27/10/2025
कांग्रेस, भाजपा, आरएसएस और ब्राह्मण समाज: भारत की बदलती राजनीतिक और सामाजिक दिशा
भारत में राजनीति और समाज दोनों एक गहरे परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी अपने जनाधार को बचाने में संघर्ष कर रही है, तो दूसरी ओर भाजपा और आरएसएस जैसे संगठन नई पीढ़ी में राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की भावना को मज़बूती से स्थापित कर चुके हैं। इसी परिवर्तन के बीच ब्राह्मण समाज जैसे समुदाय भी अपनी पहचान और संगठन के महत्व को फिर से समझने लगे हैं।
कांग्रेस और हिंदू समाज
इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस ने भारत पर सबसे लंबे समय तक शासन किया है। आज भी 16–18 प्रतिशत मतदाता पार्टी को वोट देते हैं। परंतु यह भी स्पष्ट है कि उसका जनाधार लगातार घट रहा है। राज्यों में उसकी सरकारें और प्रभावी नेता लगभग समाप्त हो चुके हैं।
बीते 20 वर्षों में कांग्रेस के कदम, निर्णय और रवैये ने जनता के मन में अविश्वास पैदा किया है। 2G, कॉमनवेल्थ और कोयला घोटालों ने उसकी छवि को भ्रष्टाचार से जोड़ दिया। साथ ही, हिंदू आस्था और परंपरा के मामलों में पार्टी का दोहरा रवैया साफ दिखा, चाहे रामसेतु विवाद हो या श्रीराम जन्मभूमि पर विरोध का रुख।
कांग्रेस ने “धर्मनिरपेक्षता” की व्याख्या इस तरह की कि वह हिंदू पहचान से दूरी जैसी लगने लगी। यही कारण है कि जनता अब उस नेतृत्व की ओर झुक रही है जो बहुसंख्यक समाज को भी सम्मान देता है और विकास के साथ सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।
प्रश्न 1: भाजपा और आरएसएस क्यों?
हिंदू होने और अपने देश में बहुसंख्यक होने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए।
2014 से नरेंद्र मोदी जी और पिछले सौ वर्षों से आरएसएस ने यह साबित किया है कि चाहे कितना भी दुष्प्रचार हुआ हो, न तो भाजपा और न ही संघ किसी धर्म या जाति विशेष के खिलाफ है।
वे केवल समाज, राष्ट्र और शांति विरोधी तत्वों के खिलाफ हैं, और यह आवश्यक भी है।
कांग्रेस और अन्य दलों ने बार-बार ऐसा भ्रम फैलाया कि भाजपा “ध्रुवीकरण” करती है, जबकि वास्तविकता यह है कि भाजपा ने भारतीय पहचान को आत्मगौरव से जोड़ा।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 का हटना, तीन तलाक कानून, और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर जैसे कदमों ने यह साबित किया कि आस्था और विकास एक साथ चल सकते हैं।
भाजपा का राष्ट्रवाद “विरोध” पर नहीं, “निर्माण” पर आधारित है, यह उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
प्रश्न 2: ब्राह्मण संगठन की क्या आवश्यकता है?
आज हर धर्म, जाति और समुदाय संगठित है, तो ब्राह्मण समाज क्यों नहीं?
संगठन बनाना या अपने हित की बात करना किसी के खिलाफ होना नहीं है, बल्कि अपनी प्रगति सुनिश्चित करना है। यह प्रगति स्वयं के संगठन और सभी भारतीयों के सामूहिक विकास से ही संभव है।
राजस्थान ब्राह्मण महासभा जैसे संगठन किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखते। उनका उद्देश्य केवल यह है कि ब्राह्मण समाज अपनी बौद्धिक क्षमता, शिक्षा और सेवा की परंपरा के अनुरूप राष्ट्र निर्माण में और अधिक सक्रिय भूमिका निभाए। ब्राह्मण समाज के खिलाफ फैलाए गए दुष्प्रचार का उत्तर केवल समय ही देगा।
ब्राह्मण समाज ऐतिहासिक रूप से भारत के सांस्कृतिक और शैक्षणिक ढांचे का मेरुदंड रहा है। परंतु आज, जब हर समुदाय अपने अधिकार और पहचान के लिए संगठित है, तब ब्राह्मणों का भी संगठित होना स्वाभाविक और आवश्यक है, ताकि उनकी शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक योगदान को मान्यता और सम्मान मिले।
कांग्रेस की राजनीति अब उस दौर में पहुंच चुकी है जहाँ उसे आत्ममंथन की आवश्यकता है। भारत का समाज अब बदल चुका है, वह विकास, सुरक्षा और आत्मसम्मान तीनों चाहता है। भाजपा और आरएसएस ने इस भावना को समझा और अपने कार्यों से इसे सशक्त बनाया।
साथ ही, ब्राह्मण समाज जैसे समुदायों को भी अब आत्मसम्मान और संगठन की आवश्यकता को समझना होगा। किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी परंपरा, संस्कृति और योगदान के प्रति गर्व के साथ।
भारत का भविष्य उन्हीं के हाथ में है जो राष्ट्र, धर्म और समाज, तीनों को साथ लेकर चलना जानते हैं।