29/08/2026
स्टोरी/ आफताब रौशन
सिलसिला-ए-चिश्तिया के अज़ीम सूफ़ी और हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के सब से ख़ास ख़लीफ़ा हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी का ख़ानदानी सिलसिला पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के नवासे हज़रत इमाम हुसैन से मिलता है; उन्हें 'क़ुतब-उल-अक़्ताब' (तमाम औलिया के रूहानी मरकज़) का मुक़ाम हासिल था।
आपको 'काकी' का लक़ब मिलने की सबसे मशहूर रिवायत यह है कि जब आपके घर में फ़ाक़ाकशी का आलम था, तो आपकी ज़ौजाह (पत्नी) पड़ोस के एक पंसारी से उधार सौदा-सुलफ़ लाती थीं; एक दिन पंसारी ने ताना मारा कि अगर उसकी मेहरबानी न हो तो पूरा ख़ानदान भूखा मर जाए।
जब हज़रत ख़्वाजा को इस बात की ख़बर हुई, तो उन्होंने आइंदा उधार लेने से मना फ़रमा दिया और दीवार में बने एक आले (ताक़) की तरफ़ इशारा करके कहा कि यहाँ 'बिस्मिल्लाह' पढ़कर हाथ डालना और रोटी निकाल लेना; चुनाँचे वहाँ से मुअज्जिज़ाना (चमत्कारी) तौर पर गर्म 'काक' (रोटियाँ) निकलती रहीं, जब तक कि उनकी ज़ौजाह ने यह राज़ दूसरों पर ज़ाहिर नहीं कर दिया।
नौजवानी के दौर में बग़दाद जाकर आप हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के मुरीद हुए और फिर अपने पीर-ओ-मुर्शद के साथ हिंदुस्तान तशरीफ़ ले आए, जहाँ मुर्शद के हुक्म पर आपने दिल्ली में मुक़ाम फ़रमाया और यहाँ पहला चिश्ती रूहानी मरकज़ क़ायम किया; दिल्ली के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश आपके बेहद अक़ीदतमंद थे और हफ़्ते में दो मर्तबा आपकी ख़ानक़ाह में हाज़िरी दिया करते थे।
हज़रत ख़्वाजा की बढ़ती हुई मक़बूलियत देखकर मुक़ामी उलेमा हसद करने लगे और समा (सूफ़ियाना क़व्वाली) की महफ़िलों को लेकर इख़्तिलाफ़ात व तनाज़ा खड़े करने लगे; जब मुर्शद हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ को अपने मुरीद की इस तकलीफ़ का इल्म हुआ, तो वो दिल्ली तशरीफ़ लाए और ख़्वाजा क़ुतुब को अपने साथ अजमेर ले जाने लगे।
जब दोनों बुज़ुर्गों का क़ाफ़िला चला, तो दिल्ली की पूरी अवाम सुल्तान इल्तुतमिश की क़ियादत में रोती हुई मीलों पीछे चल पड़ी और जिस मिट्टी पर सूफ़िया के क़दम पड़ते थे, लोग उसे मुक़द्दस समझकर आँखों से लगाने लगे; अवाम की यह बेपनाह मोहब्बत देखकर ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का दिल भर आया और उन्होंने ख़्वाजा क़ुतुब को वापस दिल्ली में ही रहने का हुक्म फ़रमाया, जिसके बाद सुल्तान इल्तुतमिश ने शुक्राने के तौर पर ग़रीब नवाज़ के क़दम चूमे और हज़रत ख़्वाजा क़ुतुब को इज़्ज़त-ओ-एहतिराम के साथ वापस दारुल-हुकूमत दिल्ली ले आए।
सुल्तान के साथ इस क़दर नज़दीकियों के बावजूद हज़रत ख़्वाजा क़ुतुब ने निहायत फ़क़ीराना, सादा और ज़ाहिदाना ज़िंदगी गुज़ारी; आप हर शब (रात) दो मर्तबा मुकम्मल क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत फ़रमाते थे और अपने मुरीदों को यही तालीम देते थे कि बिना किसी दुनियावी लालच या बदले की उम्मीद के ज़रूरतमंदों की मदद की जाए, क्योंकि राह-ए-हक़ के मुसाफ़िर वो हैं जो सर से लेकर पाँव के नाख़ून तक इश्क़-ए-इलाही के समंदर में डूबे रहते हैं।
हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी समा की महफ़िलों को इश्क़-ए-इलाही की आग भड़काने का ज़रिया मानते थे और आपका विसाल भी समा की महफ़िल में एक सूफ़ियाना कलाम सुनते हुए वज्द (हाल/कैफ़ियत) के आलम में हुआ; आपका इंतक़ाल (विसाल-ए-हक़) 14 रबी-उल-अव्वल 635 हिजरी (1236 ईस्वी) को हुआ। आपकी नमाज़-ए-जनाज़ा सुल्तान इल्तुतमिश ने पढ़ाई और आपको महरौली में उसी ज़मीन पर सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया जो आपने अपनी ज़िंदगी में मज़ार के लिए ख़रीदी थी।
हज़रत ख़्वाजा क़ुतुब के आला रूहानी मर्तबे के पेश-ए-नज़र हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ ने यह फ़रमान जारी किया था कि जो भी अजमेर शरीफ़ हाज़िरी देने आए, वह पहले हज़रत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन की दरगाह पर हाज़िरी दे; यह रिवायत आज भी जारी है और अजमेर शरीफ़ जाने वाले ज़ायरीन पहले महरौली में हाज़िर होते हैं। दिल्ली के तमाम हुक्मरान आपकी बारगाह में अक़ीदत रखते थे, और ख़ानदान-ए-ग़ुलामां के बानी सुल्तान क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने इन्हीं अज़ीम सूफ़ी के नाम पर मशहूर-ए-ज़माना 'क़ुतुब मीनार' की तामीर करवाई थी।