Shintu yadav

Shintu yadav जहां हंसी है, वहीं Shintu है 😆🎬 Comedy • Fun • Real Life

आज का वातावरण आप सब देख रहे हैं, कि बहुत अधिक बिगड़ गया है। *"माता-पिता प्रायः बच्चों पर ध्यान नहीं दे रहे। वे अपना पैसा...
06/06/2026

आज का वातावरण आप सब देख रहे हैं, कि बहुत अधिक बिगड़ गया है। *"माता-पिता प्रायः बच्चों पर ध्यान नहीं दे रहे। वे अपना पैसा कमाने खाने पीने पार्टी डांस आदि में उलझे हुए हैं। अतः अपने बच्चों पर ध्यान न देने के कारण, उनके बच्चे बिगड़ रहे हैं। जब भी माता-पिता को थोड़ा बहुत समय मिलता है, तो बच्चों की बिगड़ी हुई स्थिति को देखकर वे उन्हें उपदेश देने लगते हैं, कि बेटा ऐसा मत करो, और ऐसा करो।"*
यद्यपि माता-पिता का उपदेश तो ठीक ही होता है। *"परंतु जिस समय वह उपदेश देना चाहिए और उस उपदेश के अनुसार माता-पिता को स्वयं वैसा आचरण करके दिखाना चाहिए, वह समय तो निकल गया। उसके बाद उन्हें सिखाने से कोई विशेष लाभ नहीं होता।"*
*"बच्चों को सिखाने की उम्र होती है, 2/3 वर्ष की आयु से लेकर 12/13 वर्ष की आयु तक।" "यदि इस समय सीमा के अंतर्गत कोई माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देवें। और जो कुछ बातें वे अपने बच्चों को उपदेश के रूप में कहते हैं, वैसा आचरण भी माता-पिता स्वयं करके दिखाएं, तब तो बच्चों को बढ़िया संस्कार मिलते हैं, और जीवन भर उनका प्रभाव बच्चों पर रहता है। बच्चे उन संस्कारों से प्रभावित होकर आजीवन अच्छे काम करते हैं। तब माता-पिता और बच्चे दोनों का जीवन सफल हो जाता है।"*
परंतु उपदेश और आचरण सिखाने का समय निकल जाने के बाद फिर कोई विशेष लाभ नहीं होता। *"फिर बच्चों पर प्रभाव नहीं पड़ता और बच्चे, माता-पिता के उपदेश को एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। जब बच्चों में ऐसी स्थिति पाई जाए, तो समझ लीजिएगा कि अब आपके बच्चे बिगड़ रहे हैं। अतः बच्चों को बिगाड़ से बचाने के लिए माता-पिता को स्वयं सावधान होकर तपस्वी जीवन जीना होगा।"*
*"गृहस्थ आश्रम एक तपस्या का आश्रम है। जो माता-पिता इस आश्रम में तपस्या करते हैं और स्वयं उत्तम आचरण करके बच्चों के सामने अपना ही उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उन्हीं के बच्चे अच्छे बनते हैं। संस्कारी ईमानदार बुद्धिमान देशभक्त चरित्रवान और ईश्वर भक्त बनते हैं।"*
आप भी इन बातों पर विचार करें और अपने जीवन में इनसे लाभ उठाएं। *"यदि आपकी आयु बड़ी हो गई, बच्चे भी आपके 25/30 वर्ष की आयु के हो गए, तो ये बातें उन युवा पीढ़ी वालों को बताएं, जिनके बच्चे अभी छोटे हैं। दो-चार वर्ष की आयु के हैं। वे लोग इन बातों से लाभ उठाकर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें। इससे उन युवा पीढ़ी वालों का और उनके बच्चों का, दोनों का जीवन सफल हो जाएगा।"*

जब किसी के साथ छोटा-मोटा अन्याय होता है, तो पहले वह उसे सहन कर लेता है। *"फिर और अन्याय होने पर वह अन्यायकारी को सूचित क...
06/06/2026

जब किसी के साथ छोटा-मोटा अन्याय होता है, तो पहले वह उसे सहन कर लेता है। *"फिर और अन्याय होने पर वह अन्यायकारी को सूचित करता है। फिर और अन्याय होने पर वह उसको चेतावनी देता है। यदि अन्याय फिर भी न रुके, तो फिर वह बदला लेने के लिए क्रोध करता है। मन से वाणी से और कभी-कभी शरीर से मारपीट भी कर लेता है। इसे बदला लेना या प्रतिशोध कहते हैं।"*
कुछ समय बाद जब क्रोध करने के परिणाम सामने आते हैं, तब वह दुखी होता है, और पश्चाताप करता है कि *"मैंने क्रोध क्यों किया। उसका परिणाम तो मेरे पक्ष में नहीं आया, कोई लाभ नहीं हुआ। उल्टा हानि ही हुई। इसलिए मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए था।"* तब वह इस प्रकार से पश्चाताप करता है।
तो बुद्धिमान व्यक्ति को सोचना चाहिए, कि *"मैं ऐसी मूर्खता क्यों करूं? जिसके अंत में मुझे पश्चाताप करना पड़े।"*
तो अब इस समस्या का समाधान क्या है। समाधान यह है कि "व्यक्ति क्रोध करने से पहले ही उसके परिणाम पर विचार करे, कि *"इसमें कुल मिलाकर मुझे लाभ नहीं होगा। इसलिए मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए।" "यदि इस प्रकार का आत्म सुझाव (ऑटो सजेशन) प्रतिदिन व्यक्ति स्वयं को देवे, तो उसकी क्रोध करने की आदत धीरे-धीरे कम हो जाएगी, और एक दिन छूट जाएगी।"*
परंतु जब दूसरा व्यक्ति अन्याय करता है, तब क्रोध तो आता ही है। उसको रोकें कैसे? तब ऐसा सोचें कि *"यह व्यक्ति अज्ञानी और स्वार्थी है। अपने अज्ञान के कारण अथवा स्वार्थ के कारण मुझ पर अन्याय करता है। यदि वे अन्याय छोटे-छोटे स्तर के हों, तो ये तीन शब्द अपने मन में बोलकर वह उस अन्याय को सहन कर ले, "कोई बात नहीं।"*
*"यदि कुछ बड़ा अन्याय हो, और दूसरे व्यक्ति को अपने ऊपर अन्याय करने से रोक न पा रहा हो, तो ऐसी स्थिति में वह उसे ईश्वर के न्याय पर छोड़ दे।"* तब अपने मन में ये तीन शब्द बोले, *"ईश्वर न्याय करेगा।"* परंतु भविष्य में अपनी सुरक्षा जरूर रखे, कि *"भविष्य में यह दुष्ट व्यक्ति दोबारा मेरी हानि न कर पाए।"* इतना पुरुषार्थ उसे करना होगा।
*"जब वह उस अन्याय को ईश्वर के न्याय पर छोड़ देगा, और बार-बार उस अन्याय की घटना को याद नहीं करेगा, तब वह दुखी नहीं होगा, और क्रोध भी नहीं करेगा।" "सही समय आने पर ईश्वर उसकी हानि की पूर्ति भी कर देगा, और उस अन्यायकारी व्यक्ति को अवश्य ही दंडित भी करेगा।" "इस प्रकार से अपना चिंतन और व्यवहार बनाकर व्यक्ति क्रोध करने से बच सकता है, तथा अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। और जब वह व्यक्ति क्रोध नहीं करेगा, तब उसके मन में बहुत शांति होगी।"*
*"अतः क्रोध के परिणामों को पहले ही विचार कर व्यक्ति क्रोध करने से बचे, और ऐसी मूर्खता क्यों करें कि अंत में उसे पछताना पड़े।"*

पंढरपुर की पावन धरती पर एक भक्त रहती थी जिसका नाम था जनाबाई। बचपन में ही उसने अपनी मां को खो दिया था और कुछ वर्षों बाद उ...
05/06/2026

पंढरपुर की पावन धरती पर एक भक्त रहती थी जिसका नाम था जनाबाई। बचपन में ही उसने अपनी मां को खो दिया था और कुछ वर्षों बाद उसके पिता भी भगवान विट्ठल के दर्शन करते-करते संसार छोड़कर चले गए। उस दिन छोटी सी जना की दुनिया उजड़ गई थी। मंदिर के आंगन में बैठी वह रो-रोकर भगवान से पूछ रही थी कि जब विट्ठल सबके पिता हैं तो उसे अकेला क्यों छोड़ दिया गया। उसी समय संत नामदेव वहां पहुंचे। उन्होंने उस मासूम बालिका के सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटी, विट्ठल के द्वार पर कोई अनाथ नहीं होता। आज से तुम मेरी बेटी हो और विट्ठल तुम्हारे माता-पिता हैं।" यही शब्द जनाबाई के जीवन की दिशा बदल गए।

समय बीतता गया। जनाबाई नामदेव जी के आश्रम में रहने लगी। वह दिन-रात सेवा करती, भजन गाती और हर काम करते समय भगवान विट्ठल का नाम जपती। आश्रम के सभी लोग उसकी मेहनत और भक्ति देखकर आश्चर्य करते। सुबह सूर्योदय से पहले उठना, नदी से पानी लाना, कपड़े धोना, चक्की पीसना, भोजन बनाना और फिर संकीर्तन में शामिल होना—यही उसका जीवन था। लेकिन उसके चेहरे पर कभी शिकायत नहीं दिखती थी। उसे विश्वास था कि उसका हर काम सीधे भगवान विट्ठल तक पहुंच रहा है।

एक दिन एकादशी का पावन पर्व था। आश्रम में हजारों भक्त आने वाले थे। जनाबाई ने रात भर सेवा की थी और थकान के कारण सुबह देर तक सोती रह गई। जब उसकी आंख खुली तो सूर्य काफी ऊपर चढ़ चुका था। यह देखकर उसके हाथ-पैर फूल गए। गुरुजी के वस्त्र धुलने बाकी थे, रसोई का काम अधूरा था और पानी भी नहीं भरा गया था। वह घबराकर नदी की ओर भागी। वहां पहुंची तो उसे एक वृद्ध महिला दिखाई दी। वह मुस्कुराते हुए बोली, "बेटी, इतनी चिंता क्यों कर रही है? ला ये कपड़े मुझे दे दे।"

जनाबाई ने संकोच से कपड़े उसके हाथ में दे दिए। वृद्धा ने कुछ ही क्षणों में सारे वस्त्र इतने सुंदर ढंग से धो दिए कि वे नए जैसे चमकने लगे। जनाबाई बार-बार उसका धन्यवाद करती रही। लेकिन जब वह कुछ देर बाद पीछे मुड़ी तो वृद्ध महिला वहां नहीं थी। वह जैसे हवा में विलीन हो गई थी। जनाबाई हैरान रह गई। शाम को जब उसने यह घटना संत नामदेव को बताई तो वे मुस्कुराने लगे। उन्होंने कहा, "पगली, जिसे तू वृद्धा समझ रही थी, वो स्वयं तेरे विट्ठल थे। तेरी सेवा में कमी न आए इसलिए भगवान स्वयं तेरे काम में हाथ बंटाने आए थे।"

यह सुनकर जनाबाई की आंखों से आंसू बह निकले। उस दिन उसे समझ आ गया कि सच्ची भक्ति भगवान को भी भक्त का सेवक बना देती है। उसके बाद से उसका विश्वास और भी मजबूत हो गया। वह हर काम में भगवान को अपने साथ महसूस करने लगी।

लेकिन जहां भक्ति होती है, वहां परीक्षा भी अवश्य आती है। एक दिन पंढरपुर मंदिर में हड़कंप मच गया। भगवान विट्ठल के गले में सजा बहुमूल्य हीरों का हार अचानक गायब हो गया था। मंदिर के पुजारियों ने खोजबीन शुरू की। जांच करने पर पता चला कि हार के गायब होने से पहले गर्भगृह में केवल एक व्यक्ति गया था—जनाबाई।

बस फिर क्या था। लोगों ने उसी पर चोरी का आरोप लगा दिया। जिन लोगों ने कल तक उसकी भक्ति की प्रशंसा की थी, वही आज उसे चोर कहने लगे। किसी ने उसकी बात सुनने की कोशिश नहीं की। जनाबाई बार-बार कहती रही, "विट्ठल मेरे प्राण हैं। मैं उनके हार की चोरी क्यों करूंगी?" लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया।

मामला राजा के दरबार में पहुंचा। सभी गवाह जनाबाई के खिलाफ थे। अंततः राजा ने उसे मृत्युदंड देने का आदेश सुना दिया। पूरे नगर में खबर फैल गई कि भगवान के मंदिर से चोरी करने वाली दासी को सूली पर चढ़ाया जाएगा। लोग तमाशा देखने के लिए इकट्ठा होने लगे।

जब जनाबाई को सूली के पास लाया गया तो उसके चेहरे पर भय नहीं था। उसने आंखें बंद कीं और केवल इतना कहा, "हे विट्ठल, यदि मैं निर्दोष हूं तो मेरी लाज अब आपके हाथ में है।" सैनिकों ने जैसे ही उसे सूली पर चढ़ाने की कोशिश की, अचानक एक अद्भुत चमत्कार हुआ।

वह मजबूत लकड़ी की सूली मोम की तरह पिघलने लगी। कुछ ही क्षणों में पूरी सूली जमीन पर ढह गई। वहां उपस्थित हजारों लोग स्तब्ध रह गए। किसी को समझ नहीं आया कि यह क्या हुआ। तभी भीड़ में से किसी ने जोर से पुकारा, "यह भगवान विट्ठल का चमत्कार है। उन्होंने अपनी भक्त की रक्षा की है।"

कुछ ही देर बाद मंदिर के एक कोने से वही बहुमूल्य हार बरामद हो गया। अब सबको अपनी भूल का एहसास हुआ। लोग जनाबाई के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे। राजा स्वयं उसके सामने आए और हाथ जोड़कर बोले, "मां, हमें क्षमा कर दो। हमने एक सच्ची भक्त का अपमान किया है।"

जनाबाई की आंखों में आंसू थे लेकिन उसके मन में किसी के लिए क्रोध नहीं था। उसने हाथ जोड़कर केवल भगवान विट्ठल को प्रणाम किया और बोली, "प्रभु, आज आपने इस दासी की लाज रख ली।"

उस दिन पूरे पंढरपुर ने देखा कि भगवान केवल मंदिरों में नहीं रहते। वे अपने भक्तों के हृदय में बसते हैं। और जब भक्त का प्रेम सच्चा होता है, तब त्रिलोक के स्वामी भी उसके लिए कपड़े धोते हैं, चक्की पीसते हैं और आवश्यकता पड़ने पर पूरी दुनिया के सामने उसकी रक्षा करने के लिए स्वयं प्रकट हो जाते हैं।

संत जनाबाई की यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान को धन, पद या आडंबर नहीं चाहिए। उन्हें केवल निष्कपट प्रेम और सच्ची भक्ति चाहिए। जहां ऐसा प्रेम होता है, वहां भगवान स्वयं अपने भक्त के सेवक बन जाते हैं।

जय श्री विट्ठल। जय पांडुरंग। 🙏

जरा कल्पना कीजिए... यदि पूरी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से कोई पूछ बैठे कि "आप कौन हैं?" तो उनके मन पर क्या बीतेगी? जिस...
04/06/2026

जरा कल्पना कीजिए... यदि पूरी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से कोई पूछ बैठे कि "आप कौन हैं?" तो उनके मन पर क्या बीतेगी? जिस देवता के एक दिन में युगों का समय बीत जाता है, जिसकी रचना में असंख्य लोक और प्राणी बसते हैं, यदि उसी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग जाए तो उसका अहंकार किस तरह चूर-चूर होगा? द्वारका में एक समय ठीक ऐसा ही हुआ था। यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की ऐसी दिव्य लीला थी जिसने ब्रह्मांडों के उस रहस्य को उजागर किया जिसे आज आधुनिक विज्ञान मल्टीवर्स या मल्टी यूनिवर्स कहकर समझने की कोशिश करता है। यह कथा केवल ब्रह्मा जी के अहंकार के टूटने की नहीं, बल्कि उस अनंत सत्य की है जो बताता है कि ईश्वर की सृष्टि हमारी कल्पना से भी कहीं अधिक विशाल और असीम है।

एक समय की बात है। ब्रह्मा जी अपने ब्रह्मलोक में विराजमान थे। उन्होंने असंख्य जीवों, ग्रहों, नक्षत्रों और लोकों की रचना की थी। युगों से वे सृष्टि संचालन का कार्य कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके मन में एक सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगा। यह अहंकार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इतना अवश्य था कि उन्हें लगने लगा कि इस विशाल सृष्टि में उनके समान कोई दूसरा नहीं है। वे स्वयं को एकमात्र ब्रह्मा और संपूर्ण सृष्टि का अकेला रचयिता समझने लगे। तभी उनके मन में विचार आया कि क्यों न स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के पास जाकर अपने स्थान और महत्व की पुष्टि की जाए। यह सोचकर वे तुरंत द्वारका नगरी की ओर प्रस्थान कर गए।

जब ब्रह्मा जी द्वारका पहुंचे तो वहां के वैभव को देखकर भी आश्चर्यचकित रह गए। सोने से सजे महल, चमकते हुए प्रांगण, दिव्य सुगंध और हर ओर गूंजता हुआ श्रीकृष्ण का नाम। वे सीधे राजमहल के द्वार पर पहुंचे और द्वारपाल से बोले, "जाओ, भगवान श्रीकृष्ण से कहो कि ब्रह्मा उनसे मिलने आए हैं।" द्वारपाल ने जाकर श्रीकृष्ण को संदेश सुनाया। लेकिन भीतर से जो उत्तर आया, उसे सुनकर स्वयं ब्रह्मा जी भी स्तब्ध रह गए। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए केवल एक प्रश्न पूछा, "कौन से ब्रह्मा आए हैं?"

यह सुनते ही ब्रह्मा जी के मन में हलचल मच गई। उन्होंने सोचा शायद द्वारपाल ने संदेश ठीक से नहीं पहुंचाया होगा। उन्होंने फिर कहा, "जाकर कहो कि चार मुखों वाले ब्रह्मा आए हैं, जो इस ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता हैं।" द्वारपाल ने फिर वही संदेश भीतर पहुंचाया। इस बार श्रीकृष्ण ने उन्हें अंदर आने की अनुमति दे दी। लेकिन जैसे ही ब्रह्मा जी राजसभा में प्रवेश किए, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके सामने जो दृश्य था, उसे देखकर उनका समस्त अहंकार एक ही क्षण में बिखरने वाला था।

सभा में केवल वे अकेले ब्रह्मा नहीं थे। वहां असंख्य ब्रह्मा उपस्थित थे। किसी के दस मुख थे, किसी के सौ मुख। किसी के एक हजार मुख थे तो किसी के लाखों मुख। कुछ ब्रह्मा इतने विशाल थे कि उनकी दिव्य आभा पूरी सभा को प्रकाशित कर रही थी। हर ब्रह्मा अपने-अपने ब्रह्मांड का स्वामी था। सभी भगवान श्रीकृष्ण के सामने नतमस्तक खड़े थे। यह दृश्य देखकर चार मुखों वाले ब्रह्मा जी के शरीर में कंपन होने लगा। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि जिस पद पर उन्हें इतना गर्व था, वह तो अनंत ब्रह्मांडों में से केवल एक छोटे से ब्रह्मांड का दायित्व मात्र है।

ब्रह्मा जी का सिर झुक गया। उनके भीतर का सारा अहंकार पलभर में समाप्त हो गया। कांपते हुए स्वर में उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, "प्रभु, यह कैसी लीला है? मैं तो स्वयं को संपूर्ण सृष्टि का एकमात्र ब्रह्मा समझता था।" श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उनके चेहरे पर करुणा और ज्ञान की दिव्य आभा थी। उन्होंने कहा, "ब्रह्मा, यह सृष्टि उतनी छोटी नहीं है जितनी तुम समझते हो। अनंत ब्रह्मांड हैं और प्रत्येक ब्रह्मांड का अपना एक ब्रह्मा है। तुम उनमें से केवल एक हो।"

फिर श्रीकृष्ण ने वह महान रहस्य बताया जिसे सुनकर ब्रह्मा जी की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। भगवान बोले, "मेरे स्वरूप भी अनेक स्तरों पर कार्य करते हैं। महाविष्णु वह स्वरूप हैं जिनकी एक श्वास से असंख्य ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं और एक श्वास के साथ ही विलीन हो जाते हैं। उन प्रत्येक ब्रह्मांड में गर्भोदकशायी विष्णु प्रवेश करते हैं और वहीं से एक-एक ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है। फिर क्षीरोदकशायी विष्णु प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा बनकर निवास करते हैं। इसलिए मैं केवल एक लोक में नहीं, हर ब्रह्मांड, हर जीव और हर कण में उपस्थित हूं।"

श्रीकृष्ण के मुख से यह दिव्य ज्ञान सुनकर ब्रह्मा जी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्हें पहली बार समझ आया कि ईश्वर की महिमा का कोई अंत नहीं है। जो स्वयं को महान समझता है, वह वास्तव में ईश्वर की अनंत लीला का एक छोटा सा अंश मात्र है। वे तुरंत श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और बोले, "प्रभु, मुझे क्षमा करें। मैं अपने पद और अपनी शक्ति पर गर्व करने लगा था। आज आपने मुझे मेरा वास्तविक स्थान दिखा दिया।"

भगवान श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक उन्हें उठाया और कहा, "ब्रह्मा, ज्ञान वहीं जन्म लेता है जहां अहंकार समाप्त होता है। जब तक मनुष्य स्वयं को सबसे बड़ा समझता है, तब तक वह सत्य से दूर रहता है। लेकिन जिस दिन उसका अहंकार टूट जाता है, उसी दिन उसके भीतर वास्तविक ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है।"

उस दिन द्वारका की उस दिव्य सभा में केवल ब्रह्मा जी का अहंकार नहीं टूटा था, बल्कि संसार के लिए एक महान संदेश भी प्रकट हुआ था। यह संदेश था कि ईश्वर की सृष्टि अनंत है, उनकी शक्ति असीम है और उनके सामने सबसे महान व्यक्ति भी एक छोटा सा अंश मात्र है। यही सनातन धर्म का वह गहरा रहस्य है जो हमें सिखाता है कि ब्रह्मांड कितना भी विशाल क्यों न हो, उसके पीछे एक ही परम सत्य कार्य कर रहा है और वह सत्य है भगवान की अनंत लीला। जय श्री कृष्ण। 🙏🚩

*✨ 📖 शिवशक्ति संवाद 🌸🔱* > रूप-रंग का अहंकार और आंतरिक सुंदरता 🕉️ *माता गौरी ने पूछा—* "नाथ! संसार में लोग अपने सुंदर रूप...
04/06/2026

*✨ 📖 शिवशक्ति संवाद 🌸🔱*

> रूप-रंग का अहंकार और आंतरिक सुंदरता 🕉️

*माता गौरी ने पूछा—* "नाथ! संसार में लोग अपने सुंदर रूप, धन-दौलत और ऊँचे पद के अहंकार में इतने अंधे हो जाते हैं कि वे साधारण लोगों को तुच्छ समझने लगते हैं। इस झूठे अहंकार का अंत क्या है? 😟👑"

*प्रभु शंभू मुस्कुराए और बोले—* "देवी! यह शरीर मिट्टी का पुतला है, जो एक दिन मिट्टी में ही मिल जाएगा। वस्त्रों और आभूषणों से केवल बाहरी काया को सजाया जा सकता है, अंतर्मन को नहीं। मनुष्य भूल जाता है कि श्मशान में राजा और रंक दोनों की भस्म एक जैसी ही होती है। जो दूसरों को कमतर आंकता है, वह वास्तव में मुझसे दूर हो जाता है।" 🔱💕
> ✨बाहरी दिखावे और घमंड से दूर रहिये। असली सुंदरता चेहरे में नहीं, आपके साफ़ चरित्र और पवित्र विचारों में होती है। जिसके मन में सबके लिए प्रेम और करुणा है, वही महादेव का सबसे प्रिय भक्त है। 🌿🙌

*🔱🌸|| हर हर महादेव | जय शिवशक्ति ||🌸🔱*

Sanwar TA Vlogs
04/06/2026

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Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Pradeep Kumar M***a, Govind Shakya, Rajendra Kumar, Shera...
03/06/2026

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Pradeep Kumar M***a, Govind Shakya, Rajendra Kumar, Shera Yadav, Khan Sohail

Good night everyone 🥱🥱🥱
31/05/2026

Good night everyone 🥱🥱🥱

31/05/2026

ताजी-ताजी वीडियो डाल रहा हूं बारिश की शुरू हो गई है बारिश कुरावली में किस-किस के यहां पर हो रही है कमेंट में जरूर बताएं🙏🙏

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31/05/2026

मौसम विभाग का अलर्ट मैसेज किसके किसके पास आया है कमेंट में जरूर बताएं और वीडियो को ज्यादा ज्यादा शेयर कर दें 🙏🙏

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