DIl kya KEhTa HAi

DIl kya  KEhTa HAi Trading se paisa kaise Banaye #

10/07/2026
05/07/2026

Maviya Agar sahaba e rasul hota to kabhi Maula Ali a,s se Jung nhi karta

बिस्म الله الرحمن الرحيمमुसायब – हज़रत सैयदा सकीना (स.अ.)अज़ादाराने हुसैन!ज़रा तसव्वुर कीजिए... कर्बला का मैदान ख़ामोश ह...
29/06/2026

बिस्म الله الرحمن الرحيم
मुसायब – हज़रत सैयदा सकीना (स.अ.)
अज़ादाराने हुसैन!
ज़रा तसव्वुर कीजिए... कर्बला का मैदान ख़ामोश है। शहीदों के जिस्म रेत पर पड़े हैं। ख़ेमे जल चुके हैं। बच्चे सहमे हुए हैं। उन्हीं बच्चों में एक छोटी-सी मासूम बच्ची है—सैयदा सकीना (स.अ.), जो बार-बार एक ही सवाल करती हैं:
"अम्मा... मेरे बाबा हुसैन कहाँ हैं?"
कोई जवाब नहीं देता। हर तरफ़ आँसू हैं।
रात होती है। शबे-ग़रीबाँ है। भूखी, प्यासी सकीना (स.अ.) कभी जले हुए ख़ेमों की तरफ़ जाती हैं, कभी मैदान-ए-कर्बला की तरफ़। हर आवाज़ पर समझती हैं कि शायद बाबा आ गए...
मगर बाबा तो सज्दे में अपना सर ख़ुदा की राह में क़ुर्बान कर चुके थे।
फिर अहलेबैत (अ.स.) को कैदी बनाकर कूफ़ा और वहाँ से शाम ले जाया गया। रास्ते भर छोटी सकीना (स.अ.) एक ही पुकार लगाती रहीं:
"या बाबा... या हुसैन..."
कहते हैं कि Umayyad Mosque के क़ैदखाने में एक रात सकीना (स.अ.) नींद से घबराकर उठीं और रोने लगीं:
"मुझे मेरे बाबा चाहिए... मैं बाबा के बिना नहीं रह सकती..."
उनके रोने से पूरा क़ैदखाना गूँज उठा। मजबूर होकर ज़ालिमों ने इमाम हुसैन (अ.स.) का मुबारक सर एक तश्त में रखकर उनके सामने ला दिया।
छोटी सकीना (स.अ.) ने कपड़ा हटाया... जैसे ही अपने बाबा का मुबारक चेहरा देखा, मासूम बच्ची फूट-फूटकर रो पड़ी।
उन्होंने सर को सीने से लगाया और कहा:
"बाबा! किसने आपकी सफ़ेद दाढ़ी को ख़ून से रंग दिया? बाबा! किसने आपको मुझसे जुदा कर दिया? बाबा! अब मैं किसे अपना दर्द सुनाऊँ?"
क़ैदखाने की दीवारें भी रो पड़ीं। अहलेबैत (अ.स.) की चीख़ें बुलंद हो गईं।
रिवायतों के अनुसार, इसी ग़म और सदमे में सैयदा सकीना (स.अ.) ने अपने बाबा के सर से लिपटे-लिपटे दुनिया को अलविदा कह दिया।
आह...
एक मासूम बच्ची, जिसने न खिलौने माँगे, न ज़ेवर, न कपड़े...
बस अपने बाबा को माँगती रही...
"या बाबा... या बाबा..."
और आख़िरकार उसी पुकार के साथ अपने बाबा से जा मिली।
السلام علیکِ یا سیدہ سکینہ بنت الحسین (علیہما السلام)
یا حسین... یا حسین... یا حسین...

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीममजलिस का उन्वान:"जनाब हुर (अ.स.) – तौबा से जन्नत तक का सफर"अल्हम्दुलिल्लाह, वस्सलातु वस्सलाम अ...
29/06/2026

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मजलिस का उन्वान:
"जनाब हुर (अ.स.) – तौबा से जन्नत तक का सफर"
अल्हम्दुलिल्लाह, वस्सलातु वस्सलाम अला रसूलिल्लाह मुहम्मद व आले मुहम्मद।
अज़ादाराने हुसैन!
आज हम उस शख़्सियत का ज़िक्र करेंगे, जिसने साबित कर दिया कि अगर इंसान सच्चे दिल से हक़ की तरफ़ लौट आए, तो अल्लाह उसे ऐसा मुकाम देता है कि उसका नाम क़यामत तक इज़्ज़त से लिया जाता है। वह शख़्सियत हैं जनाब हुर इब्न यज़ीद रियाही (अ.स.)।
हुर, कूफ़ा की फ़ौज के एक बहादुर सिपहसालार थे। Ubayd Allah ibn Ziyad ने उन्हें एक हज़ार सवारों के साथ Husayn ibn Ali का रास्ता रोकने के लिए भेजा।
जब हुर का काफ़िला रेगिस्तान में इमाम हुसैन (अ.स.) से मिला, तो सख़्त गर्मी थी। हुर और उनके सिपाही प्यास से बेहाल थे। मगर देखिए इमाम हुसैन (अ.स.) का अख़लाक़! आपने अपने साथियों से फ़रमाया:
"इन सबको पानी पिलाओ, इनके घोड़ों को भी पानी पिलाओ।"
जिसका रास्ता रोकने आए थे, वही उन्हें पानी पिला रहा था।
काफ़िला कर्बला पहुँचा। Battle of Karbala की दसवीं मुहर्रम की सुबह हुर ने देखा कि दुश्मन किसी भी सूरत में इमाम हुसैन (अ.स.) को नहीं छोड़ेगा। उनका ज़मीर जाग उठा। वे बेचैन हो गए। उनके शरीर पर कंपकंपी छा गई।
एक साथी ने पूछा: "हुर! आप जैसे बहादुर को आज क्या हो गया?"
हुर ने जवाब दिया:
"मैं अपने आपको जन्नत और जहन्नम के बीच खड़ा देख रहा हूँ। ख़ुदा की क़सम! मैं जन्नत के अलावा कुछ नहीं चुनूँगा, चाहे मुझे टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाए।"
यह कहकर हुर अपने घोड़े को मोड़कर इमाम हुसैन (अ.स.) के ख़ेमे की ओर बढ़े। सिर झुका हुआ था, आँखों से आँसू बह रहे थे।
उन्होंने अर्ज़ किया:
"मौला! मैं वही हूँ जिसने आपका रास्ता रोका था। क्या मेरी तौबा क़बूल हो सकती है?"
इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया:
"हाँ हुर! अल्लाह ने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली। तुम वैसे ही हुर (आज़ाद) हो, जैसे तुम्हारी माँ ने तुम्हारा नाम रखा था। तुम दुनिया और आख़िरत दोनों में आज़ाद हो।"
यह सुनकर हुर की आँखों से आँसू और तेज़ बहने लगे। उन्होंने सबसे पहले मैदान में जाने की इजाज़त माँगी।
वे दुश्मन की फ़ौज के सामने पहुँचे और पुकारकर कहा:
"ऐ कूफ़ा वालो! तुमने हुसैन (अ.स.) को बुलाया, फिर उन्हें अकेला छोड़ दिया। आज तुम रसूल (स.अ.व.) के नवासे से जंग कर रहे हो।"
लेकिन किसी ने उनकी बात न मानी।
हुर ने तलवार उठाई और हक़ की राह में लड़ते हुए दुश्मन की सफ़ों को चीर दिया। आख़िरकार ज़ख़्मों से चूर होकर घोड़े से ज़मीन पर गिर पड़े।
उन्होंने पुकारा:
"या अबा अब्दिल्लाह!"
इमाम हुसैन (अ.स.) दौड़कर उनके पास पहुँचे। उनका सर अपनी गोद में रखा, चेहरे से ख़ून साफ़ किया और फ़रमाया:
"ऐ हुर! तुम दुनिया और आख़िरत में आज़ाद हो।"
इसी तरह जनाब हुर (अ.स.) ने अपनी जान इमाम हुसैन (अ.स.) पर क़ुर्बान कर दी और कर्बला के पहले शहीदों में शामिल हो गए।
मजलिस का पैग़ाम:
तौबा का दरवाज़ा आख़िरी सांस तक खुला है।
जब हक़ पहचान में आ जाए, तो उसकी तरफ़ लौटने में देर नहीं करनी चाहिए।
अल्लाह के यहाँ अंजाम देखा जाता है, शुरुआत नहीं।
मुसीबत
अफ़सोस! जब हुर की लाश मैदान में पड़ी थी, उनकी बीवी और बच्चे वहाँ न थे। मगर इमाम हुसैन (अ.स.) ख़ुद उनके सिरहाने आए। जिस इमाम का कोई मददगार न बचा था, वही अपने नए वफ़ादार साथी का आख़िरी सहारा बने।
सलाम हो जनाब हुर (अ.स.) पर!
सलाम हो इमाम हुसैन (अ.स.) पर!
लानत हो यज़ीद और उसके तमाम मददगारों पर।
या हुसैन! या हुसैन! या हुसैन!

हबीब इब्ने मज़ाहिर 75 साल के बूढ़े इंसान हैं इमाम हुसैन के बचपन के दोस्त हैं। कुफ़ा और उसके आसपास बसे बनी असदक़बीले से थ...
29/06/2026

हबीब इब्ने मज़ाहिर 75 साल के बूढ़े इंसान हैं इमाम हुसैन के बचपन के दोस्त हैं। कुफ़ा और उसके आसपास बसे बनी असद
क़बीले से थे आपका भरा पूरा परिवार था। दौलत, इज़्ज़त सब थी।

इमाम हुसैन ने अपने दोस्त हबीब को एक ख़त भेजा। उसमें लिखा कि

*मुख़्तसर लाइन लिख रहा हूँ* ख़त की

“ऐ हबीब! अगर हमारी मदद कर सकते हो तो आ जाओ।”

जब हबीब ने यह ख़त पढ़ा तो उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने तुरंत फैसला किया कि चाहे जान चली जाए, इमाम का साथ नहीं छोड़ेंगे।

लोगों ने कहा इस उम्र में क्या करोगे? कुछ न कर पाया तो "उन तीरों के सामने खड़ा हो जाऊंगा जो हुसैन की तरफ चलेंगे।" उन्होंने जो कहा कर दिखाया। दोस्ती के रिश्ते को निभाया और आशूर के रोज़ इमाम हुसैन की नुसरत में अपनी जान दे दी

हबीब रात के अँधेरे में कूफ़ा से निकले ताकि इब्न ज़ियाद के सिपाहियों से बच सकें। रास्तों से बचते-बचाते वे 7 मुहर्रम को करबला पहुँचे। इमाम हुसैन ने उन्हें देखकर बहुत ख़ुशी ज़ाहिर की और गले लगाया

हबीब ने इमाम से इजाज़त लेकर अपनी क़ौम बनी असद को मदद के लिए बुलाने की कोशिश की। कुछ लोग तैयार भी हुए, लेकिन इब्न ज़ियाद की फ़ौज को ख़बर हो गई और उन्होंने रास्ता रोक दिया। इसलिए वह मदद करबला तक नहीं पहुँच सकी

लगभग 75 के बूढ़े हबीब मैदान में उतरे। उन्होंने बड़ी बहादुरी से जंग की। उन्होंने यज़ीदी फ़ौज का बहादुरी से मुक़ाबला किया, उनके सिर पर वार किया गया, उन्हें भाले से ज़ख़्मी किया गया और उन्हें शहीद कर दिया गया। उनकी शहादत पर इमाम हुसैन बहुत ग़मगीन हुए और फ़रमाया

“मैं तुम्हारी शहादत पर अल्लाह से अज्र चाहता हूँ

कर्बला के शहीदों में इमाम हुसैन के एक और साथी हैं बशीर बिन अम्र। किंदा क़बीले से थे। मक्का से तक़रीबन 11 किलोमीटर दूर हादरामौत के रहने वाले थे। इमाम हुसैन के मक्का से कूफा की तरफ कूच की ख़बर मिली तो अपने बेटों को लेकर घर से निकल पड़े।

रेगिस्तान के सफर थे। रास्ते में एक जवान बेटा बिछड़ गया।

फिर भी जैसे-तैसे, गिरते-पड़ते, आशूर के दिन कर्बला पहुंचे। वहां अजीब मंज़र देखा। इमाम हुसैन और उनके साथी भूखे, प्यासे दुश्मनों से घिरे थे। हर तरफ मौत का हंगाम था

ऐन लड़ाई के वक़्त किसी ने खोए बेटे की ख़बर आकर दी। बताया कि तुम्हारा बेटा रै के पास गिरफ्तार है। लोगों ने जाकर बेटे को छुड़ा लेने की सलाह दी।

इमाम हुसैन को मसले की ख़बर हुई तो उन्होंने बशीर को अपनी बैयत और तमाम ज़िम्मेदारियों से आज़ाद कर दिया। उनसे कहा कि "अल्लाह तुम पर रहम करे। बेटे की जान बचाना तुमपर फर्ज़ है, इसलिए तुम जाओ।लेकिन बशीर ने इमाम को मुसीबत में छोड़कर जाने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि "मैं आपको इस हाल में छोड़कर जाऊं तो जंगली दरिंदे मुझे निगल लें।

आपके साथ यहां मुट्ठी भर लोग हैं। मुझे रास्ते भर हर क़ाफिले में आपकी सूरत नज़र आएगी। मैं उस ज़िल्लत के साथ कैसे ज़िंदा रहूंगा?"
बशीर वापस नहीं गए। छोटे बेटे को इस ताक़ीद के साथ रवाना किया कि दाम चुकाकर भाई को रिहा कराओ और वापस यहीं आना है। बेटों की वापसी से पहले कर्बला क़त्लगाह बन गई

10 मुहर्रम (आशूरा) के रोज़ जब मैदान-ए-करबला में जंग ख़त्म हुई, तो इब्न सअद की फ़ौज अपने मारे गए सिपाहियों को दफ़्न करके वहाँ से रवाना हो गई। मगर अफ़सोस, रसूल अल्लाह के जिगर के टुकड़े इमाम हुसैन और उनके वफ़ादार साथियों के मुक़द्दस जिस्म तीन दिन तक तपते हुए रेगिस्तान में पड़े रहे

13 मुहर्रम को कूफा के क़रीब आबाद बनी असद के लोग जो हबीब इब्न मज़ाहिर का क़बीला था वो शुहदा को दफ़्न करने के लिए करबला पहुँचे। मगर लाशें इतनी ज़ख़्मी थीं कि उनके लिए शहीदों की पहचान करना आसान न था

Address

West Jakarta

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when DIl kya KEhTa HAi posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to DIl kya KEhTa HAi:

Shortcuts

Share

l="false"> Add listing
  • Login
  • Subscribe

    We will notify you when anything happens in West Jakarta.