06/07/2026
मलाल है मगर इतना मलाल थोड़ी है,
यह आँख रोने की शिद्दत से लाल थोड़ी है।
मज़ा तो तब है कि हार के भी हंसते रहो,
हमेशा जीत ही जाना कमाल थोड़ी है।
तमाम कश्तियाँ मुंतज़िर हैं तूफ़ाँ की,
ये मौज-ए-दरिया कोई पाए-माल थोड़ी है।
सफ़र में ज़ख़्म तो खाए हैं पर शिकायत क्या,
ये हिज्र-ओ-वस्ल का पहला साल थोड़ी है।
ये ज़ीस्त एक मुसलसल नबर्द-आज़माई है,
यहाँ किसी को भी जंग से मफ़र थोड़ी है।
बस अपने वास्ते ही फ़िक्रमंद हैं हम सब,
हमारे दौर में कोई मिसाल थोड़ी है।