29/06/2026
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मजलिस का उन्वान:
"जनाब हुर (अ.स.) – तौबा से जन्नत तक का सफर"
अल्हम्दुलिल्लाह, वस्सलातु वस्सलाम अला रसूलिल्लाह मुहम्मद व आले मुहम्मद।
अज़ादाराने हुसैन!
आज हम उस शख़्सियत का ज़िक्र करेंगे, जिसने साबित कर दिया कि अगर इंसान सच्चे दिल से हक़ की तरफ़ लौट आए, तो अल्लाह उसे ऐसा मुकाम देता है कि उसका नाम क़यामत तक इज़्ज़त से लिया जाता है। वह शख़्सियत हैं जनाब हुर इब्न यज़ीद रियाही (अ.स.)।
हुर, कूफ़ा की फ़ौज के एक बहादुर सिपहसालार थे। Ubayd Allah ibn Ziyad ने उन्हें एक हज़ार सवारों के साथ Husayn ibn Ali का रास्ता रोकने के लिए भेजा।
जब हुर का काफ़िला रेगिस्तान में इमाम हुसैन (अ.स.) से मिला, तो सख़्त गर्मी थी। हुर और उनके सिपाही प्यास से बेहाल थे। मगर देखिए इमाम हुसैन (अ.स.) का अख़लाक़! आपने अपने साथियों से फ़रमाया:
"इन सबको पानी पिलाओ, इनके घोड़ों को भी पानी पिलाओ।"
जिसका रास्ता रोकने आए थे, वही उन्हें पानी पिला रहा था।
काफ़िला कर्बला पहुँचा। Battle of Karbala की दसवीं मुहर्रम की सुबह हुर ने देखा कि दुश्मन किसी भी सूरत में इमाम हुसैन (अ.स.) को नहीं छोड़ेगा। उनका ज़मीर जाग उठा। वे बेचैन हो गए। उनके शरीर पर कंपकंपी छा गई।
एक साथी ने पूछा: "हुर! आप जैसे बहादुर को आज क्या हो गया?"
हुर ने जवाब दिया:
"मैं अपने आपको जन्नत और जहन्नम के बीच खड़ा देख रहा हूँ। ख़ुदा की क़सम! मैं जन्नत के अलावा कुछ नहीं चुनूँगा, चाहे मुझे टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाए।"
यह कहकर हुर अपने घोड़े को मोड़कर इमाम हुसैन (अ.स.) के ख़ेमे की ओर बढ़े। सिर झुका हुआ था, आँखों से आँसू बह रहे थे।
उन्होंने अर्ज़ किया:
"मौला! मैं वही हूँ जिसने आपका रास्ता रोका था। क्या मेरी तौबा क़बूल हो सकती है?"
इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया:
"हाँ हुर! अल्लाह ने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली। तुम वैसे ही हुर (आज़ाद) हो, जैसे तुम्हारी माँ ने तुम्हारा नाम रखा था। तुम दुनिया और आख़िरत दोनों में आज़ाद हो।"
यह सुनकर हुर की आँखों से आँसू और तेज़ बहने लगे। उन्होंने सबसे पहले मैदान में जाने की इजाज़त माँगी।
वे दुश्मन की फ़ौज के सामने पहुँचे और पुकारकर कहा:
"ऐ कूफ़ा वालो! तुमने हुसैन (अ.स.) को बुलाया, फिर उन्हें अकेला छोड़ दिया। आज तुम रसूल (स.अ.व.) के नवासे से जंग कर रहे हो।"
लेकिन किसी ने उनकी बात न मानी।
हुर ने तलवार उठाई और हक़ की राह में लड़ते हुए दुश्मन की सफ़ों को चीर दिया। आख़िरकार ज़ख़्मों से चूर होकर घोड़े से ज़मीन पर गिर पड़े।
उन्होंने पुकारा:
"या अबा अब्दिल्लाह!"
इमाम हुसैन (अ.स.) दौड़कर उनके पास पहुँचे। उनका सर अपनी गोद में रखा, चेहरे से ख़ून साफ़ किया और फ़रमाया:
"ऐ हुर! तुम दुनिया और आख़िरत में आज़ाद हो।"
इसी तरह जनाब हुर (अ.स.) ने अपनी जान इमाम हुसैन (अ.स.) पर क़ुर्बान कर दी और कर्बला के पहले शहीदों में शामिल हो गए।
मजलिस का पैग़ाम:
तौबा का दरवाज़ा आख़िरी सांस तक खुला है।
जब हक़ पहचान में आ जाए, तो उसकी तरफ़ लौटने में देर नहीं करनी चाहिए।
अल्लाह के यहाँ अंजाम देखा जाता है, शुरुआत नहीं।
मुसीबत
अफ़सोस! जब हुर की लाश मैदान में पड़ी थी, उनकी बीवी और बच्चे वहाँ न थे। मगर इमाम हुसैन (अ.स.) ख़ुद उनके सिरहाने आए। जिस इमाम का कोई मददगार न बचा था, वही अपने नए वफ़ादार साथी का आख़िरी सहारा बने।
सलाम हो जनाब हुर (अ.स.) पर!
सलाम हो इमाम हुसैन (अ.स.) पर!
लानत हो यज़ीद और उसके तमाम मददगारों पर।
या हुसैन! या हुसैन! या हुसैन!