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महिला आरक्षण पर सियासत गरम: ‘छाती पीटने वालों’ से पूछा—अपने घर में कितनी हिस्सेदारी?”Jilanazar News Jila Najar  fans   प...
17/04/2026

महिला आरक्षण पर सियासत गरम: ‘छाती पीटने वालों’ से पूछा—अपने घर में कितनी हिस्सेदारी?”

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सुबह का प्रणाम सिर्फ परंपरा नहींबल्कि अपनेपन का एहसास भी हैताकि रिश्ते भी जिंदा रहेंऔर यादें भी बनी रहें.जय श्रीराधे कृष...
17/04/2026

सुबह का प्रणाम सिर्फ परंपरा नहीं
बल्कि अपनेपन का एहसास भी है
ताकि रिश्ते भी जिंदा रहें
और यादें भी बनी रहें.
जय श्रीराधे कृष्णा
सुप्रभात
🌹🙏🌹
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…लेकिन इन पर कैसे लगे लगामभारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य में नक्सलवाद या माओवाद केवल बंदूकों की गूंज भर नहीं रहा, बल्कि वह...
16/04/2026

…लेकिन इन पर कैसे लगे लगाम

भारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य में नक्सलवाद या माओवाद केवल बंदूकों की गूंज भर नहीं रहा, बल्कि वह एक गहरी वैचारिक छाया के रूप में भी उपस्थित रहा है। जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों में सक्रिय इस उग्र विचारधारा ने जहां एक समय भय और हिंसा का तांडव रचा, वहीं शहरी तंत्र—विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, मीडिया और सामाजिक संगठनों—में भी अपनी जड़ें जमाने का प्रयास किया। यह केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं, बल्कि बौद्धिक और संस्थागत संतुलन के लिए भी गंभीर प्रश्न है।
इतिहास के पन्नों में झांकें तो 1969 के राजनीतिक घटनाक्रम ने इस प्रवाह को नई दिशा दी। सत्ता के समीकरणों ने वैचारिक समझौतों को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप शैक्षणिक और शोध संस्थानों में एक खास विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। विचारों की विविधता लोकतंत्र की आत्मा होती है, परंतु जब कोई एक दृष्टिकोण संस्थागत रूप से प्रभुत्व स्थापित करने लगे, तो वह संतुलन को बाधित करता है।
हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों की सतत कार्रवाई और सरकारी रणनीतियों के चलते नक्सलवाद का भौतिक स्वरूप काफी हद तक क्षीण हुआ है। गृहमंत्री द्वारा इसकी समाप्ति की घोषणा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। परंतु यह समझना आवश्यक है कि किसी विचारधारा का अंत केवल उसके सशस्त्र रूप के समाप्त होने से नहीं होता। वह अपने बौद्धिक और वैचारिक रूप में जीवित रह सकती है, और यही उसकी वास्तविक चुनौती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि उन स्रोतों की पहचान की जाए, जहां से ऐसी उग्र वैचारिकी को पोषण मिलता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए भी यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र विरोधी और हिंसा प्रेरित विचारों को वैधता न मिले। साथ ही, समाज को भी सजग रहकर ऐसे तत्वों को वैचारिक समर्थन देने से बचना होगा।
अंततः, समाधान केवल दमन में नहीं, बल्कि संतुलित विमर्श, सशक्त शिक्षा और जागरूक समाज में निहित है। यदि इन पहलुओं पर गंभीरता से कार्य नहीं किया गया, तो भले ही जंगलों की बंदूकें शांत हो जाएं, विचारों की आग किसी नए रूप में फिर भड़क सकती है।
• सन्तकुमार
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भोले की खरी-खरीनारी शक्ति या वेटिंग लिस्ट?अरे भैया, भोले आ गए हैं! और आज भोले के मन में बड़ा भारी सवाल कुलबुला रहा है—ये...
16/04/2026

भोले की खरी-खरी

नारी शक्ति या वेटिंग लिस्ट?

अरे भैया, भोले आ गए हैं! और आज भोले के मन में बड़ा भारी सवाल कुलबुला रहा है—ये “नारी शक्ति वंदन” है या “नारी शक्ति इंतजार योजना”? क्योंकि जितना वंदन हो रहा है, उतना तो मंदिरों में भी नहीं होता, और जितना इंतजार करवाया जा रहा है, उतना तो सरकारी फाइल भी नहीं करती!

तो साहब, 2023 में बड़े धूमधाम से ढोल-नगाड़े बजाकर महिला आरक्षण का संविधान संशोधन पास हुआ। लगा कि अब तो राजनीति की चौखट पर नारी शक्ति की धमक सुनाई देगी। लेकिन 2026 आते-आते कहानी में नया ट्विस्ट—अब तीन और बिल! भोले को तो ये पूरा मामला वैसा लग रहा है जैसे शादी तय हो जाए, बारात भी आ जाए, पर दूल्हा हर बार बोले—“अरे पहले मंडप का रंग तो बदल लें!”

असलियत यह है कि 1996 से लेकर आज तक ये “नारी शक्ति” राजनीति के बरामदे में खड़ी-खड़ी थक गई है। हर बार नेता जी आते हैं, कहते हैं—“बस अगली बार पक्का!” और अगली बार फिर वही पुराना वादा नए पैकेज में। भोले सोचते हैं, अगर वादों से ही सशक्तिकरण होता, तो देश की हर महिला आज प्रधानमंत्री होती!

अब सरकार का नया गणित सुनिए—पहले लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करेंगे, फिर उसमें 33% महिलाओं को देंगे। विपक्ष कह रहा है—“अरे भाई, OBC और दलित महिलाओं का अलग कोटा भी जोड़ो।” मतलब सीधी बात—नारी शक्ति कम, सीटों की गिनती ज्यादा महत्वपूर्ण है। जैसे कोई मिठाई बांटने से पहले डिब्बे का डिजाइन तय करता रहे, पर मिठाई कब देगा, ये कोई नहीं बताता।

भोले की नजर में ये “नारी शक्ति वंदन” अब एक राजनीतिक जुमला बन चुका है—चुनाव आते ही मंच पर चढ़ जाता है, और चुनाव जाते ही परदे के पीछे। भाषणों में महिलाएँ “शक्ति” हैं, लेकिन टिकट बांटने में वही पुराना समीकरण—“भाई, जीताऊ कौन है?”

और सबसे मजेदार बात—2029 तक इंतजार! अरे भाई, ये सशक्तिकरण है या रेलवे की वेटिंग लिस्ट, जो कन्फर्म ही नहीं हो रही?

भोले तो बस इतना जानते हैं—नारी शक्ति को किसी परिसीमन, जनगणना या नए बिल की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो सिर्फ नीयत की। पर यहाँ नीयत भी राजनीति के साथ गठबंधन करके बैठी है।

चलते-चलते भोले का एक सीधा सवाल—
अगर नारी शक्ति इतनी ही पूजनीय है, तो उसे हर बार “अगली बार” का प्रसाद क्यों दिया जाता है?

सोचिएगा जरूर… क्योंकि भोले तो कह गए, अब बारी आपकी है!
• सेन्टी गुरु

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 #लखनऊ : CM योगी अब शेरों वाली कुर्सी पर बैठेंगेJilanazar News Jila Najar
17/01/2026

#लखनऊ : CM योगी अब शेरों वाली कुर्सी पर बैठेंगे

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06/06/2025

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आपका मौन वाणी से अधिक प्रभावी था,🔹आपका स्नेह अनुशासन में लिपटा हुआ आशीर्वाद।🔹आपने जीवन नहीं जिया - बल्कि हमें जीना सिखाय...
04/06/2025

आपका मौन वाणी से अधिक प्रभावी था,
🔹आपका स्नेह अनुशासन में लिपटा हुआ आशीर्वाद।
🔹आपने जीवन नहीं जिया - बल्कि हमें जीना सिखाया।
🔹आज भी आपके शब्द, आपके विचार हृदय में गूंजते हैं जैसे दिव्य मंत्र।
🔹आपकी पुण्यतिथि पर श्रृद्धा सुमन अर्पित 🔹
🙏🙏🙏🌹🌹🌹

कोविड के बढ़ते मामलों पर दिल्ली HC सख्त, केंद्र से मांगी रिपोर्ट
02/06/2025

कोविड के बढ़ते मामलों पर दिल्ली HC सख्त, केंद्र से मांगी रिपोर्ट

जिला नजर न्यूज़ नेटवर्क के सौजन्य से 02 जून को शाम 8:30 बजे फेसबुक लाईव कार्यक्रमhttps://www.facebook.com/share/1AFQBwSzM...
01/06/2025

जिला नजर न्यूज़ नेटवर्क के सौजन्य से 02 जून को शाम 8:30 बजे फेसबुक लाईव कार्यक्रम
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