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जब नफरत की आंधियों के बीच एक 'बूढ़ा फकीर' चट्टान बनकर खड़ा हो गयामीराबेन की आँखों देखी 1947 की दिल्ली डायरी​कल्पना कीजिये ...
01/09/2026

जब नफरत की आंधियों के बीच एक 'बूढ़ा फकीर' चट्टान बनकर खड़ा हो गया

मीराबेन की आँखों देखी 1947 की दिल्ली डायरी

​कल्पना कीजिये साल 1947 के उन अंतिम महीनों की जब विभाजन का जहर फिजाओं में घुल चुका था। कनॉट प्लेस से लेकर पुरानी दिल्ली तक, हर तरफ केवल खौफ और हिंसा का माहौल था। पुलिस और फौज भी जहां लाचार नजर आ रही थी, वहां 78 साल का एक लाठी टेकता हुआ बूढ़ा आदमी शांति की तलाश में निकल पड़ा था।

​यह कहानी किसी इतिहास की किताब से नहीं, बल्कि उस महिला की डायरी से है जो उस वक्त महात्मा गांधी की परछाई बनकर उनके साथ थी—मीराबेन (मेडलिन स्लेड)। अपनी आत्मकथा 'The Spirit's Pilgrimage' (द स्पिरिट्स पिलग्रिमेज) में उन्होंने दिल्ली के उन रोंगटे खड़े कर देने वाले दिनों का जो वर्णन किया है, वह आज भी हमारी रूह को झकझोर देता है।

खौफ जो आंसुओं में बदल गया

मीराबेन लिखती हैं कि दिल्ली एक श्मशान जैसी हो गई थी। एक तरफ पुराना किला (Purana Qila) था, जहाँ हजारों शरणार्थी अपनी जान बचाने के लिए छिपे हुए थे। वे इतने डरे हुए थे कि हवा के झोंके से भी सहम जाते थे।

​जब गांधीजी की कार वहां पहुंची, तो मीराबेन ने एक अद्भुत दृश्य देखा। हजारों की भीड़ उनकी कार की तरफ दौड़ी। ये हमला करने वाले नहीं थे, ये वो लोग थे जिन्हें लगा कि अब उनका मसीहा आ गया है। भीड़ ने कार को घेर लिया, लोग खिड़कियों से हाथ डालकर बापू को छू लेना चाहते थे। मीराबेन लिखती हैं कि उस क्षण वहां "शब्दों की जरूरत नहीं थी।" गांधीजी की सिर्फ मौजूदगी ने उस खौफनाक माहौल को पिघला दिया। जो लोग डर से पत्थर बने हुए थे, वे बापू को देखकर फूट-फूट कर रोने लगे। उनका डर, भरोसे और आंसुओं में बह गया।

​जब नफरत को मिली 'सत्य' की चुनौती

लेकिन असली परीक्षा वहां थी जहाँ पाकिस्तान से सब कुछ लुटाकर आए हिंदू और सिख शरणार्थी गुस्से और आक्रोश से भरे बैठे थे। मीराबेन बताती हैं कि जब गांधीजी उन शिविरों (जैसे किंग्सवे कैंप) में जाते, तो लोग नारे लगाते— "गांधी मुर्दाबाद", "हमें शांति नहीं, बदला चाहिए।"

​जरा सोचिये, एक निहत्था आदमी, बिना किसी सुरक्षा के, उस गुस्से से उबलती भीड़ के बीच सीधा चला जाता है। मीराबेन लिखती हैं कि बापू की 'आत्मिक शक्ति' (Soul Force) का वह चमत्कार था जिसे विज्ञान कभी नहीं समझा सकता।

​गांधीजी भीड़ के बीच खड़े होकर कहते— "मैं तुम्हारा दर्द बांटने आया हूँ। तुम चाहो तो मुझे मार लो, लेकिन बदला तुम्हें तुम्हारा घर वापस नहीं दिलाएगा।"

​और फिर... एक चमत्कार होता। जो हाथ मुट्ठी भींचे हुए थे, वे ढीले पड़ जाते। जो गले नफरत के नारे लगा रहे थे, वहां एक 'वज्र जैसा सन्नाटा' (Dead Silence) छा जाता। मीराबेन ने अपनी आँखों से देखा कि कैसे आक्रोश से भरी भीड़, बापू के धीमे लेकिन दृढ़ स्वरों के सामने शांत होकर बैठ जाती। हिंसा का ज्वार, अहिंसा की चट्टान से टकराकर लौट जाता था।

​अकेला सिपाही (The Lonely Soldier)

मीराबेन ने अपनी किताब में एक बहुत मार्मिक बात लिखी है। वे कहती हैं कि बिड़ला हाउस में रहते हुए उन्हें हर पल महसूस होता था कि गांधीजी एक बहुत गहरी पीड़ा में हैं। वे उस समय दुनिया के सबसे अकेले इंसान थे। वे दिल्ली की आग को अपने आंसुओं और अपने खून से बुझाने को तैयार थे।

​वह आखिरी विदाई

मीराबेन ने गांधीजी से विदाई के आखिरी अहसास का प्रसंग मार्मिक है। 18 दिसंबर 1947 को जब मीराबेन वापस ऋषिकेश जा रही थीं, तो गांधीजी ने उनकी पीठ थपथपाकर कहा था— "अच्छा, जाओ।" मीराबेन लिखती हैं कि उस स्पर्श में एक अजीब सी 'अंतिम विदाई' थी। उन्हें पूर्वाभास हो गया था कि वे इस "शांति के मसीहा" को अब कभी जीवित नहीं देख पाएंगी।

​आज जब हम उस दौर को याद करते हैं, तो मीराबेन की गवाही यह साबित करती है कि हथियार केवल शरीर को डरा सकते हैं, लेकिन एक 'सच्चा सत्याग्रही' नफरत से भरे दिलों को भी पिघला सकता है। ​क्या आज हमारे भीतर वो साहस है जो नफरत के शोर में शांति की बात कर सके?

Gandhi Darshan - गांधी दर्शन
8 जनवरी 2026


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कोर्ट और सरकार इसे बाहर ही क्यों नहीं छोड़ देती? पंद्रहवीं बार यह फरलो, पैरोल आदि लेकर जेल से बाहर आता रहा है इस बार पूर...
01/04/2026

कोर्ट और सरकार इसे बाहर ही क्यों नहीं छोड़ देती? पंद्रहवीं बार यह फरलो, पैरोल आदि लेकर जेल से बाहर आता रहा है इस बार पूरे 40 दिनों के लिए। इतना यह जेल में नहीं रहा जितना जेल से बाहर रहा।

सोनम वांगचुक, उमर खालिद, संजीव भट्ट जैसे असंख्य लोगों की सुनवाई नहीं हो रही जबकि आसाराम, राम रहीम, कुलदीप सेंगर जैसे लोग जब मर्जी चाहें, जितनी बार चाहे बाहर निकाल रहे हैं?

ी_विशाल


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अगर हिन्दुस्तान जिन्दा है तो हम भी जिन्दा हैं!_________________________________डाo सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने  संविधान सभा ...
01/04/2026

अगर हिन्दुस्तान जिन्दा है तो हम भी जिन्दा हैं!
_________________________________

डाo सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने संविधान सभा में बहस के दौरान कहा था...

“आधुनिक जीवन का आधार राष्ट्रीयता है न कि धर्म। इस देश में हिन्दू और मुसलमान एक हजार वर्ष से भी अधिक समय से साथ साथ रहते आये हैं। ये एक ही देश के रहने वाले हैं और एक ही भाषा बोलते हैं, उनकी जातीय परम्परा एक ही है, उन्हें एक ही प्रकार के भविष्य का निर्माण करना है। वे एक दूसरे में गुंथे हुए हैं।”

इसी प्रकार संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरु ने चेताते हुए कहा था कि “हमारे सामने बहुत से सवाल आएंगे और आते हैं, अलहदा अलहदा गिरोहों, फिरकों के लोग अपने अपने ढंग से इसको देखेंगे और बहस भी होगी, लेकिन हमेशा इस बात को याद रखना है कि छोटी बातों और बहसों में हम न बहक जाएं… अगर हिन्दुस्तान जिन्दा है तो हम भी जिन्दा हैं और सब फिरके और गिरोह भी जिन्दा हैं।”



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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रेस कांफ्रेंस के बाद अब साफ हो गया है कि वेनेजुएला में तख्तापलट की जघन्य और अवैध क...
01/04/2026

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रेस कांफ्रेंस के बाद अब साफ हो गया है कि वेनेजुएला में तख्तापलट की जघन्य और अवैध कार्रवाई को अंजाम देने के लिए ही रातोंरात लैटिन अमेरिकी देश पर अमेरिकी सेना ने इतना बड़ा हमला किया! जिस तरह वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को सैन्य कब्जे में हथकड़ी पहनाकर अमेरिका लाया गया; वह न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर-1945 का खुला उल्लंघन है अपितु मानवाधिकार के न्यूनतम उसूलों के भी खिलाफ है.
अमेरिका सहित पूरी दुनिया में ट्रंप प्रशासन की इस जघन्य कार्रवाई का विरोध हो रहा है. न्यूयॉर्क, पेरिस और लंदन सहित दुनिया के अनेक शहरों में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले के विरूद्ध प्रदर्शन हुए हैं या हो रहे हैं. भारत में भी दिल्ली से विशाखापट्टनम तक कई शहरों से विरोध प्रदर्शनों की खबर आ रही है.
विरोध कर रहे इन लोगों या संगठनों में सभी वेनेजुएला के अपहृत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के समर्थक या प्रशंसक नहीं हैं. पर वे निश्चय ही अमेरीकी प्रशासन की वैश्विक दबंगई और अंतराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उडाती इस नृशंस कार्रवाई के विरुध्द हैं.
रुस, चीन, ब्राजील, ईरान, कोलंबिया, मेक्सिको, बोलिविया, क्यूबा और चिली सहित अनेक देशों के भारी विरोध और स्वयं अमेरिका के अंदर हो रहे विरोध से से ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही हैं. पर डोनाल्ड ट्रंप अपने अलोकतांत्रिक मिज़ाज और दबंगई के लिए पहले से खासे कुख्यात हैं इसलिए उन पर इन विरोधों का कितना असर पडेगा, कहना कठिन है..स्पेन जैसे यूरोपीय मुल्क ने भी अमेरिकी हमले को खारिज किया है. सरकार ने भले कुछ खास नहीं बोला है पर ब्रिटेन में भी राजनीतिक विरोध बढ़ रहा है.
देखना होगा कि ट्रंप वेनेजुएला में अमेरिका की सीधी हुकूमत या एक गैरनिर्वाचित कठपुतली सरकार चलाने की अपनी मंशा को अंजाम दे पाते हैं या नहीं!

(चित्र सौजन्य-सोशल मीडिया)
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डॉ. राधाबाई 20वीं सदी की महिला स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थीं, उनका जन्म लगभग 1875 के आसपास नागपुर (महाराष्ट्र) मे...
01/02/2026

डॉ. राधाबाई 20वीं सदी की महिला स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थीं, उनका जन्म लगभग 1875 के आसपास नागपुर (महाराष्ट्र) में माना जाता है, और पेशे से वे दाई (मिडवाइफ़) के रूप में काम करती थीं, जिसके ज़रिए वे सीधे आम लोगों, खासकर महिलाओं के जीवन से जुड़ी रहीं। 1920 में रायपुर में महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने अपना जीवन आज़ादी की लड़ाई और समाज सेवा को समर्पित करने का निश्चय किया और 1920 से 1942 तक लगभग हर बड़े आंदोलन असहयोग, सविनय अवज्ञा, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो में सक्रिय रहीं

रायपुर और आसपास के क्षेत्र में वे घर‑घर जाकर महिलाओं को घूंघट छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करतीं, “सत्याग्रही महिलाओं” का एक समूह बनाया और सुबह‑सुबह चरखा कातने, प्रभात फेरी निकालने और जुलूसों में शामिल होने की परंपरा शुरू की। 1930 में सत्याग्रहियों को अमरावती जेल से रायपुर लाए जाने पर वे तिरंगा झंडा और भोजन लेकर स्टेशन पहुँचीं, जहाँ पुलिस लाठीचार्ज में उन्होंने मार खाई लेकिन पीछे नहीं हटीं; 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन सहित कई बार उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल जाना पड़ा

स्वतंत्रता संग्राम के साथ‑साथ उन्होंने समाज सुधार के दो बड़े अभियान चलाए अस्पृश्यता के खिलाफ़ संघर्ष और मज़दूर बस्तियों में सफ़ाई‑अभियान; वे स्वयं सफाई कामगारों की बस्तियों में जाकर झाड़ू लगातीं, उनके बच्चों को नहलातीं और पढ़ातीं, ताकि स्वच्छता, समानता और आत्मसम्मान का संदेश दिया जा सके। उन्होंने खादी के वस्त्र बेचते हुए स्वदेशी को बढ़ावा दिया और शराब की दुकानों के सामने धरने देकर शराबबंदी की मांग उठाई, जहाँ महिलाओं पर पुलिस और गुंडों की हिंसा के बावजूद वे जोशीले भाषणों से सबका हौसला बढ़ाती रहीं

डॉ. राधाबाई कौमी एकता की भी प्रतीक मानी जाती हैं; उल्लेख मिलता है कि वे भाई‑दूज के दिन मुस्लिम भाइयों को तिलक लगाकर स्वयं भोजन करातीं, ताकि हिंदू‑मुस्लिम सद्भाव का संदेश समाज तक पहुँचे। रायपुर क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि लोगों ने स्नेह और सम्मान से उन्हें “डॉक्टर” की उपाधि दे दी यह कोई औपचारिक डिग्री नहीं, बल्कि जनसम्मान था, जो उनकी सेवा, साहस और नेतृत्व के कारण मिला। 2 जनवरी 1950 को लगभग 75–85 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ; जाते‑जाते वे अपना घर अनाथ‑आश्रम के लिए दान कर गईं, और आज उन्हें राष्ट्रीय एकता, महिला जागरण, स्वदेशी, अस्पृश्यता‑विरोध और शराबबंदी जैसे आंदोलनों की वीरांगना के रूप में याद किया जाता है

विनम्र श्रद्धांजलि 🙏


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गांधी: मानवता के महानायक​जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख़्त ने 'गैलिलियो' के जीवन पर टिप्पणी करते हुए एक कालजयी पंक्ति लिखी...
01/02/2026

गांधी: मानवता के महानायक

​जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख़्त ने 'गैलिलियो' के जीवन पर टिप्पणी करते हुए एक कालजयी पंक्ति लिखी थी— “दुर्भाग्यशाली है वह देश, जिसे नायकों की ज़रूरत पड़ती है।” यह कथन प्रथम दृष्टया कठोर लग सकता है, लेकिन यदि इसे महात्मा गांधी के जीवन-दर्शन के आईने में देखा जाए, तो यह एक गहरे सत्य का उद्घाटन करता है।

​गांधी स्वयं नायक-पूजा (Hero Worship) के प्रबल विरोधी थे। वे नहीं चाहते थे कि समाज किसी एक महामानव के भरोसे अपनी बुद्धि और विवेक गिरवी रख दे। उनका स्वप्न एक ऐसे समाज का निर्माण था, जहाँ हर नागरिक इतना विवेकशील, आत्मनिर्भर और नैतिक हो कि उसे किसी 'तारणहार' की आवश्यकता ही न पड़े।

गांधी के लिए सत्य और अहिंसा किसी अवतार के विशेष गुण नहीं, बल्कि एक सामान्य मनुष्य के दैनिक जीवन का आधार थे। गांधी की महानता इसमें नहीं है कि उन्होंने अनुयायी (Followers) बनाए, बल्कि इसमें है कि उन्होंने साधारण जनों को निर्भय और विचारशील नागरिक बनाया। गांधीजी ऐसा समाज चाहते थे जो स्वयं सत्य के लिए खड़ा होना सीख जाए, वहाँ 'हीरो' नहीं, 'चरित्र' प्रधान हो।

सीमाओं से परे व्यक्तित्व का विस्तार

इतिहास गवाह है कि युग-परिवर्तनकारी व्यक्तित्व कभी भी वंशानुगत खाँचों या रूढ़ियों में बंधकर नहीं चले। अरस्तु का कथन है कि "पूर्ण, अपने अंशों के योग से बड़ा होता है," और यह बात गांधी पर अक्षरशः लागू होती है। आप उनके जीवन के सैकड़ों प्रसंगों को जोड़ लें, फिर भी उनका विराट व्यक्तित्व किसी एक परिभाषा में नहीं समाता। वे उन दुर्लभ विश्व-चिंतकों में से थे, जो अपनी आलोचनाओं से डरते नहीं थे, बल्कि स्वयं को निरंतर परिष्कृत (Refine) करते थे। उन्होंने राजनीति को सत्ता प्राप्ति का जरिया नहीं, बल्कि मानवता की सेवा और धर्म-साधना का माध्यम बनाया।

​गांधी को समझने की भूल

सांप्रदायिकता गांधी को निगल तो नहीं सकीं पर उनकी हत्या के बाद उनके वास्तविक स्वरूप पर पर्दा डालने में सफल रही। हालांकि अब यह पर्दा धीरे धीरे खुलता जा रहा है और लोग गांधीजी के वृहद रूप को अब समझने भी लगे हैं। आजादी के बाद जो सरकारें बनी वे भी इस पर्दे के खोलने में ज्यादा गंभीर नहीं दिखीं। गांधी गैलीलियो की भांति अपने सच को बदलने को तैयार नहीं थे, उन्होंने सच बोलने की कीमत तीन गोलियां खाकर चुकाई।

गांधीजी की हत्या के बाद, दुनियाभर के लोग गांधीजी के वास्तविक स्वरूप को हमारी अपेक्षा अधिक समझ सके। भारत ने उन्हें समझने के प्रयासों में कई बड़ी भूलें की -

पहला उनकी ​राजकीयकरण कर उन्हें सरकारी दफ्तरों और दीवारों पर टंगी तस्वीर बना दिया और नोटों पर छाप दिया।

दूसरा उन्हें ​संत की उपाधि देकर उनकी राजनीतिक और सामाजिक प्रासंगिकता को धुंधला कर दिया गया।

तीसरा उन्हें ​मात्र आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नेताओं की पंक्ति में सीमित कर दिया गया।

​सच तो यह है कि गांधी इन तीनों परिभाषाओं से बड़े थे। वे खादी के वेश में एक ऐसे धार्मिक व्यक्ति थे, जिनके लिए धर्म का अर्थ मंदिर की घंटी नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा थी, उनका धर्म 'कर्मकांड' नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय था। जब दलितों के मंदिर-प्रवेश का प्रश्न उठा, तो गांधी ने स्पष्ट कहा—यदि ईश्वर के घर में किसी के जाने पर रोक है, तो मैं ऐसे प्रतिबंध को तोड़ने के लिए प्राण भी दे दूँगा। यह गांधी की 'असुविधाजनक नैतिकता' थी, जो कड़वी जरूर थी, पर सत्य थी।

दिनकर ने ठीक लिखा है- दिग्विजय करने वाले योद्धा इस देश में भी बहुत हुए, किंतु भारत नाम में जो दिव्यता है उसके प्रतीक यहां अर्जुन नहीं, युधिष्ठिर रहे हैं; चंद्रगुप्त नहीं अशोक रहे हैं,और आधुनिक काल में भी भारतवर्ष की जनता का निश्छल प्रेम अन्य कर्णधारों और समाज सुधारकों की अपेक्षा महात्मा गांधी को अधिक प्राप्त हुआ। अगले संसार के नेता वे होंगे जो धीर और सहनशील हैं. जो समझौते और सहअस्तित्व को कायरता नहीं, धर्म मानकर वरण करते हैं।

​गांधी इसलिए महान नहीं हैं कि वे दोषरहित थे, वे इसलिए महान हैं क्योंकि वे सत्य और करुणा के प्रति अडिग थे। ब्रेख़्त का स्वप्न और गांधी का भारत वही है—जहाँ नागरिक को नायक की ज़रूरत न हो, बल्कि हर नागरिक में गांधी जैसा नैतिक साहस हो। वे किसी एक देश के नहीं, पूरी मानवता की धरोहर हैं।

Gandhi Darshan - गांधी दर्शन
2 जनवरी 2026



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01/01/2026

पत्रकार ऐसे होते है जो सत्ता से सवाल करने नाही डरते देश को ऐसे पत्रकार की जरूरत है
जो सत्तसे सवाल करे

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 #गालीबाज_कैलाश मीडिया को झल्लाते हुए गाली देकर और धमकाकर केवल अपनी खीझ उतार रहे हैं!यह खीझ बता रही है कि आप फेल हो चुके...
01/01/2026

#गालीबाज_कैलाश मीडिया को झल्लाते हुए गाली देकर और धमकाकर केवल अपनी खीझ उतार रहे हैं!

यह खीझ बता रही है कि आप फेल हो चुके हैं। इस हादसे के जवाबदार आप हैं।






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01/01/2026

सनातनियों किस बिल में दुबके हो मरने वाले सारे हिंदू । Navin Kumar
जनता को पाखाने का पानी पिलाने वाला मंत्री कहता है ताजमहल मंदिर था। बेशर्मी की भी कोई हद होती है। इंदौर में ट्रिपल इंजन की सरकार। लेकिन इंदौरियों को कोई फर्क नहीं पड़ता।



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कांग्रेस के स्थापना दिवस पर जानें वाकई कांग्रेस क्या है और उसने क्या किया 28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस पार्टी की स्थापना ऐ...
12/29/2025

कांग्रेस के स्थापना दिवस पर जानें वाकई कांग्रेस क्या है और उसने क्या किया

28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस पार्टी की स्थापना ऐसे समय में की गई जब चारों तरफ निराशा का माहौल था।

महात्मा गांधी जनवरी 1915 में जब भारत आए तब 1857 का महान विद्रोह को कुचला जा चुका था। किसान आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलन, आदिवासी विद्रोह को भी अंग्रेजों ने कुचल दिया था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में शुरू हुए बंग भंग के महान आंदोलन से पैदा हुई स्वराज्य प्राप्ति की ज्वाला मध्धम पढ़ चुकी थी।

महात्मा गांधी ने भारत की जनता को पहला संदेश दिया: डरो मत। गांधी जी ने भारत की जनता के बिखराव को समाप्त किया। उन्होंने उत्तर दक्षिण, हिंदू-मुस्लिम, अगड़े -पिछड़े -दलित, स्त्री-पुरुष सब का भेद खत्म कर भारतीय राष्ट्र की आत्मा को जगाया। महात्मा गांधी ने पहली बार भारत की जनता को ब्रिटिश गुलामी के वास्तविक षड्यंत्र से अवगत कराया और वह रास्ता दिखाया जिस पर चलकर आजादी प्राप्त की जा सकती थी।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बताया की 1.25 लाख अंग्रेज 30 करोड़ भारतवासियों पर इसलिए राज करते हैं क्योंकि वह भारत की जनता का सहयोग हासिल कर चुके हैं, अगर भारत के 30 करोड लोग 1.25 लाख अंग्रेजों का सहयोग बंद कर दें तो अंग्रेज भारत पर 1 दिन भी शासन नहीं कर सकते।

अंग्रेजी शिक्षा, अंग्रेजी नौकरियां, अंग्रेजी अदालत, अंग्रेजी कपड़े और अंग्रेज सरकार को दिए जा रहे टैक्स को अगर भारत की जनता बंद कर दे तो आजादी दूर नहीं है।अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में हुए असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में महात्मा गांधी ने भारत की जनता को इसी काम के लिए प्रेरित किया।

कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट किया कि आजादी का मतलब सत्ता परिवर्तन मात्र नहीं है भारत के हर व्यक्ति की मानसिक, आर्थिक और सामाजिक आजादी का मतलब ही संपूर्ण आजादी है।

आजादी मिलने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस महान राष्ट्र में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की। हर धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के लोगों को भारतीयता की भावना से ओतप्रोत किया।
पंडित नेहरू ने बांध बनाकर कृषि, जमीदारी खत्म करके किसान, संविधान में आरक्षण का प्रावधान करके वंचित वर्ग, विश्व स्तरीय शिक्षा संस्थान बनाकर युवा और स्वायत्त संस्थान बनाकर लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की।

कांग्रेस पार्टी की सरकारों ने देश की सरहद को मजबूत करने के लिए देश में आयुध कारखानों का निर्माण किया, अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को नया स्वरूप दिया, लोकतांत्रिक मजबूती के लिए स्वतंत्र निर्वाचन आयोग बनाया गया, न्याय में छोटे और बड़े का भेद खत्म करने के लिए न्यायपालिका को पूरी तरह से सरकार से अलग रखा।

श्री लाल बहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकारों ने हमारे दुश्मन देशों को सरहद पर सबक सिखाया। श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने जो अदम्य साहस दिखाया उससे बांग्लादेश के रूप में एक नए देश का उदय हुआ। भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बना।

श्री राजीव गांधी ने पंचायती राज और कंप्यूटर क्रांति के जरिए एक साथ ही गांव और शहर के लिए 21वीं सदी के दरवाजे खोले। श्री राजीव गांधी की सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ सख्त कानून बनाया गया।

श्री नरसिंह राव और श्री मनमोहन सिंह की कांग्रेसी सरकारों ने देश में उदारीकरण शुरू कर रोजगार के नए अवसर पैदा किए। सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, वन अधिकार कानून, महात्मा गांधी नरेगा, किसानों की कर्ज माफी जैसी पहल कर कांग्रेस पार्टी ने भारत की आम जनता को आर्थिक और प्रशासनिक रूप से और ज्यादा सक्षम बनाया।




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> MNREGA> Right to Food> Right to Education> Right to Information> 10% GDP> Aadhaar & DBT> Lifted 20 Cr people out of po...
12/29/2025

> MNREGA
> Right to Food
> Right to Education
> Right to Information
> 10% GDP
> Aadhaar & DBT
> Lifted 20 Cr people out of poverty
> Liberalization of Indian Economy
> No Hate Speech Ever

Humble tributes to Dr Manmohan Singh on death anniversary 🙏🇮🇳


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