Ashwanikayog

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02/02/2026

एकादशी, प्रदोष और उपवास: शरीर, चंद्रमा और चेतना का अनुभव

सनातन धर्म में यदि किसी साधना को सबसे अधिक वैज्ञानिक, सूक्ष्म और जीवनोपयोगी कहा जाए, तो वह है उपवास। विशेष रूप से महीने में दो बार आने वाली एकादशी और प्रदोष—जिन्हें परंपरा में क्रमशः भगवान विष्णु और महादेव को समर्पित माना गया—केवल धार्मिक तिथियाँ नहीं हैं, बल्कि ये मानव शरीर, मन और चेतना के गहन अध्ययन का परिणाम हैं।

मेरे अपने अनुभवों में, जैसे-जैसे मैंने योग, ध्यान और उपवास को जीवन का हिस्सा बनाया, यह स्पष्ट होता गया कि हमारे पूर्वज केवल आस्था से नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों को गहराई से समझकर चलते थे।



चंद्रमा और मानव शरीर का संबंध

चंद्रमा का प्रभाव केवल समुद्र की ज्वार-भाटा तक सीमित नहीं है। मानव शरीर का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल तत्व से बना है। पूर्णिमा और अमावस्या के आसपास चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण हमारे शरीर के जल, वायु और मन पर सीधा प्रभाव डालता है।

एकादशी की तिथि पूर्णिमा और अमावस्या से ठीक चार दिन पहले आती है। इस समय वायुमंडलीय दबाव, चंद्र आकर्षण और पाचन तंत्र के बीच एक विशेष संवेदनशीलता होती है। यदि इस दिन पेट भरा हो, तो शरीर के भीतर जल और वायु का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे बेचैनी, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी अनुभव होती है।

इसी सूक्ष्म अनुभव को समझते हुए हमारे ऋषियों ने इस दिन अन्न त्याग का नियम बनाया।



एकादशी, प्रदोष और शरीर का डिटॉक्स

एकादशी ग्यारहवीं तिथि है और प्रदोष तेरहवीं। यह समय शरीर के लिए प्राकृतिक डिटॉक्स विंडो की तरह कार्य करता है। जब हम इस दौरान भोजन नहीं करते, तो पाचन तंत्र को पूर्ण विश्राम मिलता है और शरीर अपनी आंतरिक सफाई की प्रक्रिया में प्रवेश करता है।

आधुनिक विज्ञान भी आज उसी सत्य को स्वीकार कर रहा है, जिसे सनातन परंपरा हजारों वर्षों से जानती थी।

वर्ष 2016 में जापान के वैज्ञानिक कियोशोनारी ओशुमी को चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला। उन्होंने यह सिद्ध किया कि उपवास से शरीर में ऑटोफैगी (Autophagy) की प्रक्रिया सक्रिय होती है। जब हम 12 से 24 घंटे तक कुछ नहीं खाते, तो शरीर की कोशिकाएँ स्वयं को साफ करना शुरू कर देती हैं।

खराब, निष्क्रिय और रोगग्रस्त कोशिकाएँ नष्ट होकर ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती हैं। यह प्रक्रिया कैंसर जैसी बीमारियों से बचाव, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बुढ़ापे को धीमा करने में सहायक मानी गई है।



निर्जला व्रत: तप नहीं, समझ

अक्सर लोग प्रश्न करते हैं—“एकादशी पर जल क्यों नहीं पिया जाता?”

मेरे अनुभव में, निर्जला व्रत कोई जबरदस्ती किया गया तप नहीं है, बल्कि शरीर को पूर्ण विश्राम देने की एक गहरी विधा है। जब हम बिना जल के उपवास करते हैं, तो किडनी, पाचन अंग और कोशिकीय तंत्र को पूर्ण विश्राम मिलता है।

आज जिसे हम इंटरमिटेंट फास्टिंग कह रहे हैं, वह वस्तुतः एकादशी का ही आधुनिक नाम है। अंतर केवल इतना है कि सनातन परंपरा में इसे भक्ति, संयम और आत्मशुद्धि से जोड़ा गया।

हालाँकि यह भी सत्य है कि निर्जला व्रत हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं। शरीर की स्थिति, मौसम और साधक की क्षमता को ध्यान में रखकर ही इसका पालन करना चाहिए।



एकादशी पर चावल का त्याग: विज्ञान और अनुभव

एक और प्रश्न जो अक्सर उठता है—“एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाए जाते?”

विज्ञान के अनुसार चावल में जल तत्व को सोखने की क्षमता अधिक होती है। एकादशी के दिन चंद्रमा का जल तत्व पर प्रभाव अधिक रहता है। ऐसे में चावल का सेवन शरीर में जल असंतुलन पैदा कर सकता है, जिससे पेट में भारीपन और मस्तिष्क में सुस्ती आती है।

मेरे स्वयं के अनुभव में, जब मैंने एकादशी पर चावल का त्याग किया, तो ध्यान में स्पष्टता, हल्कापन और मानसिक स्थिरता का अनुभव हुआ। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि शरीर की प्रतिक्रिया है।



धर्म, कथा और अनुशासन

हमारे पूर्वज यह भली-भांति जानते थे कि केवल तर्क से समाज नहीं चलता। जब तक किसी नियम के साथ कथा, डर या भक्ति न जोड़ी जाए, तब तक सामान्य व्यक्ति उसका पालन नहीं करता।

इसीलिए एकादशी और प्रदोष को देवताओं से जोड़ा गया—ताकि स्वास्थ्य का यह विज्ञान जन-जन तक पहुँचे।



उपवास और इच्छाशक्ति

निर्जल या अल्पाहार उपवास केवल शरीर की शुद्धि नहीं करता, यह इच्छाशक्ति को भी प्रबल करता है। जब हम अपनी भूख, प्यास और स्वाद पर नियंत्रण करते हैं, तो भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

भक्ति के साथ किया गया उपवास हमें यह सिखाता है कि हम शरीर नहीं हैं—हम उसके साक्षी हैं।



निष्कर्ष: विज्ञान से चेतना तक

एकादशी और प्रदोष कोई रूढ़ परंपरा नहीं, बल्कि शरीर, चंद्रमा और चेतना के बीच संतुलन की साधना है।

जब विज्ञान आज ऑटोफैगी, डिटॉक्स और फास्टिंग की बात करता है, तब मुझे अपने पूर्वजों की दूरदर्शिता पर गर्व होता है।

मेरे अनुभव में, जब उपवास को डर से नहीं, समझ और श्रद्धा से किया जाए—तो वह रोगों से मुक्ति ही नहीं, आत्मबोध की ओर भी ले जाता है।

यही एकादशी है। यही प्रदोष है। और यही सनातन का शाश्वत विज्ञान।

पछतावा ना हो कि एक बार मिल लेते (मेरे अनुभव, मेरी यात्रा)कुछ घटनाएँ जीवन में पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतरती हैं। वे किसी...
01/24/2026

पछतावा ना हो कि एक बार मिल लेते

(मेरे अनुभव, मेरी यात्रा)

कुछ घटनाएँ जीवन में पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतरती हैं। वे किसी कहानी की तरह नहीं लगतीं, बल्कि आईने की तरह सामने खड़ी हो जाती हैं। ऐसी ही एक घटना आज मेरे भीतर बहुत गहराई से उतर गई, जब मैं आज 24 जनवरी 2026 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित एन. रघुरामन का कॉलम ‘मैनेजमेंट फंडा’ पढ़ रहा था। यह कॉलम वह प्रतिदिन पढ़ता हूँ और अच्छा भी लगता है

कॉलम में वर्णित एक कहानी ने मुझे झकझोर कर रख दिया। एक युवा लड़का, जो कैंसर से पीड़ित था। महीनों के इलाज और घर में कैद-सी ज़िंदगी के बाद उसने बाहर निकलने का साहस किया। वह एक म्यूज़िक शॉप पर पहुँचा। वहाँ उसकी मुलाक़ात एक सुंदर-सी, सौम्य स्वभाव की लड़की से हुई। उसने उससे एक सीडी माँगी। लड़की ने सीडी को उपहार की तरह गिफ्ट-रैप कर दिया।

यह क्रम रोज़ चलने लगा। लड़का हर दिन दुकान आता, एक सीडी खरीदता, और लड़की हर बार उसे उसी स्नेह से पैक कर देती। धीरे-धीरे लड़की उस लड़के को अच्छी लगने लगी। एक दिन लड़के ने हिम्मत कर एक पर्ची पर अपना फ़ोन नंबर लिखा और सीडी के साथ दे दिया। उसे लगा, शायद लड़की ने उसका प्रस्ताव समझ लिया होगा।

पर इसके बाद वह लड़का फिर कभी दुकान नहीं आया। कई दिन बीत गए। लड़की के मन में बेचैनी बढ़ती गई। एक दिन उसने वही फ़ोन नंबर मिलाया। उधर से आवाज़ आई—लड़के की माँ की। लड़की ने पूछा, “वह कहाँ है? मैं उससे बात करना चाहती हूँ।”

माँ का उत्तर सुनते ही समय थम-सा गया
“मेरे बेटे को तो गुज़रे तीन दिन हो गए हैं… वह अब इस दुनिया में नहीं है।”

जब माँ को पूरी बात पता चली कि वह वही म्यूज़िक शॉप वाली लड़की है, जिससे बेटा रोज़ सीडी लेने जाता था, तो माँ ने अलमारी से वे सभी सीडी निकालीं। जब गिफ्ट रैप खोले गए, तो हर पैकेट के भीतर वही लिखा था—
“आप मुझे अच्छे लगते हैं। मैं आपके साथ कुछ समय बिताना चाहती हूँ।”

लड़के ने कभी वह पर्ची खोली ही नहीं थी… और अब समय भी नहीं बचा था।

इस कहानी ने मुझे भीतर तक हिला दिया। मुझे लगा—हमारी ज़िंदगी भी तो इसी तरह के ‘अनकहे प्रस्तावों’ से भरी पड़ी है। कितनी ही बातें, कितनी ही मुलाक़ातें, कितने ही क्षण हम “फिर कभी” के लिए टाल देते हैं।

यह पढ़ते-पढ़ते मेरी अपनी ज़िंदगी की कई घटनाएँ आँखों के सामने आ गईं। एक परिचित—कृष्ण शर्मा , जो किसी स्कूल में वाइस प्रिंसिपल है यहाँ मैंने प्रिंसिपल के रूप में कार्य किया था उनके पिता काफ़ी समय से भी बिमारथे। उनके पिता से मिलने का मेरा मन कई दिनों से था। रोज़ सोचता—आज नहीं, कल मिलूँगा। व्यस्तता, टालमटोल… और फिर एक दिन समाचार आया कि उनका देहांत हो गया। भीतर कहीं एक टीस रह गई—काश, मैं समय रहते मिल पाया होता।

एक और घटना मेरे जीवन की है। मेरे साढ़ू—जो उम्र और स्नेह में बड़े भाई समान थे। वे हिसार में रहते थे वे अस्वस्थ थे। मैंने पत्नी से कहा—चलो, उनसे मिल आते हैं। मन में यह स्पष्ट था कि ‘बाद में’ का भरोसा नहीं करना चाहिए। हम उनसे मिले, उनके साथ कुछ समय बिताया, हालचाल पूछा और लौट आए। अगली ही सुबह संदेश मिला—उनका देहांत हो गया।

उस दिन मुझे दुःख तो हुआ, पर पछतावा नहीं था। मन शांत था कि जो करना था, समय रहते कर लिया।

यहीं से जीवन का एक बड़ा सत्य मेरे सामने स्पष्ट हुआ—
पछतावा मृत्यु से नहीं, अधूरेपन से जन्म लेता है।

ज़िंदगी हमें रोज़ अवसर देती है—किसी से मिलने का, किसी से बात करने का, कुछ कहने का, कुछ सुधारने का। पर हम सोचते हैं—अभी समय है। जबकि सच यह है कि समय हमारे हाथ में नहीं है।

यदि किसी से मिलने का मन हो—मिल लीजिए।
यदि किसी से कुछ कहना हो—कह दीजिए।
यदि कोई उलझन हो—आज ही सुलझा लीजिए।

क्योंकि जीवन का सबसे भारी बोझ वे शब्द होते हैं—
“काश उस दिन…”

मेरी यह यात्रा मुझे यही सिखाती है कि अध्यात्म केवल ध्यान और साधना नहीं है। अध्यात्म है—जीवन को टालना नहीं, जी लेना। जो सामने है, जो संभव है, उसे अभी कर लेना।

शायद यही जीवन की सबसे सच्ची साधना है।
आचार्य अश्वनी शर्मा

01/24/2026

डायबिटीज में अपने खानपान का खास ख्याल रखना जरूरी होता है. अगर सही चीजें ना खाई जाएं तो ब्लड शुगर जरूरत से ज्यादा गिर सकती है या एकदम से बढ़ सकती है. ब्लड शुगर स्पाइक (Blood Sugar Spike) होने की संभावना आमतौर पर ज्यादा रहती है और इससे तबीयत बिगड़ जाती है.

ऐसे में डायबिटीज के मरीज को मधुमेह के अनुकूल ही भोजन करना होता है. मरीज का आहार संतुलित, सुसंगत और शुगर संबंधी समस्याओं से निजात दिलाने वाला होना चाहिए. इसी बारे में बताते हुए न्यूट्रिशनिस्ट ने बताया है कि डायबिटीज के मरीजों को कौन सी 12 चीजें अपनी डाइट में जरूर शामिल करनी चाहिए. आप भी जानिए कौन से हैं ये हेल्दी फूड्स.

डायबिटीज के मरीज को जरूर खानी चाहिए ये चीजें

मूंग की दाल - इस दाल में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है और यह प्रोटीन और फाइबर की अच्छी स्त्रोत है.

अलसी के बीज - हाई ब्लड शुगर (High Blood Sugar) में अलसी के बीज खाने पर यह ब्लड शुगर कम करने में असरदार है. यह फाइबर से भरपूर और ओमेगा-3 फैटी एसिड का एक अच्छा स्त्रोत है.
ज्वार - हाई फाइबर वाला ज्वार ग्लूकोज रिलीज को कम करता है. इससे ब्लड शुगर स्पाइक नहीं होता है.

दालचीनी - इंसुलिन सेंसिटिविटी को बेहतर बनाने में दालचीनी का असर दिखता है. दालचीनी से लिपिड प्रोफाइल भी बेहतर होती है.

काली मिर्च - एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर काली मिर्च ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को भी कम करती है. इसे खाने पर शरीर को एंटी-ऑक्सीडेंट्स भी मिलते हैं.

सूखा अदरक - सूखे अदरक (Dry Ginger) के सेवन से ब्लड शुगर रेग्यूलेट होती है. इससे इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम होता है.

हल्दी - हल्दी खाने पर ब्लड शुगर कंट्रोल होने में मदद मिलती है. इससे शरीर को एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण मिलते हैं और वेट मैनेजमेंट में भी सहायता मिलती है.
आंवला - विटामिन सी से भरपूर आंवला फाइबर से भरपूर होता है. इसे खाने पर ब्लड शुगर रेग्यूलेट होता है, इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है और यह दिल की सेहत को भी दुरुस्त रखता है.

करी पत्ते - डायबिटीज मैनेज करने के लिए करी पत्ते (Curry Leaves) खाए जा सकते हैं. करी पत्ते फाइबर से भरपूर होते हैं, इनमें एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं और ये इंसुलिन एक्टिविटी को बेहतर करते हैं.

अनार - लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला यह फल एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भी भरपूर होता है और दिल की सेहत को दुरुस्त रखने में भी मददगार है. इसे डायबिटीज के मरीज खा सकते हैं.

नारियल पानी - डायबिटीज में नारियल पानी पीना फायदेमंद हो सकता है. यह लो कैलोरी वाला शुगर फ्री बेवरेज है जिससे वेट मैनेजमेंट में भी मदद मिलती है.

बिलवा फल - यह ब्लड शुगर रेग्यूलेशन में मददगार हो सकता है. इसका लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है और यह इंसुलिन को भी फायदे देता है.

न्यूट्रिशनिस्ट के अनुसार, इन चीजों को खानपान का हिस्सा बना लिया जाए तो डायबिटीज कंट्रोल करने में मदद मिलेगी और शुगर पेशेंट्स की सेहत दुरुस्त रहेगी सो अलग. यह पोस्ट सामान्य जानकारी के लिए है अमल करने से पहले किसी विशेषज्ञ से सलाह लें

01/23/2026

बबासीर के लिए
नारियल की जटा लीजिए। उसे माचिस से जला दीजिए। जलकर भस्म बन जाएगी। इस भस्म को शीशी में भर कर ऱख लीजिए। कप डेढ़ कप छाछ या दही के साथ नारियल की जटा से बनी भस्म तीन ग्राम खाली पेट दिन में तीन बार सिर्फ एक ही दिन लेनी है। ध्यान रहे दही या छाछ ताजी हो खट्टी न हो। कैसी और कितनी ही पुरानी पाइल्स की बीमारी क्यों न हो, एक दिन में ही ठीक हो जाती है।

यह नुस्खा किसी भी प्रकार के रक्तस्राव को रोकने में कारगर है। महिलाओं के मासिक धर्म में अधिक रक्तस्राव या श्वेत प्रदर की बीमारी में भी कारगर है। हैजा, वमन या हिचकी रोग में यह भस्म एक घूँट पानी के साथ लेनी चाहिए। ऐसे कितने ही नुस्खे हिन्दुस्तान के मंदिरों और मठों में साधु संन्यासियों द्वारा आजमाए हुए हैं। इन पर शोध किया जाना चाहिए।

दवा लेने के एक घंटा पहले और एक घंटा बाद तक कुछ न खाएं तो चलेगा। अगर रोग ज्यादा जीर्ण हो और एक दिन दवा लेने से लाभ न हो तो दो या तीन दिन लेकर देखिए।

हम आपके लिए भारत के कोने कोने से आयुर्वेद के अनसुने चमत्कार ले कर आते हैं, आप भी इनको शेयर कर के ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहुंचाए ।

विशेष

1. बवासीर से बचने के लिए गुदा को गर्म पानी से न धोएं। खासकर जब तेज गर्मियों के मौसम में छत की टंकियों व नलों से बहुत गर्म पानी आता है तब गुदा को उस गर्म पानी से धोने से बचना चाहिए।

2. एक बार बवासीर ठीक हो जाने के बाद बदपरहेजी ( जैसे अत्यधिक मिर्च-मसाले, गरिष्ठ और उत्तेजक पदार्थो का सेवन ) के कारण उसके दुबारा होने की संभावना रहती है। अत: बवासीर के रोगी के लिए बदपरहेजी से बचना परम आवश्यक है।

01/21/2026

भ्रूमध्य की गुदगुदी और भीतर खुलता द्वार

(मेरे अनुभव मेरी यात्रा)

यह प्रश्न मुझसे कई बार पूछा गया है, और कई बार यह प्रश्न मैंने खुद से भी किया है—

“जब मैं आज्ञा चक्र पर ध्यान करता हूँ तो दोनों आँखों के बीच गुदगुदी क्यों होती है?

और कभी-कभी तो ध्यान में बैठे बिना ही यह अनुभूति क्यों होने लगती है?”

सच कहूँ तो, शुरुआत में मैं भी इसे समझ नहीं पाया।

पहली अनुभूति और मन का संशय

जब मैंने ध्यान में बैठना शुरू किया,

तो ध्यान किसी विशेष चक्र पर नहीं था।

बस श्वास को देखना,

मन को शांत करना—

यही साधना थी।

लेकिन कुछ समय बाद

ध्यान के दौरान

दोनों आँखों के बीच

एक हल्की-सी गुदगुदी होने लगी।

कभी ऐसा लगता जैसे

कोई भीतर से हल्का-सा छू रहा हो,

कभी हल्का दबाव,

कभी कंपन।

मन तुरंत सवाल करता—

“क्या यह आज्ञा चक्र का जागरण है?”

“क्या मैं किसी विशेष अवस्था की ओर बढ़ रहा हूँ?”

जब ध्यान से बाहर भी अनुभव होने लगे

धीरे-धीरे एक और बात होने लगी—

कभी-कभी मैं ध्यान में बैठा भी नहीं होता,

फिर भी वही गुदगुदी, वही स्पंदन

अपने आप होने लगता।

यहीं से मेरी जिज्ञासा और गहरी हुई।

मैंने खुद को रोका—

किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले

अपने जीवन को देखने का निर्णय लिया।

जीवन में आए बदलाव और साधना की दिशा

जब मैंने पीछे मुड़कर देखा,

तो पाया कि यह सब यूँ ही नहीं हो रहा था।

मैंने—

अपने जीवन को अधिक अनुशासित किया
अनावश्यक इच्छाओं को ढीला छोड़ा
क्षमा को व्यवहार में उतारा
पाखंड से दूरी बनाई
और सबसे महत्वपूर्ण—

मैंने मन से लड़ना छोड़ दिया।

शायद ध्यान अब

सिर्फ आसन पर बैठने की क्रिया नहीं रहा था,

बल्कि जीवन की अवस्था बनने लगा था।

क्या यह आज्ञा चक्र का जागरण है?

यहाँ मैंने स्वयं को

बहुत सावधानी से रोका।

मैंने यह मानने से इनकार किया कि—

“मेरा आज्ञा चक्र जागृत हो गया है।”

क्योंकि मैंने एक बात स्पष्ट समझ ली थी—

आज्ञा चक्र कोई स्विच नहीं है,

जिसे ऑन या ऑफ किया जा सके।

यह कोई उपलब्धि नहीं,

बल्कि धीरे-धीरे खुलने वाली समझ है।

जो हो रहा था,

वह शायद जागरण नहीं,

बल्कि संवेदनशीलता का बढ़ना था।

अनुभूतियों से अधिक जीवन का परिवर्तन

मैंने खुद से यह प्रश्न किया—

क्या अब मैं पहले से कम प्रतिक्रिया करता हूँ?
क्या क्रोध जल्दी शांत हो जाता है?
क्या दूसरों को समझने की क्षमता बढ़ी है?
क्या भीतर एक मौन रहने लगा है?
इन प्रश्नों के उत्तर

मेरे लिए अधिक महत्वपूर्ण थे

बजाय किसी अनुभूति के।

और उत्तर धीरे-धीरे

हाँ में बदलने लगे।

आज की मेरी समझ

आज जब भ्रूमध्य में गुदगुदी होती है,

तो मैं न उत्साहित होता हूँ,

न डरता हूँ।

मैं बस उसे

देखता हूँ।

अब मुझे यह समझ आ गया है कि—

अनुभूतियाँ रास्ते में आती हैं,

पर रास्ता नहीं होतीं।

यदि हम उनसे चिपक जाएँ,

तो वही साधना में बाधा बन जाती हैं।

अध्याय का सार

आज्ञा चक्र को पाने की इच्छा

जब ढीली पड़ती है,

तब उसकी दिशा खुलने लगती है।

जो भीतर हो रहा है,

उसे देखने वाला भाव ही

सच्ची साधना है।

अंतिम पंक्तियाँ

मैं यह दावा नहीं करता कि

मैं किसी मंज़िल पर पहुँच गया हूँ।

मैं बस इतना जानता हूँ—

मैं सही दिशा में चल रहा हूँ।

और शायद

यही जान लेना

सबसे बड़ा जागरण है।

सावधानी संदेश

साधना के मार्ग पर चलते हुए

कुछ अनुभव अपने आप आने लगते हैं—

कभी प्रकाश,

कभी ध्वनि,

कभी शरीर में कंपन,

तो कभी भ्रूमध्य में गुदगुदी।

इन अनुभवों से डरना नहीं है,

पर उनसे मोह भी नहीं करना है।

याद रखें—

अनुभव संकेत होते हैं, मंज़िल नहीं
अनुभूति आती-जाती है, सत्य नहीं बदलता
जो दिखता है, वह क्षणिक है
जो देख रहा है, वही स्थायी है
अनुभवों को पाना

यदि साधना का उद्देश्य बन गया,

तो वही साधना का सबसे बड़ा व्यवधान बन जाते हैं।

इसलिए—

अपने अनुभवों की तुलना किसी और से न करें
उन्हें सिद्धि समझकर प्रचार न करें
न ही किसी को प्रभावित करने का साधन बनाएं
साधना दिखाने की नहीं,

जीने की प्रक्रिया है।

यदि जीवन में—

करुणा बढ़ रही है
प्रतिक्रिया घट रही है
सरलता आ रही है
और भीतर मौन गहराने लगा है
तो समझिए आप सही दिशा में हैं,

भले ही कोई अनुभव न भी हो।

और यदि अनुभव बहुत हों

पर व्यवहार में कठोरता बनी रहे,

तो समझिए कहीं न कहीं

अहं साधना में प्रवेश कर गया है।

सबसे बड़ी सावधानी यही है—

अनुभवों से ऊपर उठकर

विवेक को थामे रखना।

शेष सब

अपने समय पर

स्वतः घटित होता है।
आचार्य अश्वनी शर्मा

12/21/2025

Manifestation: सच या भ्रम?

संक्षिप्त उत्तर

Manifestation अपने-आप में कोई जादू नहीं है,

लेकिन सही समझ के साथ यह काम करता है।

गलत समझ के साथ यह भ्रम भी बन सकता है।

लोग क्यों कहते हैं “Manifestation काम करता है”?

क्योंकि जब आपकिसी लक्ष्य पर स्पष्ट ध्यान रखते हैंअपने विचार, भाव और कर्म को एक दिशा में लाते हैंभीतर यह मान लेते हैं कि “यह संभव है”

तो आप अनजाने मेंमौके पहचानने लगते हैंसही निर्णय लेने लगते हैंआलस्य और डर से बाहर आते हैं

परिणाम कर्म से आता है,

लेकिन दिशा विचार देता है।

(Manifestation का मेरा अनुभव)

बहुत समय तक मैं भी यह सोचता रहा कि Manifestation शायद केवल कल्पना है—मन की उड़ान, जिसे लोग आध्यात्मिक शब्दों में सजाकर प्रस्तुत करते हैं। परंतु साधना करते-करते, ध्यान में बैठते-बैठते और जीवन को नज़दीक से देखते-देखते मुझे यह समझ आने लगी कि संकल्प अगर शुद्ध हो, तो वह धीरे-धीरे मार्ग बनाता है।

एक दिन ध्यान के बाद सहज भाव से मैंने कुबेर मुद्रा लगाई।

न कोई बड़ा मंत्र, न कोई दिखावटी इच्छा।

बस मन में एक भाव उभरा—

“यदि मेरा यूट्यूब चैनल चल पड़े तो इस से प्राप्त आय को मैं अपने ऊपर नहीं खर्चूँगा और न ही योग को एक व्यापार का साधन बनाऊँगा, सरकारी नौकरी करने के साथ साथ मैं पिछले 40 वर्षों से लोगों को मुफ़्त में योग करवा रहा हूँ और कर रहा हूँ ।सरकारी नौकरी और प्राइवेट नौकरी से प्राचार्य पद से रिटायर होने के बाद मैंने संकल्प लिया कि अब तो योग ही सेवा है मुझे 11 साल हो गए हैं रिटायर हुए और ये योग शिक्षा अब भी अनुव्रत चल रही है

मैंने योग को व्यापार नहीं बनाया और न ही योग को व्यापार बनाऊँगा। मेरा सपना है कि मैं

एक नि:शुल्क योग केंद्र स्थापित करूँगा

और गरीब, मेधावी बच्चों के लिए एक ऐसा विद्यालय,

जहाँ शिक्षा बोझ नहीं, प्रकाश हो।”

यह कोई एक पल की इच्छा नहीं थी।

यह वर्षों की साधना, अनुभव और जीवन की पीड़ा से उपजा सेवा-संकल्प था।

कुबेर मुद्रा ने क्या किया?

कुबेर मुद्रा ने मुझे धन का सपना नहीं दिखाया,

उसने मुझे दिशा दी।

जब अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा आपस में मिलते हैं,

तो जैसे भीतर तीन शक्तियाँ एक साथ खड़ी हो जाती हैं—

संकल्प
विचार
ऊर्जा
मैंने अनुभव किया कि मेरा मन अब बिखरा नहीं था।

मेरी सोच “कैसे होगा?” से निकलकर

“मुझे क्या करना है?” पर आ गई।

क्या यही Manifestation है?

हाँ।

लेकिन यह वह Manifestation नहीं है जिसमें व्यक्ति आँख बंद कर ब्रह्मांड से माँगता है।

यह वह Manifestation है जिसमें—

कर्म पीछे नहीं हटता
सेवा उद्देश्य बनती है
और धन साधन बनता है, लक्ष्य नहीं
यूट्यूब मेरे लिए साधन बना।

एक माध्यम—जहाँ से योग, अनुभव और सच्ची बात लोगों तक पहुँचे।

कमाई उसका परिणाम है, उद्देश्य नहीं।

सेवा का संकल्प क्यों जुड़ा?

क्योंकि मैंने जीवन में यह देखा है कि—

“जिस ज्ञान से केवल पेट भरे, वह अपूर्ण है।

और जो ज्ञान दूसरों को उठाए, वही साधना है।”

मेरा मन बार-बार वहीं लौट आता है—

नि:शुल्क योग,

नि:शुल्क शिक्षा,

और ऐसे बच्चे जिनकी आँखों में प्रतिभा है

पर साधन नहीं।

कुबेर मुद्रा ने मुझे क्या सिखाया?

उसने यह नहीं कहा कि “सब मिल जाएगा”

उसने चुपचाप कहा—

“जो तुम चाहते हो,

पहले उसके योग्य बनो।”

अनुशासन बढ़ा।

नियमितता आई।

भाषा में सादगी आई।

और भीतर यह भाव मजबूत हुआ कि

अगर यह कार्य परमात्मा की इच्छा के विपरीत नहीं है,

तो मार्ग अपने आप खुलेंगे।

आज मैं क्या मानता हूँ?

आज मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ—

Manifestation कोई भ्रम नहीं
लेकिन यह बाज़ारू नुस्खा भी नहीं
यह संकल्प + साधना + सेवा + कर्म का संगम है।

अंत में

“कुबेर मुद्रा से मैंने धन नहीं माँगा,

मैंने साधन माँगे—

ताकि सेवा रुक न जाए।”

अगर यह यात्रा पूरी भी हो,

तो भी संतोष रहेगा कि

जीवन केवल अपने लिए नहीं जिया।

— मेरे अनुभव, मेरी यात्रा

अश्वनी शर्मा

भीतर का दीप—जोति-दर्शन और मेरी साधना की यात्रा(मेरे अनुभव, मेरी यात्रा)ध्यान की यात्रा में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो साधक...
12/11/2025

भीतर का दीप—जोति-दर्शन और मेरी साधना की यात्रा

(मेरे अनुभव, मेरी यात्रा)

ध्यान की यात्रा में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो साधक की पूरी दिशा बदल देते हैं।
मैंने भी यह कभी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन में ऐसा कोई क्षण आएगा—जो मुझे बताएगा कि मैं वास्तव में कौन हूँ, और कहाँ जा रहा हूँ।
बहुत समय तक ध्यान मेरे लिए सिर्फ मानसिक शांति का अभ्यास था, लेकिन एक दिन अचानक भीतर एक ऐसा द्वार खुला, जिसने मेरी साधना को नया अर्थ दे दिया।



1. वह सुबह – जब भीतर दीप जल उठा

उस दिन ध्यान में बैठते हुए मन सामान्य ही था।
ना कोई खास बेचैनी, ना कोई विशेष गहराई।
बस रोज़ की तरह श्वास पर टिकने का अभ्यास।

लेकिन कुछ ही क्षणों में, आँखें बंद किए हुए,
मेरे सामने एक दिए की बाती उभर आई—
बिल्कुल स्पष्ट, बिल्कुल वास्तविक।

जैसे किसी मंदिर के कोने में एक दीपक जल रहा हो—
पीली-नारंगी लौ धीरे-धीरे ऊपर उठती हुई।
क्षणभर मुझे भ्रम हुआ—“क्या यह मेरा कल्पना-चिंतन है?”
पर लौ इतनी वास्तविक थी कि उसे कल्पना कहना असंभव था।

मैंने जब अपना ध्यान उस बाती पर केंद्रित किया,
वह ऊपर की ओर उठने लगी…
धीरे-धीरे…
मानो किसी अदृश्य शक्ति की ओर खिंचती जा रही हो।

और अचानक—वह गायब हो गई।

आँख खोलकर देखा—कुछ नहीं।
आँख बंद की—वही लौ फिर प्रकट।

उस क्षण एक बात मैंने भीतर से महसूस की—
कुछ मेरे अंदर बदल रहा है।



2. मेरी तलाश शुरू हुई—पर उत्तर न मिले

अगले कुछ दिनों तक वही अनुभव बार-बार आता रहा।
लौ कभी स्थिर, कभी हल्की, कभी तेज़।

यह अनुभव मुझे उलझा भी रहा था और आकर्षित भी।
जैसे कोई भीतर से कह रहा हो—
“देखो, यह मार्ग है… चलते रहो…”

मैंने कई साधकों, योगियों, ध्यान-शिक्षकों से पूछा—
पर कोई भी उस गहराई को नहीं समझ पाया जिसमें मेरा अनुभव था।

किसी ने कहा—
“यह भ्रम है। धारणाएँ मत बनाओ।”

किसी ने कहा—
“यह ऊर्जा का खेल है।”

किसी ने कहा—
“अच्छा है, पर इसे पकड़ो मत।”

लेकिन मेरे भीतर बस एक प्रश्न था—
यह जोति क्यों दिखाई दे रही है?
इसका अर्थ क्या है?

उत्तर बाहर नहीं मिला।
धीरे-धीरे उत्तर भीतर से उठने लगे।



3. भीतर खुलने लगा ब्रह्मांड

समय के साथ मेरे भीतर प्रकाश के नए-नए रूप दिखने लगे—
• कभी अंधकार में हजारों टिमटिमाते तारे
• कभी एक विशाल वृक्ष, जैसे मैं उसके नीचे बैठा हूँ
• कभी नीला, अनंत आकाश
• कभी आज्ञा चक्र पर तेज़ सफ़ेद-नीली ज्योति
• कभी पूरा मस्तिष्क एक उजाले से भर जाता

इन अनुभवों का सौंदर्य अद्भुत था—
लेकिन उससे भी अद्भुत थी वह शांति,
जो इनके साथ उतरती थी।

इतना गहरा सन्नाटा,
इतना गहरा स्थिर प्रकाश,
जैसे मैं शरीर में नहीं,
अपने ही भीतर के सूक्ष्म आकाश में प्रवेश कर चुका हूँ।

एक दिन मुझे भीतर से अनुभव हुआ—
“ये दृश्य बाहर के नहीं हैं।
यह तुम्हारे मन के आवरण हटने की प्रक्रिया है।”



4. यह क्यों होता है? — मेरी समझ

जैसे-जैसे ध्यान गहरा होता है,
मन का शोर कम होने लगता है,
और वह प्रकाश प्रकट होता है जो हमेशा से भीतर था,
पर ध्वनियों में, चिंताओं में, इच्छाओं में दब गया था।

योग शास्त्र कहते हैं—
• ज्योति-दर्शन = चित्त की शुद्धता
• नीला आकाश = विशुद्धि की सक्रियता
• प्रकाश-बिंदु = आज्ञा चक्र का जागरण
• तारे = मन के आकाश का खुलना
• ऊपर उठती लौ = कुंडलिनी-ऊर्जा का सूक्ष्म संकेत

मैं समझने लगा—
मेरी साधना केवल बैठने का अभ्यास नहीं रही,
यह अब भीतर की यात्रा बन चुकी है।



5. क्या मैं मंज़िल की ओर बढ़ रहा हूँ?

एक दिन ध्यान में वही लौ प्रकट हुई—
पर इस बार उसका प्रकाश मेरे भीतर उतर गया।
ऐसा लगा, जैसे चेतना एक क्षण के लिए
शरीर से बड़ी हो गई हो।

और तभी भीतर से एक सहज उत्तर आया—

“हाँ, तुम रास्ते में हो…
और यह रास्ता सही है।”

यह मंज़िल नहीं है,
पर मंज़िल की खुशबू है।
समाधि का श्रंगार नहीं,
पर उसकी दहलीज़ है।

प्रकाश का दिखना
यह बताता है कि:
• मन की परतें टूट रही हैं
• चित्त पवित्र हो रहा है
• भीतर का ब्रह्मांड जाग रहा है
• आत्मा अपने स्रोत की ओर बढ़ रही है



6. मेरे लिए इसका क्या अर्थ निकला?

मुझे समझ आ गया कि—
• प्रकाश कोई भ्रम नहीं
• जोति कोई कल्पना नहीं
• दृश्य कोई सपने नहीं
वे सब मेरी चेतना के द्वार हैं।

जोति का दिखना मेरे लिए संकेत था—
कि मैं अकेला नहीं हूँ।
कोई भीतर मेरा हाथ पकड़े हुए है।
कोई मार्गदर्शन कर रहा है।
कोई मुझे कह रहा है—
“चलते रहो… अभी बहुत कुछ देखना और जानना बाकी है।”अश्वनी शर्मा

"सच्चा योग केवल शरीर की मुद्राएँ नहीं, बल्कि चित्त की मुद्राओं का भी विज्ञान है। आज अपने अभ्यास में वह सब लाएँ जो आप हैं...
11/12/2025

"सच्चा योग केवल शरीर की मुद्राएँ नहीं, बल्कि चित्त की मुद्राओं का भी विज्ञान है। आज अपने अभ्यास में वह सब लाएँ जो आप हैं - आपके प्रश्न, आपकी आशाएँ, आपकी चुनौतियाँ।"

विशेष संकल्पना:
"जैसे योग में हर आसन संतुलन सिखाता है, वैसे ही जीवन में भी विचार और कर्म के संतुलन से ही सच्ची आध्यात्मिक उन्नति संभव है।"

अभ्यास का सूत्र:
"आज प्राणायाम के समय इस भावना से साँस लें - 'मैं ग्रहण कर रहा हूँ जो मेरे विकास के लिए आवश्यक है' और साँस छोड़ते समय - 'मैं त्याग रहा हूँ जो मेरे मार्ग में बाधक है'।"

ध्यान बिंदु:
"आपकी बिचारधारा सागर की लहरों के समान है, और आत्मा उसके नीचे की गहराई। आज का ध्यान इस गहराई को पहचानने का अभ्यास है।"

याद रखें:
आपका आध्यात्मिक पथ uniquely yours है, और आज का दिन उसे और गहराकरने का अवसर लेकर आया है।

“जहाँ प्राण है, वहीं जीवन है।”प्राण — यह केवल श्वास नहीं, बल्कि जीवंत ऊर्जा है जो हमें चलाती है, सोचने और महसूस करने की ...
11/11/2025

“जहाँ प्राण है, वहीं जीवन है।”

प्राण — यह केवल श्वास नहीं, बल्कि जीवंत ऊर्जा है जो हमें चलाती है, सोचने और महसूस करने की शक्ति देती है।
जब यह ऊर्जा संतुलित होती है, तो शरीर स्वस्थ, मन शांत और आत्मा प्रसन्न रहती है।

प्राण मुद्रा (Prana Mudra): जीवनशक्ति बढ़ाने वाली मुद्रा

विधि:
दोनों हाथों से अनामिका (Ring finger) और कनिष्ठा (Little finger) को अंगूठे (Thumb) से मिलाएँ।
शेष दो उँगलियाँ (तर्जनी व मध्यमा) सीधी रखें।
ध्यान में बैठकर या सामान्य रूप से दिन में 15–20 मिनट करें।

लाभ:

शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है।
आँखों की रोशनी, त्वचा की चमक, और ऊर्जा स्तर में सुधार।
मानसिक थकान, तनाव और नकारात्मकता को कम करता है।
ध्यान के समय ऊर्जा प्रवाह को सक्रिय करता है।

आध्यात्मिक भाव:

प्राण मुद्रा हमें याद दिलाती है कि ईश्वर हमारी हर श्वास में है।
हर श्वास के साथ हम ब्रह्मांड की दिव्य ऊर्जा को अपने भीतर ग्रहण करते हैं।
जब प्राण संतुलित होता है, तब मन अपने आप ध्यानमग्न हो जाता है।

प्राण में ही परमात्मा का निवास होता है
अश्वनी योग फाउंडेशन

“ॐ की तरंगों में स्थिरता – शून्य मुद्रा के माध्यम से”जब मन बहुत बोलता है, तब ध्यान गहरा नहीं होता।लेकिन जब हम शून्यता का...
11/06/2025

“ॐ की तरंगों में स्थिरता – शून्य मुद्रा के माध्यम से”

जब मन बहुत बोलता है, तब ध्यान गहरा नहीं होता।
लेकिन जब हम शून्यता का अनुभव करते हैं — भीतर और बाहर दोनों मौन हो जाते हैं — तब आत्मा का द्वार खुलता है।
“ॐ” का उच्चारण और शून्य मुद्रा (Shunya Mudra) का अभ्यास मिलकर हमें उसी मौन की अवस्था में पहुँचाते हैं, जहाँ केवल “मैं हूँ” का साक्षात्कार होता है।

आज का मुद्रा अभ्यास:

शून्य मुद्रा (Shunya Mudra)

विधि:
अपने दाएँ हाथ की मध्यमा (मिडिल फिंगर) को मोड़कर उसके सिरे को अंगूठे के आधार से लगाएँ।
अंगूठे से हल्का दबाव दें।
बाकी तीन उंगलियाँ सीधी रखें।
हाथ घुटनों पर रखें, आँखें बंद कर गहरी श्वास लें।
प्रत्येक श्वास छोड़ते हुए “ॐ” का उच्चारण करें।

समय:
10 से 15 मिनट प्रतिदिन, विशेषकर ध्यान या भजन से पहले।

लाभ:
• कान, नाक, गला व सिर से जुड़ी वायु असंतुलन की समस्याओं को संतुलित करता है।
• मन को मौन और शांति की दिशा में ले जाता है।
• अत्यधिक विचार, बेचैनी या अनिद्रा में अत्यंत लाभकारी।
• ध्यान में गहराई और स्थिरता लाने में सहायक।

“जब मन शून्य होता है, तभी ब्रह्मांड की ध्वनि ‘ॐ’ भीतर स्पष्ट सुनाई देती है।”
अश्वनी योग फाउंडेशन

शांति कोई मंज़िल नहीं, यह एक साधना है” — के साथ सबसे उपयुक्त मुद्रा है:ज्ञान मुद्रा (Gyan Mudra) — अंतर्मन की शांति और स...
11/05/2025

शांति कोई मंज़िल नहीं, यह एक साधना है” — के साथ सबसे उपयुक्त मुद्रा है:

ज्ञान मुद्रा (Gyan Mudra) — अंतर्मन की शांति और स्पष्टता के लिए

विधि:
• आराम से सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठें।
• दोनों हाथों को घुटनों पर रखें।
शांति कोई मंज़िल नहीं, यह एक साधना है” के साथ सबसे उपयुक्त मुद्रा है:

ज्ञान मुद्रा (Gyan Mudra) — अंतर्मन की शांति और स्पष्टता के लिए

विधि:
• आराम से सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठें।
• दोनों हाथों को घुटनों पर रखें।
• अंगूठे की नोक और तर्जनी की नोक को मिलाएँ, बाकी तीन उँगलियाँ सीधी रखें।
• आँखें बंद करें, श्वास को सहज रखें।

ध्यान बिंदु:
श्वास के साथ मन में दोहराएँ —

“मैं शांत हूँ, शांति मेरा स्वभाव है।”

लाभ:
मन को स्थिर और केंद्रित करता है
चिंता, तनाव और अनावश्यक विचारों को शांत करता है
ध्यान में गहराई लाने में सहायक है
तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है

अवधि: प्रतिदिन 10–15 मिनट
सर्वश्रेष्ठ समय: प्रातःकाल या ध्यान के बाद अंगूठे की नोक और तर्जनी की नोक को मिलाएँ, बाकी तीन उँगलियाँ सीधी रखें।
आँखें बंद करें, श्वास को सहज रखें।

ध्यान बिंदु:
श्वास के साथ मन में दोहराएँ —

“मैं शांत हूँ, शांति मेरा स्वभाव है।”

लाभ:
मन को स्थिर और केंद्रित करता है
चिंता, तनाव और अनावश्यक विचारों को शांत करता है
ध्यान में गहराई लाने में सहायक है
तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है

अवधि: प्रतिदिन 10–15 मिनट
सर्वश्रेष्ठ समय: प्रातःकाल या ध्यान के बाद

11/02/2025

करुणा की ज्योति जलाओ

जब हम प्रेम और करुणा से भर जाते हैं,
तो जीवन की हर कठिनाई भी सरल लगने लगती है।
हर रोज़ ह्रदय मुद्रा का अभ्यास करते रहें
विधि:
तर्जनी (पहली उंगली) को अंगूठे के मूल में मोड़ें।
बाकी तीन उंगलियाँ — मध्यमा, अनामिका और अंगूठा — एक साथ मिलाएँ।
कनिष्ठा (छोटी उंगली) सीधी रखें।
दोनों हाथों से यह मुद्रा बनाकर घुटनों पर रखें, आँखें बंद करें।

समय: 10–15 मिनट प्रतिदिन, विशेषकर प्रातःकाल या ध्यान के बाद।
लाभ:
हृदय की ऊर्जा को संतुलित करती है
तनाव, दुख और भावनात्मक पीड़ा को दूर करती है
• प्रेम, करुणा और दया की भावना जागृत करती है
• हृदय रोगों की रोकथाम में सहायक

ध्यान मंत्र:
“अनाहतं नमः”
(अर्थ — मैं अपने हृदय चक्र की शुद्धता और प्रेम को नमन करता हूँ)

“करुणा वह पुल है जो हमें मनुष्य से देवत्व तक पहुँचाता है।
हृदय मुद्रा वही पुल मजबूत करती है।”Ashwani Yog Foundation

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