Shintu yadav

Shintu yadav जहां हंसी है, वहीं Shintu है 😆🎬 Comedy • Fun • Real Life

ज़हर सिर्फ खाने में नहीं होता... कुछ ज़हर लोगों की बातों में भी होता है।पेट में गया ज़हर सिर्फ इंसान को नुकसान पहुँचाता ...
31/07/2026

ज़हर सिर्फ खाने में नहीं होता... कुछ ज़हर लोगों की बातों में भी होता है।
पेट में गया ज़हर सिर्फ इंसान को नुकसान पहुँचाता है, लेकिन कानों में भरा गया ज़हर कई रिश्तों को हमेशा के लिए तोड़ देता है।
इसलिए हर सुनी-सुनाई बात पर भरोसा करने से पहले सच ज़रूर जानें। 🙏❤️
आपकी क्या राय है? कमेंट में ज़रूर बताइए। 👇

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आज का वातावरण आप सब देख रहे हैं, कि बहुत अधिक बिगड़ गया है। *"माता-पिता प्रायः बच्चों पर ध्यान नहीं दे रहे। वे अपना पैसा...
06/06/2026

आज का वातावरण आप सब देख रहे हैं, कि बहुत अधिक बिगड़ गया है। *"माता-पिता प्रायः बच्चों पर ध्यान नहीं दे रहे। वे अपना पैसा कमाने खाने पीने पार्टी डांस आदि में उलझे हुए हैं। अतः अपने बच्चों पर ध्यान न देने के कारण, उनके बच्चे बिगड़ रहे हैं। जब भी माता-पिता को थोड़ा बहुत समय मिलता है, तो बच्चों की बिगड़ी हुई स्थिति को देखकर वे उन्हें उपदेश देने लगते हैं, कि बेटा ऐसा मत करो, और ऐसा करो।"*
यद्यपि माता-पिता का उपदेश तो ठीक ही होता है। *"परंतु जिस समय वह उपदेश देना चाहिए और उस उपदेश के अनुसार माता-पिता को स्वयं वैसा आचरण करके दिखाना चाहिए, वह समय तो निकल गया। उसके बाद उन्हें सिखाने से कोई विशेष लाभ नहीं होता।"*
*"बच्चों को सिखाने की उम्र होती है, 2/3 वर्ष की आयु से लेकर 12/13 वर्ष की आयु तक।" "यदि इस समय सीमा के अंतर्गत कोई माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देवें। और जो कुछ बातें वे अपने बच्चों को उपदेश के रूप में कहते हैं, वैसा आचरण भी माता-पिता स्वयं करके दिखाएं, तब तो बच्चों को बढ़िया संस्कार मिलते हैं, और जीवन भर उनका प्रभाव बच्चों पर रहता है। बच्चे उन संस्कारों से प्रभावित होकर आजीवन अच्छे काम करते हैं। तब माता-पिता और बच्चे दोनों का जीवन सफल हो जाता है।"*
परंतु उपदेश और आचरण सिखाने का समय निकल जाने के बाद फिर कोई विशेष लाभ नहीं होता। *"फिर बच्चों पर प्रभाव नहीं पड़ता और बच्चे, माता-पिता के उपदेश को एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। जब बच्चों में ऐसी स्थिति पाई जाए, तो समझ लीजिएगा कि अब आपके बच्चे बिगड़ रहे हैं। अतः बच्चों को बिगाड़ से बचाने के लिए माता-पिता को स्वयं सावधान होकर तपस्वी जीवन जीना होगा।"*
*"गृहस्थ आश्रम एक तपस्या का आश्रम है। जो माता-पिता इस आश्रम में तपस्या करते हैं और स्वयं उत्तम आचरण करके बच्चों के सामने अपना ही उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उन्हीं के बच्चे अच्छे बनते हैं। संस्कारी ईमानदार बुद्धिमान देशभक्त चरित्रवान और ईश्वर भक्त बनते हैं।"*
आप भी इन बातों पर विचार करें और अपने जीवन में इनसे लाभ उठाएं। *"यदि आपकी आयु बड़ी हो गई, बच्चे भी आपके 25/30 वर्ष की आयु के हो गए, तो ये बातें उन युवा पीढ़ी वालों को बताएं, जिनके बच्चे अभी छोटे हैं। दो-चार वर्ष की आयु के हैं। वे लोग इन बातों से लाभ उठाकर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें। इससे उन युवा पीढ़ी वालों का और उनके बच्चों का, दोनों का जीवन सफल हो जाएगा।"*

जब किसी के साथ छोटा-मोटा अन्याय होता है, तो पहले वह उसे सहन कर लेता है। *"फिर और अन्याय होने पर वह अन्यायकारी को सूचित क...
06/06/2026

जब किसी के साथ छोटा-मोटा अन्याय होता है, तो पहले वह उसे सहन कर लेता है। *"फिर और अन्याय होने पर वह अन्यायकारी को सूचित करता है। फिर और अन्याय होने पर वह उसको चेतावनी देता है। यदि अन्याय फिर भी न रुके, तो फिर वह बदला लेने के लिए क्रोध करता है। मन से वाणी से और कभी-कभी शरीर से मारपीट भी कर लेता है। इसे बदला लेना या प्रतिशोध कहते हैं।"*
कुछ समय बाद जब क्रोध करने के परिणाम सामने आते हैं, तब वह दुखी होता है, और पश्चाताप करता है कि *"मैंने क्रोध क्यों किया। उसका परिणाम तो मेरे पक्ष में नहीं आया, कोई लाभ नहीं हुआ। उल्टा हानि ही हुई। इसलिए मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए था।"* तब वह इस प्रकार से पश्चाताप करता है।
तो बुद्धिमान व्यक्ति को सोचना चाहिए, कि *"मैं ऐसी मूर्खता क्यों करूं? जिसके अंत में मुझे पश्चाताप करना पड़े।"*
तो अब इस समस्या का समाधान क्या है। समाधान यह है कि "व्यक्ति क्रोध करने से पहले ही उसके परिणाम पर विचार करे, कि *"इसमें कुल मिलाकर मुझे लाभ नहीं होगा। इसलिए मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए।" "यदि इस प्रकार का आत्म सुझाव (ऑटो सजेशन) प्रतिदिन व्यक्ति स्वयं को देवे, तो उसकी क्रोध करने की आदत धीरे-धीरे कम हो जाएगी, और एक दिन छूट जाएगी।"*
परंतु जब दूसरा व्यक्ति अन्याय करता है, तब क्रोध तो आता ही है। उसको रोकें कैसे? तब ऐसा सोचें कि *"यह व्यक्ति अज्ञानी और स्वार्थी है। अपने अज्ञान के कारण अथवा स्वार्थ के कारण मुझ पर अन्याय करता है। यदि वे अन्याय छोटे-छोटे स्तर के हों, तो ये तीन शब्द अपने मन में बोलकर वह उस अन्याय को सहन कर ले, "कोई बात नहीं।"*
*"यदि कुछ बड़ा अन्याय हो, और दूसरे व्यक्ति को अपने ऊपर अन्याय करने से रोक न पा रहा हो, तो ऐसी स्थिति में वह उसे ईश्वर के न्याय पर छोड़ दे।"* तब अपने मन में ये तीन शब्द बोले, *"ईश्वर न्याय करेगा।"* परंतु भविष्य में अपनी सुरक्षा जरूर रखे, कि *"भविष्य में यह दुष्ट व्यक्ति दोबारा मेरी हानि न कर पाए।"* इतना पुरुषार्थ उसे करना होगा।
*"जब वह उस अन्याय को ईश्वर के न्याय पर छोड़ देगा, और बार-बार उस अन्याय की घटना को याद नहीं करेगा, तब वह दुखी नहीं होगा, और क्रोध भी नहीं करेगा।" "सही समय आने पर ईश्वर उसकी हानि की पूर्ति भी कर देगा, और उस अन्यायकारी व्यक्ति को अवश्य ही दंडित भी करेगा।" "इस प्रकार से अपना चिंतन और व्यवहार बनाकर व्यक्ति क्रोध करने से बच सकता है, तथा अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। और जब वह व्यक्ति क्रोध नहीं करेगा, तब उसके मन में बहुत शांति होगी।"*
*"अतः क्रोध के परिणामों को पहले ही विचार कर व्यक्ति क्रोध करने से बचे, और ऐसी मूर्खता क्यों करें कि अंत में उसे पछताना पड़े।"*

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