18/08/2026
#बिहार_के_युवाओं_की_आवाज़_को_सुनना_होगा…
बिहार में एक बार फिर #छात्र और #युवा अपनी #मांगों को लेकर सड़कों पर हैं। पटना के #गर्दनीबाग में #शिक्षक_भर्ती, विशेष रूप से TRE-4 के विज्ञापन में देरी, को लेकर अभ्यर्थी #आंदोलन कर रहे हैं।
लेकिन सवाल केवल एक भर्ती का नहीं है।
सवाल उन लाखों युवाओं का है, जो वर्षों से किताबों के बीच अपना #भविष्य_तलाश रहे हैं। कोई गांव से पटना आता है, कोई किराए के कमरे में रहकर तैयारी करता है, तो कोई अपने परिवार की #सीमित_आमदनी में वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है।
जब #परीक्षा का इंतजार लंबा होता है, परिणाम में देरी होती है और नियुक्ति की कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं होती, तो युवा के मन में सिर्फ #निराशा नहीं, व्यवस्था के प्रति #अविश्वास भी पैदा होता है।
सरकार से छात्रों की मांगों पर #संवेदनशीलता और स्पष्टता की अपेक्षा है। भर्ती का #कैलेंडर समय पर जारी हो, परीक्षाएं निर्धारित समय पर हों, #परिणाम और #नियुक्तियां समयबद्ध तरीके से हों तथा पूरी प्रक्रिया #पारदर्शी हो—यही युवाओं के भविष्य के लिए जरूरी है।
साथ ही #छात्रों से भी मेरी #अपील है कि अपनी आवाज जरूर उठाएं, लेकिन #शांतिपूर्ण और #लोकतांत्रिक तरीके से। आंदोलन की ताकत उसकी संख्या में ही नहीं, बल्कि उसकी #शांति, #अनुशासन और जायज मांगों में होती है।
#बिहार_का_युवा मेहनत करने से नहीं डरता।
वह सिर्फ इतना चाहता है कि उसकी मेहनत का #ईमानदारी से #सम्मान हो और उसे अवसर मिले।
#सरकार और #छात्रों के बीच #टकराव नहीं, संवाद होना चाहिए।
क्योंकि जब बिहार का युवा किताब छोड़कर सड़क पर उतरता है, तो हमें सिर्फ उसका आंदोलन नहीं देखना चाहिए—उसके पीछे छिपी बेचैनी को भी समझना चाहिए।
Sanjeev Verma