31/07/2026
लोकतंत्र का मतलब अराजकता नहीं होता, और अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब देश की सेना, सैनिकों और संवैधानिक संस्थाओं का अपमान करने का लाइसेंस बिल्कुल नहीं है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने सिर्फ वायरल होने के लिए अश्लील, अभद्र और आपत्तिजनक वीडियो बनाए, सेना के जवानों और अधिकारियों के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया और उस कंटेंट को सोशल मीडिया पर फैलाया, तो केवल एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
मेरी स्पष्ट राय है कि ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के सोशल मीडिया अकाउंट, चाहे वे किसी भी प्लेटफ़ॉर्म पर हों, संबंधित कानूनों और प्लेटफ़ॉर्म की नीतियों के अनुसार स्थायी रूप से बंद किए जाने पर भी विचार होना चाहिए। जो लोग सोशल मीडिया को गाली-गलौज, अश्लीलता और नफ़रत फैलाने का हथियार बना देते हैं, उन्हें डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन मर्यादा के भीतर। विरोध के नाम पर अश्लीलता, बदसलूकी और संस्थाओं का अपमान किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
यह मेरी व्यक्तिगत राय है। अंतिम निर्णय कानून, निष्पक्ष जांच और सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।