04/08/2026
शीर्षक: "प्रकृति की पुकार"
(अंतरा )1
नदियों की धारा कुछ कहती है,
हवा भी कोई गीत सुनाती है।
पत्तों की सरसराहट में जैसे,
ज़िंदगी मुस्कुराती नज़र आती है।
(मुखड़ा)
ओ मेरी धरती, ओ मेरा आसमान,
तुझमें बसता है मेरा जहान।
फूलों की खुशबू, चिड़ियों की तान,
तू ही मेरी पहचान, तू ही मेरी जान।
(अंतरा )2
सूरज की किरण जब छू जाए,
हर सुबह नई उम्मीद लाए।
बारिश की बूंदें गुनगुनाएँ,
सूखे दिल में हरियाली छा जाए।
(समापन)
जब तक साँसें चलती रहेंगी,
तेरी गोद में खुशियाँ पलती रहेंगी।
प्रकृति, तुझसे ही जीवन है,
तू ही मेरा पहला और आख़िरी गीत है।