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अन्तर्राष्ट्रीय त्रिविध पावनी महापर्व वैशाख पूर्णिमा/बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर समस्त जनमानस को हार्दिक बधाई मंगलकाम...
01/05/2026

अन्तर्राष्ट्रीय त्रिविध पावनी महापर्व वैशाख पूर्णिमा/बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर समस्त जनमानस को हार्दिक बधाई मंगलकामनाएं।
#बुद्ध_पूर्णिमा

 #सामाजिक_क्रांति के अग्रदूत,  #महान_समाज सुधारक,  #महिला_शिक्षा के जनक,  #ज्योतिबा_फुले_जयंती पर समस्त देशवासियों को हा...
11/04/2026

#सामाजिक_क्रांति के अग्रदूत, #महान_समाज सुधारक, #महिला_शिक्षा के जनक, #ज्योतिबा_फुले_जयंती पर समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई मंगलकामनाएं।

#फुले_जयंती

🇮🇳 गणतंत्र दिवस 🇮🇳  26 जनवरी 2026☸️☸️☸️☸️☸️       आप सभी को 77वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाईयां, मंगलकामनाएं, जय भारत।...
26/01/2026

🇮🇳 गणतंत्र दिवस 🇮🇳
26 जनवरी 2026
☸️☸️☸️☸️☸️

आप सभी को 77वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाईयां, मंगलकामनाएं, जय भारत।

गणतंत्र दिवस भारत वर्ष का एक राष्ट्रीय पर्व है, जिसे प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है क्योंकि 26 जनवरी सन् 1950 को भारत वर्ष का संविधान लागू हुआ था। यह विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें समता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुत्व और व्यक्ति की गरिमा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इस वर्ष 2025 में भारतवर्ष में 76वां गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है जिसमें इंडोनेशिया के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति प्रबोवो सुबिआंतो मुख्य अतिथि हैं।

भारतवर्ष की स्वतंत्रता के पूर्व 2 सितंबर 1946 को एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं कानून मंत्री डॉ भीमराव अंबेडकर बने। यह अंतरिम सरकार 15 अगस्त 1947 तक बनी रही। लॉर्ड माउंटबेटन योजना के तहत भारत के संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया गया, जिसके सदस्यों का चुनाव प्रादेशिक विधानसभाओं द्वारा हुआ। डॉ भीमराव अंबेडकर अविभाजित बंगाल से चुनकर सविधान सभा में आए किंतु 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ और बंगाल का विभाजन हुआ तो भीमराव अंबेडकर का निर्वाचन क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान में चला गया और उनकी सदस्यता समाप्त हो गई। फिर उन्हें मुंबई प्रादेशिक विधानसभा से चुना गया। 29 अगस्त 1947 को प्रारूप समिति का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष डॉ भीमराव अंबेडकर बने जिसमें 7 सदस्य थे। प्रारूप समिति ने संविधान सभा में एक-एक बिंदु पर चर्चा के लिए 21 फरवरी 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद को अपना मसौदा सौंप दिया। इस प्रकार 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन में संविधान बनकर तैयार हुआ।

संविधान सभा द्वारा विस्तृत चर्चा करने के उपरांत 26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया क्योंकि 1930 में इसी दिन को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्र के नाम संदेश दिया जाता है तथा अगली सुबह दिल्ली के कर्तव्य पथ पर भारतीय ध्वज फहराया जाता है। कर्तव्य पथ पर बड़ी धूमधाम से परेड तथा विभिन्न प्रदेशों की सभ्यता एवं संस्कृतियों को समाहित करते हुए झांकियां निकाली जाती है। जिसे देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं।

भारतीय संविधान की उद्देशिका (प्रस्तावना) भारतीय संविधान के लक्ष्य को प्रदर्शित करती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, व अखंडता शब्द जोड़े गए। संविधान द्वारा ही हमें 6 मौलिक अधिकार (अनु. 12 से अनु. 35 तक) प्राप्त हुए हैं।

(1) समता का अधिकार (अनु.14 -18)
(2) स्वतंत्रता का अधिकार ( अनु . 19 - 22)
(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु. 23 - 24)
(4) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु . 25 - 28)
(5) शिक्षा और संस्कृति का अधिकार (अनु 29 - 30)
(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनु . 32)

संविधान लागू होने से पूर्व भारत में कुप्रथाओं की जड़ें मजबूत थी। जैसे अस्पृश्यता (छुआछूत), सती प्रथा आदि। किंतु भारतीय संविधान द्वारा अस्पृश्यता का अंत अनुच्छेद 17 के तहत कर दिया गया एवं अनुच्छेद 21 के तहत प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त हुए एवं बालकों के सर्वांगीण विकास के लिए अनुच्छेद 21 (क) के तहत 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा लागू किया गया।डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा है कि, "शिक्षा वह कुंजी है जिससे संसार के सभी ताले खुलते हैं।"
अनुच्छेद 23 द्वारा बलात् श्रम एवं मानव दुर्व्यापार तथा अनुच्छेद 24 के तहत 14 वर्ष के कम आयु के बालकों को कारखाने या खान में कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 32 के तहत संवैधानिक उपचारों का अधिकार मिला है जिसे भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहे हैं।

आज संविधान है तो हम हैं, हमारा मान सम्मान है, नहीं तो इतिहास के पन्नों को उठाकर देख लीजिए हम पर कितने जुल्म किए जाते थे। महिलाओं को किस प्रकार पुरुष प्रधान समाज पर्दे में रखता था। जिससे वे शिक्षा से वंचित रह जाती थी किंतु संविधान द्वारा महिलाओं को भी विकास का रास्ता खोल दिया गया जिसका उदाहरण आप सबके सामने हैं, कि देश के सर्वोच्च पद पर महामहीम राष्ट्रपति के रूप में एक महिला द्रौपदी मुर्मू जी आसीन है ।

आज हमारी बेटियां ओलंपिक में पदक जीत कर ला रही हैं तो इसका श्रेय भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले एवं फातिमा शेख को भी जाता है, जिन्होंने महामना ज्योतिबा फुले के सानिध्य में महिलाओं के लिए पहला विद्यालय खोलें। संविधान में भी भारत वर्ष में जन्में 6से 14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्राविधान अंकित है और तो और कोई भी व्यक्ति यहां तक कि उसके माता पिता जी भी उसे शिक्षा से दूर नहीं कर सकते ।

संविधान केवल मनुष्य को ही सुरक्षा प्रदान नहीं करता अपितु भारतीय अधिकार क्षेत्र में आने वाले समस्त जीव - जन्तुओ, पेड़ - पौधों, नदी, पहाड़ों, पुरातात्विक स्थलों, ऐतिहासिक स्रोतों आदि सभी को सुरक्षा प्रदान करता है। कोई व्यक्ति हरे पेड़ को नहीं काट सकता यदि वह ऐसा करता है वह कानून के द्वारा दोषी है और उसे सजा मिलती है। इसी तरह उन बच्चों को भी जीने का अधिकार है, जो अभी पैदा नहीं हुए हैं। कहने का आशय यह है कि आप भ्रूण परीक्षण नहीं करा सकते और नहीं गर्भपात करा सकते हैं। ऐसा करना जुर्म है। यहां तक कहा जा सकता है कि जो संविधान का विरोध करते हैं उनकी भी सुरक्षा खुद संविधान करता है।

भारतीय संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जिससे भारतीय शासन एवं प्रशासन संचालित होते हैं जो प्रत्येक भारतीय व्यक्ति को हक, अधिकार एवं सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता है।

"स्वामी विवेकानंद" 19वीं सदी  के एक महान, संतजन्मदिवस 12 जनवरी पर विशेषकलकत्ता के एक कुलीन कायस्थ बंगाली परिवार मे जन्मे...
12/01/2026

"स्वामी विवेकानंद" 19वीं सदी के एक महान, संत

जन्मदिवस 12 जनवरी पर विशेष

कलकत्ता के एक कुलीन कायस्थ बंगाली परिवार मे जन्मे "स्वामी विवेकानंद" के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था जिनका जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ, बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि तथा माता-पिता के प्रगतिशील तर्कसंगत रवैए ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कीl

स्वामी विवेकानंद जब 8 वर्ष के थे तब उनका एडमिशन कलकत्ता के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में कराया गया यहां उन्होंने 1877 तक पढ़ाई की लिखने और पढ़ने का शौक उन्हें बचपन से थाl

"स्वामी विवेकानंद को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था उन्हें जहां अच्छी किताबें मिलती वह उसे जरूर पढ़ते किसी भी नई जगह पर अपनी यात्राओं में लाइब्रेरी जरूर खोजते थेl

स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखित पुस्तकों की अगर बात करें तो उनमें, राजयोग,कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, माई मास्टर लेक्चरर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा, प्रमुख हैl

स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएं ज्ञान का खजाना है वे आत्मविश्वास, ज्ञान की खोज आत्म सुधार अप्प दीपो भव, और सार्वभौमिक भाईचारे पर जोर देते हैं,
स्वामी विवेकानंद 3 वर्ष तक अमेरिका में रहे और पश्चिम जगत के लोगों को तथागत गौतम बुद्ध के मानवतावादी प्राकृतिक "धम्म से परिचित कराया, 'उन्होंने विश्व को बुद्ध की देन कहा बुद्ध के धम्म के बिना विश्व अनाथ हो जाएगाl

अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व बौद्ध सम्मेलन में दिया गया स्वामी विवेकानंद जी का भाषण,
जिसका आयोजन 17 दिनों ( 11 से 27 सितंबर 1893 ) तक हुआ, अमेरिका वासी बहनों तथा भाइयों से अपना वक्तव्य शुरू किया और सामने बैठे विश्व भर से आए हुए लगभग 7000 लोगों के बीच में "तथागत गौतम बुद्ध" के धम्म के मुख्य सुत्त, कार्य कारण सिद्धांत, पर व्याख्यान दिया 2 मिनट से ज्यादा समय तक उपस्थित जनसमूह ने तालियां बजाई यह बात कम लोगों को ही पता होगी

स्वामी विवेकानंद की सम्मति,

बुद्ध तथा उनके धम्म की वैज्ञानिक श्रेष्ठता तथा महानता के संबंध में स्वामी विवेकानंद ने अपनी पुस्तक ,कर्म योग, के बीसवे संस्करण के 168 वे पृष्ठ पर लिखा है:-

"वह (तथागत गौतम बुद्ध) संपूर्ण रूप से सभी अभिसंधियों से मुक्त थे,'इतिहास में किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाओ जिसे उनसे ज्यादा कार्य किया हो,किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाओ जो इतना उन्नत हो, 'समस्त मानव जाति ने केवल ऐसे एक ही व्यक्ति को जन्म दिया है ।"

'ऐसे उन्नत दर्शन ऐसी अद्भुत सहानुभूति जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता इस श्रेष्ठ "महामानव" ने सर्वश्रेष्ठ दर्शन का प्रसार किया है परंतु लोगों के पास उनकी कोई मांग नहीं है मनुष्य जाति का इतिहास बतलाता है कि विश्व में जितने भी मनुष्य पैदा हुए हैं, उनमें "बुद्ध "ही सर्वश्रेष्ठ हैं उनके साथ और किसी की भी तुलना नहीं की जा सकतीl

"स्वामी विवेकानंद" उनका आदर्श वाक्य था,उठो जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, आज भी दुनिया में लाखों लोगों को प्रेरित करता हैl

अपने ज्ञान की आभा से पराधीन भारत के सुप्त जनमानस को उद्देलित किया झगझोरा और अनारिक धम्मपाल के साथ मिलकर भारत की मूल सभ्यता संस्कृति का प्रसार विदेशो में किया

उनकी अंतिम यात्राओं में बोधगया शामिल था 4 जुलाई 1902 को उनका देहांत हुआl

प्रस्तुत लेख पुस्तक :-"विश्व को बुद्ध की देंन" से साभार,

राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले : जीवन, संघर्ष और समाज–महिला उत्थान की प्रेरक गाथा*_भारत के सामाजिक पुनर्जागरण के इतिहास मे...
03/01/2026

राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले : जीवन, संघर्ष और समाज–महिला उत्थान की प्रेरक गाथा

*_भारत के सामाजिक पुनर्जागरण के इतिहास में राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे भारत की प्रथम शिक्षिका, महान समाज सुधारिका, कवयित्री और नारी शिक्षा की अग्रदूत थीं। ऐसे समय में जब स्त्रियों और शोषित वंचित समाज को शिक्षा से दूर रखा जाता था, राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बनाया।_*

*_सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गाँव में हुआ। उनका विवाह कम उम्र में महामना ज्योतिराव फुले से हुआ। उस समय समाज में बाल विवाह, स्त्री अशिक्षा और जातिगत भेदभाव व्याप्त था। विवाह के बाद महामना फुले ने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई और वे शिक्षा व समाज सुधार के पथ पर अग्रसर हुईं।_*

*_सावित्रीबाई फुले का जीवन संघर्षों से भरा रहा। जब उन्होंने लड़कियों और पिछड़ों को पढ़ाने का संकल्प लिया, तब समाज के विषमतावादी/रूढ़िवादी वर्गों ने उनका घोर विरोध किया। स्कूल जाते समय उन पर कीचड़, गोबर और पत्थर फेंके जाते थे, गालियाँ दी जाती थीं, अपमानित किया जाता था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपने साथ अतिरिक्त साड़ी रखती थीं ताकि अपमान के बाद कपड़े बदलकर फिर बच्चों को पढ़ा सकें। यह साहस और समर्पण उनके व्यक्तित्व को अद्वितीय बनाता है।_*

*_1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में सावित्रीबाई फुले और महामना ज्योतिराव फुले ने भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया। सावित्रीबाई वहाँ की पहली शिक्षिका बनीं। इसके बाद उन्होंने कई विद्यालय खोले, जहाँ लड़कियों के साथ-साथ शोषित, वंचित, पिछड़े, अति पिछड़े समाज के बच्चों को भी शिक्षा दी गई। उनका मानना था कि शिक्षा ही सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की कुंजी है। महिला उत्थान के लिए सावित्रीबाई फुले ने असाधारण कार्य किए। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का विरोध किया। विधवाओं और शोषित महिलाओं के लिए उन्होंने आश्रय स्थल खोले। अवैध गर्भ और सामाजिक भय से पीड़ित महिलाओं की सहायता के लिए उन्होंने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की, जहाँ नवजात शिशुओं और माताओं की रक्षा की जाती थी। यह कदम उस समय अत्यंत क्रांतिकारी था।_*

*_सावित्रीबाई फुले एक सशक्त कवयित्री भी थीं। उनकी रचनाएँ सामाजिक चेतना, समानता और मानवता का संदेश देती हैं। उनकी कविताओं में शोषण के विरुद्ध आवाज़ और शिक्षा के माध्यम से मुक्ति का आह्वान मिलता है। वे केवल शिक्षिका ही नहीं, बल्कि विचारों की क्रांतिकारी थीं। 1897 में पुणे में प्लेग की महामारी फैली। सावित्रीबाई फुले ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना रोगियों की सेवा की। एक पीड़ित बच्चे को अस्पताल पहुँचाते समय वे स्वयं प्लेग से संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। उनका यह बलिदान मानव सेवा की सर्वोच्च मिसाल है।_*

*_शिक्षा की वास्तविक देवी, राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले जी ने यदि महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार नहीं खोले होते तो इन्दिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री, प्रतिभा पाटिल जी देश की राष्ट्रपति नहीं बनती, और करोड़ों महिलाएं आज इस मुकाम पर नहीं पहुंचती, बल्कि चूल्हा चौका कर रही होती। इसलिए भारत की सभी माताओं, बहनों, बेटियों को राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने और राष्ट्र के विकास में सहयोग करना चाहिए।_*

भारत की प्रथम शिक्षिका – राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुलेभारत की सामाजिक क्रांति के इतिहास में सावित्रीबाई फुले का नाम स्वर्...
31/12/2025

भारत की प्रथम शिक्षिका – राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले

भारत की सामाजिक क्रांति के इतिहास में सावित्रीबाई फुले का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे भारत की प्रथम शिक्षिका, महान समाज सुधारक, कवयित्री और नारी शिक्षा की अग्रदूत थीं। ऐसे समय में जब स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था और उन्हें केवल घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया था, सावित्रीबाई फुले ने साहस, संघर्ष और संकल्प के बल पर शिक्षा के द्वार खोले।

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ। बाल्यावस्था में ही उनका विवाह महामना ज्योतिराव फुले से हुआ। राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। शिक्षा प्राप्त करने के बाद सावित्रीबाई फुले ने स्वयं शिक्षिका बनकर समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी। 1848 में पुणे के भिड़े वाड़ा में उन्होंने ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर देश का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया। यह केवल एक विद्यालय नहीं था, बल्कि सामाजिक क्रांति की नींव थी। जब वे पढ़ाने जाती थीं, तब विषमतावादी/रूढ़िवादी समाज के लोग उन पर कीचड़, गोबर और पत्थर फेंकते थे, लेकिन वे प्रतिदिन एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जातीं और अपमान सहते हुए भी अपने लक्ष्य से कभी विचलित नहीं हुईं।

सावित्रीबाई फुले ने विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह निषेध, जाति उन्मूलन और स्त्री सम्मान के लिए भी अथक संघर्ष किया। उन्होंने विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए आश्रय गृह खोले तथा प्लेग जैसी महामारी के समय निस्वार्थ भाव से पीड़ितों की सेवा की। इसी सेवा भाव में 1897 में वे स्वयं प्लेग से संक्रमित होकर इस संसार से विदा हो गईं।

सावित्रीबाई फुले केवल शिक्षिका नहीं, बल्कि शिक्षा की वास्तविक देवी और नारी मुक्ति की प्रतीक थीं। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि शिक्षा ही समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा सकती है। आज जब हम उनकी जयंती मनाते हैं, तो यह संकल्प लेना आवश्यक है कि हम शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के उनके सपनों को साकार करें।
निश्चय ही, क्रान्तिज्योति राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

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