ اعلم بالصواب (और सही बात अल्लाह ही जानता है)।

दोस्तों...! चलते-चलते एक आख़िरी बात कहता चलूँ कि अगर कभी कोई वीडियो, क़ौल, वाकया, कहानी या तहरीर वग़ैरह अच्छी लगे, तो पढ़ने के बाद थोड़ी सी और ज़हमत उठाकर अपने दोस्तों से भी शेयर कर लिया कीजिए। यक़ीन कीजिए कि इसमें आपका मुश्किल से एक लम्हा खर्च होगा, लेकिन हो सकता है इस एक लम्हे की उठाई हुई तकलीफ़ से आपकी शेयर की हुई तहरीर हज़ारों लोगों के लिए सबक़-आमोज़ (शिक्षाप्रद) साबित हो। दोस्तों, हमारी सपोर्ट के लिए पोस्ट अच्छी लगे तो फ़ॉलो ज़रूर किया करें। बहुत शुक्रिया। ❤️

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