12/01/2026
"स्वामी विवेकानंद" 19वीं सदी के एक महान, संत
जन्मदिवस 12 जनवरी पर विशेष
कलकत्ता के एक कुलीन कायस्थ बंगाली परिवार मे जन्मे "स्वामी विवेकानंद" के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था जिनका जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ, बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि तथा माता-पिता के प्रगतिशील तर्कसंगत रवैए ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कीl
स्वामी विवेकानंद जब 8 वर्ष के थे तब उनका एडमिशन कलकत्ता के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में कराया गया यहां उन्होंने 1877 तक पढ़ाई की लिखने और पढ़ने का शौक उन्हें बचपन से थाl
"स्वामी विवेकानंद को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था उन्हें जहां अच्छी किताबें मिलती वह उसे जरूर पढ़ते किसी भी नई जगह पर अपनी यात्राओं में लाइब्रेरी जरूर खोजते थेl
स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखित पुस्तकों की अगर बात करें तो उनमें, राजयोग,कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, माई मास्टर लेक्चरर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा, प्रमुख हैl
स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएं ज्ञान का खजाना है वे आत्मविश्वास, ज्ञान की खोज आत्म सुधार अप्प दीपो भव, और सार्वभौमिक भाईचारे पर जोर देते हैं,
स्वामी विवेकानंद 3 वर्ष तक अमेरिका में रहे और पश्चिम जगत के लोगों को तथागत गौतम बुद्ध के मानवतावादी प्राकृतिक "धम्म से परिचित कराया, 'उन्होंने विश्व को बुद्ध की देन कहा बुद्ध के धम्म के बिना विश्व अनाथ हो जाएगाl
अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व बौद्ध सम्मेलन में दिया गया स्वामी विवेकानंद जी का भाषण,
जिसका आयोजन 17 दिनों ( 11 से 27 सितंबर 1893 ) तक हुआ, अमेरिका वासी बहनों तथा भाइयों से अपना वक्तव्य शुरू किया और सामने बैठे विश्व भर से आए हुए लगभग 7000 लोगों के बीच में "तथागत गौतम बुद्ध" के धम्म के मुख्य सुत्त, कार्य कारण सिद्धांत, पर व्याख्यान दिया 2 मिनट से ज्यादा समय तक उपस्थित जनसमूह ने तालियां बजाई यह बात कम लोगों को ही पता होगी
स्वामी विवेकानंद की सम्मति,
बुद्ध तथा उनके धम्म की वैज्ञानिक श्रेष्ठता तथा महानता के संबंध में स्वामी विवेकानंद ने अपनी पुस्तक ,कर्म योग, के बीसवे संस्करण के 168 वे पृष्ठ पर लिखा है:-
"वह (तथागत गौतम बुद्ध) संपूर्ण रूप से सभी अभिसंधियों से मुक्त थे,'इतिहास में किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाओ जिसे उनसे ज्यादा कार्य किया हो,किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाओ जो इतना उन्नत हो, 'समस्त मानव जाति ने केवल ऐसे एक ही व्यक्ति को जन्म दिया है ।"
'ऐसे उन्नत दर्शन ऐसी अद्भुत सहानुभूति जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता इस श्रेष्ठ "महामानव" ने सर्वश्रेष्ठ दर्शन का प्रसार किया है परंतु लोगों के पास उनकी कोई मांग नहीं है मनुष्य जाति का इतिहास बतलाता है कि विश्व में जितने भी मनुष्य पैदा हुए हैं, उनमें "बुद्ध "ही सर्वश्रेष्ठ हैं उनके साथ और किसी की भी तुलना नहीं की जा सकतीl
"स्वामी विवेकानंद" उनका आदर्श वाक्य था,उठो जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए, आज भी दुनिया में लाखों लोगों को प्रेरित करता हैl
अपने ज्ञान की आभा से पराधीन भारत के सुप्त जनमानस को उद्देलित किया झगझोरा और अनारिक धम्मपाल के साथ मिलकर भारत की मूल सभ्यता संस्कृति का प्रसार विदेशो में किया
उनकी अंतिम यात्राओं में बोधगया शामिल था 4 जुलाई 1902 को उनका देहांत हुआl
प्रस्तुत लेख पुस्तक :-"विश्व को बुद्ध की देंन" से साभार,