04/09/2026
प्रगटे अभिराम स्याम रसिक ब्रज-बिहारी।
बृंदावन नंद-भवन जन-मन-सुखकारी।
हरन विषम भूमि-भार, करन दुष्ट-दल-उधार।
सरन संत-जन उबार, अखिल अघ-बिदारी॥-प्रगटे०॥
मुदित भए प्रेमी जन, संत भए निर्भय मन।
डरे सकल खल-दुर्जन, अघी-अनाचारी॥-प्रगटे०॥
आनँद अपार छयौ, दुःख-सोक-कुडर गयौ।
गोकुल अब अतुल भयौ, उदये अवतारी॥-प्रगटे०॥
बरस्यौ रस-मेह अमित, रस-सरिता बही अजित।
चली सकल पवन-हित, अग-जग-हितकारी॥-प्रगटे०॥
सब कें अति हिय हुलास, नंद-सुअन-दरस-आस।
दौरे तजि-तजि निवास, आतुरता भारी॥-प्रगटे०॥
पहुँचे नँद-महल हाल, दरसन करि अति निहाल-
भए सकल ग्वालि-ग्वाल, पुलक अंगझारी॥-प्रगटे०॥
पायौ सब सुख अपार, उतर्यौ सब मोह-भार।
तन-मन सब दिए वार, गोकुल-नर-नारी॥-प्रगटे०॥🎉🙇
मो नयनन नँदनन्द बसे री!
नन्द को लाल माल मो गलकी, देखत मन करसै री!
चन्दा से मुखपै मसि-बिन्दा, लटुरी ललित लसै री!
किलकि-किलकि जब हँसत ललकि सखि! बरबस मन करसै री!॥
कोमल कर-पद-पल्लव वाके, परसत हाथ खसै री!
मनहुँ नवल नवनीत गढ़्यौ वह, मन-मत सबहि ग्रसै री!॥
है सब ही व्रज को वह जीवन, लखि-लखि मन हरसै री!
बड़े भाग्य पाई हम यह निधि, सब विधि सुख सरसै री!॥
जुग-जुग जिये लाल यह सजनी! व्रज सुहाग विकसै री!
बाल गुपाल लाल की यह छवि दूरहि तें करसै री!॥
कनिया गोद लै जब हलरावत हों तब मृदु किलकि हँसै री!
बलि-बलि जाउँ, ललन की सुखमा प्रतिपल हिये लसै री!॥
गोकुल रावल के दोऊ रांनें ❁ जिनके चरित पुरान बखाने।
गोकुल पति गृह जसुमति रानी ❁ कीरति भांन भँवन सुखदानी।।
जसुमति कूंखि प्रगट भये स्याम ❁ भादों वदि आठें अभिराम।
नक्षत्र रोहिनी आधी निसा ❁ सुर हरषे भईं निर्मल दिसा।।
नन्द दान एतो कछु दीयौ ❁ संक्यो देखि कुबेर जु हीयौ।
गोपी गोप महा आनन्दे ❁ सर्बसु दै विप्रन पद वन्दे।।
इहि विधि सौं जु कियौ दधि कादौं ❁ मानौ लग्यौ महा भर भादौं।
हरि अवतार देवमुनि जान्यौ ❁ थिर चर सबहिनु मंगल मान्यौ।।
🌹 🎉❁ अवतार का मुख्य हेतु ❁🎉🌹
दास अनन्य भजन रस हेत ❁ लाल प्रगट भयो नन्द निकेत।
नव किशोर ने सिसु वपु धरयौ ❁ रसिकन पै जु अनुग्रह करयौ।।