19/12/2025
तुलसी: केवल पौधा नहीं, हमारी संस्कृति की आत्मा
भारत की संस्कृति में तुलसी सिर्फ एक पौधा नहीं है,
वह संस्कार, स्वास्थ्य और संवेदना का प्रतीक रही है।
हर सुबह तुलसी के सामने दीपक जलाना, उसके चारों ओर परिक्रमा करना यह कोई अंधविश्वास नहीं था,
बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ने का सबसे सरल तरीका था।
तुलसी पूजन दिवस हमें याद दिलाने के लिए मनाया जाता है कि हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। यह दिन पूजा से ज्यादा चेतना का दिन है
जहाँ हम यह समझें कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और आस्था
एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
एक समय था जब हर घर के आंगन में तुलसी होती थी।
वह हवा को शुद्ध करती थी, मच्छरों और बैक्टीरिया से बचाव करती थी, और बीमारियों के समय दवा से पहले याद की जाती थी।
आज विज्ञान भी मानता है कि तुलसी इम्युनिटी बढ़ाती है
और शरीर को रोगों से लड़ने की ताकत देती है।
आज हमारे पास एयर प्यूरीफायर हैं, महंगी दवाइयाँ हैं,
लेकिन सांस लेने की शुद्ध हवा नहीं है।
हमने सुविधा तो पा ली, लेकिन प्रकृति से जुड़ाव खो दिया। तुलसी हमें संतुलन सिखाती थी कम में जीना, और ज्यादा देना।
जब बच्चा रोज़ तुलसी को पानी देता है, तो वह सिर्फ एक पौधे की देखभाल नहीं करता, वह जिम्मेदारी, धैर्य और करुणा सीखता है। यही छोटे-छोटे संस्कार उसे एक संवेदनशील इंसान बनाते हैं।
तुलसी एक साथ औषधि है, पर्यावरण की रक्षक है और आस्था का आधार भी। इसीलिए हमारी संस्कृति ने
उसे माँ का स्थान दिया।
जो बात आयुर्वेद ने हजारों साल पहले कही, आज वही बात आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है। तुलसी तनाव कम करती है, इम्युनिटी मजबूत करती है और शरीर को प्राकृतिक संतुलन में रखती है।
आने वाले तुलसी पूजन दिवस पर जो कि 25 दिसंबर 2025 को है हमें यह तय करना होगा कि हम केवल बातें करेंगे या सच में कुछ बदलेंगे।
अगर घर में जगह नहीं है तो गमले में सही, अगर पूजा नहीं कर सकते तो देखभाल सही, लेकिन तुलसी को जीवन से दूर मत कीजिए।
क्योंकि जो समाज प्रकृति को सम्मान देता है, वही सच में सभ्य कहलाता है।