28/11/2025
काली माँ का विकराल रूप –
प्राचीन काल के उन पवित्र दिनों में, जब धरती पर देवताओं की शक्ति घट रही थी और असुरों का आतंक तीनों लोकों को झकझोर रहा था, तब संसार की रक्षा के लिए स्वयं आदिशक्ति को अपने परम-विकराल रूप में अवतरित होना पड़ा। यह वह समय था जब महाशक्ति का काली रूप—अंधकार, संहार, रौद्रता, न्याय और ऊर्जा का पताका—तीनों लोकों में बिजली की तरह प्रगट हुआ।
भूमिका : त्रिभुवन का संकट
मानव लोक में अन्याय बढ़ा था, दैत्यलोक क्रूरता से भर गया था और देवलोक भी कंपित था। महिषासुर, रक्तबीज, चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ जैसे असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया था। यज्ञ बंद हो रहे थे, ऋषियों का तप बाधित था, और धर्म का दीपक बुझने को तैयार था।
देवों ने देखा कि अब सामान्य युद्ध से कोई समाधान नहीं हो सकता। असुरों की शक्तियाँ वरदानों से संरक्षित थीं। विशेषकर रक्तबीज, जिसका हर एक रक्तकण नया दैत्य बन जाता था—वह तो संहार की जड़ बन गया था।
देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महादेव से प्रार्थना की। तब तीनों महाशक्तियों के तेज से एक दिव्य आह्वान हुआ—
“अब आदिशक्ति को स्वयं प्रकट होना होगा। ब्रह्मांड को बचाने के लिए माँ को ‘काल’ का भी संहार करना होगा।"
इसी आह्वान से प्रकट हुईं—काली।
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काली माँ का प्रथम अवतरण : अंधकार से उठी ज्योति
जब देवताओं ने प्रार्थना की, उस क्षण ब्रह्मांड के केंद्र में एक अद्भुत ऊर्जा घूमने लगी। मानो समय का पहिया उलट रहा हो। वातावरण में एक असाधारण कंपन उठा। पृथ्वी काँपने लगी, आकाश में गर्जन हुआ, दिशाएँ लाल रक्त-सी चमक उठीं।
उस ऊर्जा के मध्य से प्रकट हुईं आद्या काली—
शरीर स्याह नभ जैसा
बाल बिखरे हुए, अनंत आकाश की तरह फैलते हुए
नेत्र अग्नि की भाँति प्रज्वलित
दाँत रौद्रता से चमकते
गर्दन में नर-मुण्डों की माला
कर-कमलों में त्रिशूल, खड्ग, कट्यार और रक्तमय कटे हुए असुर के सिर
जिह्वा बाहर, दुष्टों के विनाश का संकल्प लिए
उनके रूप को देखकर देव भी काँप उठे। यह वो रूप था जो सृष्टि-विनाश तक कर सकता था—
काल को भी निगल जाने वाली—काली।
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चंड-मुंड का वध : काली का रौद्र आरंभ
सबसे पहले युद्धभूमि में आए दैत्य चंड और मुंड। वे गर्व से हँसते हुए बोले,
“अरे देवी! क्या तुम एक अकेली योद्धा हमारी सेना के सामने टिक पाओगी?”
माँ काली मुस्कुराईं—वो मुस्कान बिजली की चमक जैसी।
क्षण मात्र में उन्होंने पर्वत-सी छलाँग लगाई, खड्ग घुमाया, और देखते ही देखते चंड का सिर काट दिया।
मुंड भागने लगा, पर माँ की गति तूफान से भी तेज थी। उन्होंने मुंड को पकड़ा और खड्ग एक प्रचंड प्रहार में उतार दिया।
देवी अंबिका ने दूर से देखा और कहा—
“वाहे काली! आज से तुम्हें चामुंडा नाम से भी जाना जाएगा।”
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रक्तबीज का आतंक
रक्तबीज युद्धभूमि में उतरा। उसके एक-एक कदम से धरती लाल हो रही थी। उसने युद्ध प्रारंभ किया। हर बार जब कोई देवता या देवी उसकी देह पर प्रहार करते, उसके निकलते रक्तकण से हजारों नए रक्तबीज उत्पन्न हो जाते।
देवता हार मानने लगे।
महिषासुर मर्दिनी रूप भी उससे परेशान हो उठीं।
तभी काली माँ आगे बढ़ीं। उनके नेत्र चमक उठे—चुनौती उन्हें प्रिय थी।
उन्होंने घोषणा की—
“अब रक्त का एक कण भी धरती पर नहीं गिरेगा। संहार मेरा धर्म है।"
माँ ने अपनी जिह्वा को फैलाया।
जब देवताओं ने रक्तबीज पर प्रहार किया, उसके रक्तकण गिरते उससे पहले ही काली माँ ने उन्हें निगल लिया।
रक्तबीज भयभीत हो उठा—
“हे देवी! तुम मेरा अस्तित्व ही मिटा रही हो…!”
क्षण भर में माँ काली ने उसकी देह पर आक्रमण किया, उसका सिर काट दिया, और पूरा रक्त स्वयं पी लिया—
युद्धभूमि में पूर्ण मौन छा गया।
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शुंभ-निशुंभ का अंत
रक्तबीज के मरते ही युद्ध की दिशा बदल गई।
अब दो विशाल असुर—शुंभ और निशुंभ—आए।
उनकी सेना आकाश ढक रही थी।
हवा में धुआँ, दिशाओं में चीखें।
देवताओं ने सोचा—
“क्या यह रूप भी इनका अंत कर पाएगा?”
माँ काली ने अपनी हँसी से ही आकाश कंपा दिया।
उन्होंने अपने बालों को झटका—उनसे चमकदार अग्नि फूट पड़ी।
उनकी गति इतनी तेज कि असुरों की आँखें उन तक पहुँच ही न पाईं।
एक ही वार में निशुंभ धराशायी हो गया।
शुंभ गरजा—
“अगर तुम इतनी शक्तिशाली हो, तो अकेली लड़ो।”
तभी माँ के भीतर से एक दिव्य ध्वनि आई—
“काली अकेली ही पर्याप्त है।”
उन्होंने शुंभ को आकाश में उठाकर फेंका और पर्वत-सी शक्ति से काटकर धरती पर पटक दिया।
शुंभ का अंत हो गया।
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काली का विकराल तांडव
युद्ध समाप्त हो गया, पर काली माँ का क्रोध नहीं रुका।
रक्त पीने से उनका रौद्रता कई गुना बढ़ गई थी।
उनकी जिह्वा रक्त से भीगी थी, माला में ताज़े कटे हुए असुरों के मुँड लटक रहे थे।
उनकी आँखें लाल अग्नि से भरी थीं।
वह पृथ्वी पर तांडव करने लगीं—
हर प्रहार से पर्वत टूटने लगे
हर कदम से धरती फटने लगी
समुद्र की लहरें ऊँची उठने लगीं
नदियाँ अपनी दिशा बदलने लगीं
देवता भयभीत होने लगे—
“अगर माँ का तांडव रुका नहीं, तो सृष्टि का विनाश हो जाएगा।”
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महादेव का आगमन : काली को शांत करने का प्रयास
महादेव ने देखा कि आदिशक्ति का क्रोध अब संहार से भी परे जा चुका है।
यह वह अवस्था थी जहाँ शक्ति स्वयं को नहीं पहचानती।
महादेव ने निश्चय किया—
“यदि किसी को माँ को शांत करना है, तो वह केवल मैं ही हूँ।”
वे युद्धभूमि में आए और काली माँ के सामने लेट गए।
काली माँ तांडव में इतनी मग्न थीं कि उन्होंने कुछ भी न देखा और उस देह पर पैर रख दिया।
उसी क्षण उन्हें चेतना लौटी—
“हे प्रभु! मैं अपने प्रिय पर चढ़ गई?”
उनकी जिह्वा शर्म और करुणा से बाहर निकल आई।
क्रोध शांत हो गया।
सृष्टि बच गई।
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काली रूप का दार्शनिक अर्थ
काली माँ का विकराल रूप केवल संहार का प्रतीक नहीं—
वह न्याय है, वह मुक्तिदात्री है, वह अहंकार का अंत है।
काला रंग — समय और अनंत का प्रतीक
जिह्वा बाहर — अहंकार का दमन
मुण्डमाला — अज्ञान के नाश का चिन्ह
कटी भुजाएँ — कर्मबंधनों से मुक्ति
खड्ग — विवेक
उनका नग्न, रौद्र रूप — सत्य का निर्वस्त्र स्वरूप
वे वह शक्ति हैं जो सृष्टि और विनाश दोनों को धारण करती हैं।
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माँ काली और भक्तों का संबंध
काली माँ अपने भक्तों को संरक्षित करती हैं।
कथा है कि जो भी निडरता, सत्य, न्याय और निर्भीकता चाहता है, माँ काली उसे वह वरदान देती हैं।
वे दुष्टों का नाश करती हैं लेकिन भक्तों के लिए माँ से बढ़कर दयालु, करुणामयी कोई नहीं।
कई संतों ने उन्हें “जगदंबा”, “तारिणी”, “महाकालिका”, “भद्रकाली” और “अन्नपूर्णा” के रूप में अनुभव किया है।
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काली का महा-तत्त्व
काली का विकराल रूप एक संदेश है—
जब अधर्म सीमा पार कर ले, तब सहज रूप वाली देवी नहीं, बल्कि विकराल काली ही प्रकट होती हैं।
उनका रौद्र रूप हमें सिखाता है—
बुराई को समाप्त करना ही दया का सर्वोच्च रूप है
सत्य की रक्षा के लिए क्रोध भी आवश्यक है
अंधकार में भी प्रकाश जन्म लेता है
विनाश के बाद ही नवसृजन होता है
काली माँ का विकराल रूप संसार का संतुलन है—
वह शक्ति जो समय को भी रोक दे, मृत्यु को भी हराए, और धर्म के मार्ग को फिर से उजाला दे।
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