Deven Sharma

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23/12/2025

लोगों की राय आपकी सच्चाई तय नहीं करती,
क्योंकि जो आपको देख रहा है,
वो आपकी पूरी लड़ाई नहीं जानता।

हर किसी की ज़िंदगी की यात्रा अलग होती है,
कोई मुस्कुराते हुए टूटता है,
तो कोई खामोशी में सब सह जाता है।

इसलिए भीड़ के फैसलों से खुद को मत तोलो,
आपकी कहानी… सिर्फ़ आप जानते हो।

पहाड़ शांति सिखाते हैं,लेकिन आज पहाड़ खुद शोर में डूब रहे हैं।हिमाचल प्रदेश में बढ़ती अनियंत्रित पर्यटन भीड़ अब सिर्फ ट्...
23/12/2025

पहाड़ शांति सिखाते हैं,
लेकिन आज पहाड़ खुद शोर में डूब रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में बढ़ती अनियंत्रित पर्यटन भीड़ अब सिर्फ ट्रैफिक और होटल की समस्या नहीं रही यह प्रकृति जलस्रोतों जंगलों और स्थानीय जीवन के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।

कचरा पहाड़ों पर
पानी की कमी गांवों में
अवैध निर्माण और पहाड़ों की कटाई
जाम में फंसी एंबुलेंस और स्थानीय लोग

पर्यटन जरूरी है लेकिन संवेदनशील पहाड़ों की कीमत पर नहीं अगर आज हमने संतुलन नहीं बनाया
तो कल ये वादियाँ सिर्फ तस्वीरों में रह जाएंगी।







हिमाचल सरकार और फार्मा इंडस्टी की बेशर्मी8 महीने का चौंकाने वाला आंकड़ा, बढ़ती चिंता आखिर चूक कहां?हिमाचल प्रदेश को देश ...
22/12/2025

हिमाचल सरकार और फार्मा इंडस्टी की बेशर्मी
8 महीने का चौंकाने वाला आंकड़ा, बढ़ती चिंता आखिर चूक कहां?

हिमाचल प्रदेश को देश की फार्मा हब कहा जाता है। बद्दी, नालागढ़, पांवटा साहिब जैसे औद्योगिक क्षेत्रों से देश-विदेश में दवाएं सप्लाई होती हैं। लेकिन पिछले 8 महीनों में लगातार दवा सैंपलों का फेल होना न सिर्फ उद्योग के लिए, बल्कि आम मरीजों की सेहत के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

8 महीने में क्या सामने आया?

सरकारी लैब जांच में कई कंपनियों की दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतरीं। कहीं दवा में असर (Potency) कम कहीं घुलने की दर गलत, तो कहीं कंटैमिनेशन जैसी गंभीर खामियां पाई गईं। यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या किसी एक फैक्ट्री तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम लेवल पर गड़बड़ी है।

आखिर चूक कहां हो रही है?

1) क्वालिटी कंट्रोल में ढील कागजों में सब ठीक, लेकिन ग्राउंड पर SOPs का पालन कमजोर। QC सिर्फ औपचारिकता बनता जा रहा है।

2) कच्चे माल (Raw Material) की घटिया गुणवत्ता
सस्ती कीमत के चक्कर में API और एक्सिपिएंट्स की क्वालिटी से समझौता—यहीं से दिक्कत शुरू होती है।

3) मैनपावर और ट्रेनिंग की कमी अनुभवी टेक्नीशियन की जगह अंडर-ट्रेंड स्टाफ गलत हैंडलिंग, गलत रिकॉर्डिंग।

4) उत्पादन का दबाव तेजी से बैच निकालने की होड़ में टेस्टिंग टाइम कम, रिजल्ट फेल सैंपल।

5) निरीक्षण और निगरानी कमजोर नियमित, सख्त और निष्पक्ष इंस्पेक्शन की कमी से लापरवाही बढ़ती है।

सबसे बड़ा नुकसान किसका?

सीधा नुकसान : मरीज का

असरहीन दवा = बीमारी लंबी
गलत डोज/घुलन = साइड इफेक्ट
भरोसा टूटना = पूरे इंडस्ट्री पर सवाल

अब रास्ता क्या है?

QC सिस्टम को ऑटोमेशन + थर्ड-पार्टी ऑडिट
Raw Material Traceability अनिवार्य
स्टाफ की नियमित ट्रेनिंग
रियल-टाइम लैब रिपोर्टिंग
फेल कंपनियों पर सख्त कार्रवाई,

आपकी राय क्या है? कमेंट में बताइए दवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सबसे जरूरी कदम क्या होना चाहिए?

#हिमाचल_फार्मा #दवा_क्वालिटी

फेक न्यूज़ सबसे सस्ता ज़हर ❌एक झूठी पोस्ट, एक बिना सोचा Forward  और नुकसान हज़ारों का।सोचिएक्या आप सच फैलाना चाहते हैं य...
21/12/2025

फेक न्यूज़ सबसे सस्ता ज़हर ❌

एक झूठी पोस्ट, एक बिना सोचा Forward और नुकसान हज़ारों का।

सोचिए
क्या आप सच फैलाना चाहते हैं या अफ़वाह?

सोचें | जाँचें | तभी शेयर करें
आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

#सोच_समझकर_शेयर_करें


ूरी_है

Save Aravalli 🌱 अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं यह हमारी हवा का फ़िल्टर, पानी का भंडार और जलवायु का संतुलन है। आज अरावली पर्वतमा...
20/12/2025

Save Aravalli 🌱

अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं यह हमारी हवा का फ़िल्टर, पानी का भंडार और जलवायु का संतुलन है। आज अरावली पर्वतमाला अवैध खनन, कटाई और कंक्रीट के जंगल से दम तोड़ रही है।

अगर अरावली बचेगी, तो हवा बचेगी। पानी बचेगा। भविष्य बचेगा।

अब चुप नहीं आवाज़ उठाओ

तुलसी: केवल पौधा नहीं, हमारी संस्कृति की आत्माभारत की संस्कृति में तुलसी सिर्फ एक पौधा नहीं है,वह संस्कार, स्वास्थ्य और ...
19/12/2025

तुलसी: केवल पौधा नहीं, हमारी संस्कृति की आत्मा

भारत की संस्कृति में तुलसी सिर्फ एक पौधा नहीं है,
वह संस्कार, स्वास्थ्य और संवेदना का प्रतीक रही है।
हर सुबह तुलसी के सामने दीपक जलाना, उसके चारों ओर परिक्रमा करना यह कोई अंधविश्वास नहीं था,
बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ने का सबसे सरल तरीका था।

तुलसी पूजन दिवस हमें याद दिलाने के लिए मनाया जाता है कि हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। यह दिन पूजा से ज्यादा चेतना का दिन है
जहाँ हम यह समझें कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और आस्था
एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

एक समय था जब हर घर के आंगन में तुलसी होती थी।
वह हवा को शुद्ध करती थी, मच्छरों और बैक्टीरिया से बचाव करती थी, और बीमारियों के समय दवा से पहले याद की जाती थी।

आज विज्ञान भी मानता है कि तुलसी इम्युनिटी बढ़ाती है
और शरीर को रोगों से लड़ने की ताकत देती है।

आज हमारे पास एयर प्यूरीफायर हैं, महंगी दवाइयाँ हैं,
लेकिन सांस लेने की शुद्ध हवा नहीं है।

हमने सुविधा तो पा ली, लेकिन प्रकृति से जुड़ाव खो दिया। तुलसी हमें संतुलन सिखाती थी कम में जीना, और ज्यादा देना।

जब बच्चा रोज़ तुलसी को पानी देता है, तो वह सिर्फ एक पौधे की देखभाल नहीं करता, वह जिम्मेदारी, धैर्य और करुणा सीखता है। यही छोटे-छोटे संस्कार उसे एक संवेदनशील इंसान बनाते हैं।

तुलसी एक साथ औषधि है, पर्यावरण की रक्षक है और आस्था का आधार भी। इसीलिए हमारी संस्कृति ने
उसे माँ का स्थान दिया।

जो बात आयुर्वेद ने हजारों साल पहले कही, आज वही बात आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है। तुलसी तनाव कम करती है, इम्युनिटी मजबूत करती है और शरीर को प्राकृतिक संतुलन में रखती है।

आने वाले तुलसी पूजन दिवस पर जो कि 25 दिसंबर 2025 को है हमें यह तय करना होगा कि हम केवल बातें करेंगे या सच में कुछ बदलेंगे।

अगर घर में जगह नहीं है तो गमले में सही, अगर पूजा नहीं कर सकते तो देखभाल सही, लेकिन तुलसी को जीवन से दूर मत कीजिए।

क्योंकि जो समाज प्रकृति को सम्मान देता है, वही सच में सभ्य कहलाता है।






चाय गिर गई… और आईना दिख गया समाज कोहाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हुआ। वीडियो में चीन की एक महिला सार्वज...
19/12/2025

चाय गिर गई… और आईना दिख गया समाज को

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हुआ। वीडियो में चीन की एक महिला सार्वजनिक जगह पर गलती से चाय गिरा देती है। कोई सफाई कर्मचारी पास नहीं है, कोई कैमरे के लिए एक्टिंग नहीं वह महिला चुपचाप अपनी ही स्कार्फ निकालती है और फर्श साफ कर देती है।
बस यहीं से दुनिया भर में बहस शुरू हो गई सिविक सेंस यानी नागरिक जिम्मेदारी पर।

सिविक सेंस आखिर होता क्या है?
सिविक सेंस कोई कानून की किताब नहीं है।
यह बस इतना है कि जो जगह मेरी नहीं है, उसे भी मैं अपनी ही समझूँ।

सड़क, बस, ट्रेन, पार्क, अस्पताल, सरकारी दफ्तर ये सब किसी और की नहीं, हम सबकी हैं।

भारत में हम कहाँ चूक जाते हैं?

सच बोलें तो भारत में समस्या कानून की कमी नहीं, आदतों की है।

सड़क पर कचरा फेंककर कहना: नगर निगम साफ करेगा
ट्रेन में थूककर कहना: सब करते हैं सार्वजनिक शौचालय गंदा करके निकल जाना ट्रैफिक नियम तोड़कर कहना: कौन सा कोई देख रहा है

हम भूल जाते हैं कि सब करते हैं से ही देश बनता है।
चीन बनाम भारत नहीं, सोच बनाम सोच है

यह वीडियो यह नहीं कहता कि चीन और जापान के लोग हमसे बेहतर हैं। यह बस यह पूछता है अगर वही चाय भारत में गिरी होती, तो क्या हम भी झुककर साफ करते?
या फिर कहते कोई और कर देगा मेरी जिम्मेदारी नहीं
मैं टैक्स देता हूँ

आम आदमी का सवाल मुझे क्या मिलेगा

यही सबसे बड़ा सवाल है।
साफ जवाब है

साफ सड़क = कम बीमारियाँ
अनुशासन = कम तनाव
जिम्मेदारी = बेहतर भविष्य (हमारे बच्चों के लिए)

सिविक सेंस कोई एहसान नहीं, यह निवेश है। बदलाव बड़े भाषण से नहीं, छोटे काम से आता है आपसे कोई महान काम नहीं मांगा जा रहा l

कचरा डस्टबिन में डाल दें
सार्वजनिक जगह को नुकसान न पहुँचाएँ
गलती हो जाए तो यह मेरी जिम्मेदारी है कहें
बच्चों को देखकर नहीं, बच्चों के लिए सही करें

आख़िरी बात

वायरल वीडियो में महिला हीरो इसलिए नहीं बनी क्योंकि उसने स्कार्फ से फर्श साफ किया, वह हीरो इसलिए बनी क्योंकि उसने यह नहीं सोचा कोई देख रहा है या नहीं।

भारत बदलेगा तब, जब हम भी यही सोच अपनाएँगे।

देश सरकार से नहीं, आदतों से बनता है।







हिमाचल में बिना बर्फ की सर्दी एक खामोश चेतावनी कभी आपने सोचा था कि दिसंबर जनवरी जैसे महीनों में शिमला, मनाली, कुफरी जैसी...
18/12/2025

हिमाचल में बिना बर्फ की सर्दी एक खामोश चेतावनी

कभी आपने सोचा था कि दिसंबर जनवरी जैसे महीनों में शिमला, मनाली, कुफरी जैसी जगहों पर बर्फ न गिरे जो हिमाचल कभी सफेद चादर जलती अलाव गरम चाय
और बर्फीले खेलों के लिए जाना जाता था, आज वही हिमाचल सूखी सर्दी झेल रहा है। यह कोई सामान्य बदलाव नहीं है यह Climate Change की सीधी और डरावनी दस्तक है। आखिर बर्फ क्यों नहीं गिर रही?

धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। जब तापमान 0°C से ऊपर रहता है, तो बर्फ की जगह सिर्फ ठंडी हवा रह जाती है। पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पहले ये सिस्टम नियमित रूप से बर्फ और बारिश लाते थे।अब या तो आते नहीं,या बहुत कमजोर होकर लौट जाते हैं। जंगलों की कटाई और कंक्रीट का जंगल पेड़ कम नमी कम बादल कम बर्फ नहीं। अनियंत्रित टूरिज्म और प्रदूषण हजारों गाड़ियाँ, प्लास्टिक, धुआँ पहाड़ चुप हैं, लेकिन टूट रहे हैं।

इसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं सेब की फसल प्रभावित पानी के स्रोत सूख रहे पर्यटन पर असर स्थानीय लोगों की आजीविका खतरे में आने वाले वर्षों में जल संकट
आज अगर हिमाचल में बर्फ नहीं गिरी, तो कल हमारे शहरों में पानी नहीं गिरेगा
सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, हमसे भी है क्या हम अब भी कहेंगे अरे, इस साल बर्फ नहीं गिरी कोई बात नहीं”?
या फिर सोचेंगे हमने कितना प्लास्टिक कम किया?
हमने कितने पेड़ लगाए? हमने पहाड़ों को सिर्फ देखने की चीज़ समझा या जीने की?
अभी भी वक्त है प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करें पहाड़ों में जिम्मेदार पर्यटन अपनाएँ पेड़ लगाएँ, सिर्फ पोस्ट नहीं Climate Change को मज़ाक न समझें

हिमाचल रो नहीं रहा,
चेतावनी दे रहा है।
अगर आज नहीं सुना,
तो कल सिर्फ तस्वीरों में बर्फ बचेगी।

अगर आपको लगता है कि यह मुद्दा ज़रूरी है तो शेयर करें।
क्योंकि जागरूकता भी एक जिम्मेदारी है।















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