04/06/2026
जरा कल्पना कीजिए... यदि पूरी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से कोई पूछ बैठे कि "आप कौन हैं?" तो उनके मन पर क्या बीतेगी? जिस देवता के एक दिन में युगों का समय बीत जाता है, जिसकी रचना में असंख्य लोक और प्राणी बसते हैं, यदि उसी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग जाए तो उसका अहंकार किस तरह चूर-चूर होगा? द्वारका में एक समय ठीक ऐसा ही हुआ था। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की ऐसी दिव्य लीला थी जिसने ब्रह्मांडों के उस रहस्य को उजागर किया जिसे आज आधुनिक विज्ञान मल्टीवर्स या मल्टी यूनिवर्स कहकर समझने की कोशिश करता है। यह कथा केवल ब्रह्मा जी के अहंकार के टूटने की नहीं, बल्कि उस अनंत सत्य की है जो बताता है कि ईश्वर की सृष्टि हमारी कल्पना से भी कहीं अधिक विशाल और असीम है।
एक समय की बात है। ब्रह्मा जी अपने ब्रह्मलोक में विराजमान थे। उन्होंने असंख्य जीवों, ग्रहों, नक्षत्रों और लोकों की रचना की थी। युगों से वे सृष्टि संचालन का कार्य कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके मन में एक सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगा। यह अहंकार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इतना अवश्य था कि उन्हें लगने लगा कि इस विशाल सृष्टि में उनके समान कोई दूसरा नहीं है। वे स्वयं को एकमात्र ब्रह्मा और संपूर्ण सृष्टि का अकेला रचयिता समझने लगे। तभी उनके मन में विचार आया कि क्यों न स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के पास जाकर अपने स्थान और महत्व की पुष्टि की जाए। यह सोचकर वे तुरंत द्वारका नगरी की ओर प्रस्थान कर गए।
जब ब्रह्मा जी द्वारका पहुंचे तो वहां के वैभव को देखकर भी आश्चर्यचकित रह गए। सोने से सजे महल, चमकते हुए प्रांगण, दिव्य सुगंध और हर ओर गूंजता हुआ श्रीकृष्ण का नाम। वे सीधे राजमहल के द्वार पर पहुंचे और द्वारपाल से बोले, "जाओ, भगवान श्रीकृष्ण से कहो कि ब्रह्मा उनसे मिलने आए हैं।" द्वारपाल ने जाकर श्रीकृष्ण को संदेश सुनाया। लेकिन भीतर से जो उत्तर आया, उसे सुनकर स्वयं ब्रह्मा जी भी स्तब्ध रह गए। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए केवल एक प्रश्न पूछा, "कौन से ब्रह्मा आए हैं?"
यह सुनते ही ब्रह्मा जी के मन में हलचल मच गई। उन्होंने सोचा शायद द्वारपाल ने संदेश ठीक से नहीं पहुंचाया होगा। उन्होंने फिर कहा, "जाकर कहो कि चार मुखों वाले ब्रह्मा आए हैं, जो इस ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता हैं।" द्वारपाल ने फिर वही संदेश भीतर पहुंचाया। इस बार श्रीकृष्ण ने उन्हें अंदर आने की अनुमति दे दी। लेकिन जैसे ही ब्रह्मा जी राजसभा में प्रवेश किए, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके सामने जो दृश्य था, उसे देखकर उनका समस्त अहंकार एक ही क्षण में बिखरने वाला था।
सभा में केवल वे अकेले ब्रह्मा नहीं थे। वहां असंख्य ब्रह्मा उपस्थित थे। किसी के दस मुख थे, किसी के सौ मुख। किसी के एक हजार मुख थे तो किसी के लाखों मुख। कुछ ब्रह्मा इतने विशाल थे कि उनकी दिव्य आभा पूरी सभा को प्रकाशित कर रही थी। हर ब्रह्मा अपने-अपने ब्रह्मांड का स्वामी था। सभी भगवान श्रीकृष्ण के सामने नतमस्तक खड़े थे। यह दृश्य देखकर चार मुखों वाले ब्रह्मा जी के शरीर में कंपन होने लगा। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि जिस पद पर उन्हें इतना गर्व था, वह तो अनंत ब्रह्मांडों में से केवल एक छोटे से ब्रह्मांड का दायित्व मात्र है।
ब्रह्मा जी का सिर झुक गया। उनके भीतर का सारा अहंकार पलभर में समाप्त हो गया। कांपते हुए स्वर में उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, "प्रभु, यह कैसी लीला है? मैं तो स्वयं को संपूर्ण सृष्टि का एकमात्र ब्रह्मा समझता था।" श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उनके चेहरे पर करुणा और ज्ञान की दिव्य आभा थी। उन्होंने कहा, "ब्रह्मा, यह सृष्टि उतनी छोटी नहीं है जितनी तुम समझते हो। अनंत ब्रह्मांड हैं और प्रत्येक ब्रह्मांड का अपना एक ब्रह्मा है। तुम उनमें से केवल एक हो।"
फिर श्रीकृष्ण ने वह महान रहस्य बताया जिसे सुनकर ब्रह्मा जी की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। भगवान बोले, "मेरे स्वरूप भी अनेक स्तरों पर कार्य करते हैं। महाविष्णु वह स्वरूप हैं जिनकी एक श्वास से असंख्य ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं और एक श्वास के साथ ही विलीन हो जाते हैं। उन प्रत्येक ब्रह्मांड में गर्भोदकशायी विष्णु प्रवेश करते हैं और वहीं से एक-एक ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है। फिर क्षीरोदकशायी विष्णु प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा बनकर निवास करते हैं। इसलिए मैं केवल एक लोक में नहीं, हर ब्रह्मांड, हर जीव और हर कण में उपस्थित हूं।"
श्रीकृष्ण के मुख से यह दिव्य ज्ञान सुनकर ब्रह्मा जी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्हें पहली बार समझ आया कि ईश्वर की महिमा का कोई अंत नहीं है। जो स्वयं को महान समझता है, वह वास्तव में ईश्वर की अनंत लीला का एक छोटा सा अंश मात्र है। वे तुरंत श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और बोले, "प्रभु, मुझे क्षमा करें। मैं अपने पद और अपनी शक्ति पर गर्व करने लगा था। आज आपने मुझे मेरा वास्तविक स्थान दिखा दिया।"
भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक उन्हें उठाया और कहा, "ब्रह्मा, ज्ञान वहीं जन्म लेता है जहां अहंकार समाप्त होता है। जब तक मनुष्य स्वयं को सबसे बड़ा समझता है, तब तक वह सत्य से दूर रहता है। लेकिन जिस दिन उसका अहंकार टूट जाता है, उसी दिन उसके भीतर वास्तविक ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है।"
उस दिन द्वारका की उस दिव्य सभा में केवल ब्रह्मा जी का अहंकार नहीं टूटा था, बल्कि संसार के लिए एक महान संदेश भी प्रकट हुआ था। यह संदेश था कि ईश्वर की सृष्टि अनंत है, उनकी शक्ति असीम है और उनके सामने सबसे महान व्यक्ति भी एक छोटा सा अंश मात्र है। यही सनातन धर्म का वह गहरा रहस्य है जो हमें सिखाता है कि ब्रह्मांड कितना भी विशाल क्यों न हो, उसके पीछे एक ही परम सत्य कार्य कर रहा है और वह सत्य है भगवान की अनंत लीला। जय श्री कृष्ण। 🙏🚩