16/04/2026
भोले की खरी-खरी
नारी शक्ति या वेटिंग लिस्ट?
अरे भैया, भोले आ गए हैं! और आज भोले के मन में बड़ा भारी सवाल कुलबुला रहा है—ये “नारी शक्ति वंदन” है या “नारी शक्ति इंतजार योजना”? क्योंकि जितना वंदन हो रहा है, उतना तो मंदिरों में भी नहीं होता, और जितना इंतजार करवाया जा रहा है, उतना तो सरकारी फाइल भी नहीं करती!
तो साहब, 2023 में बड़े धूमधाम से ढोल-नगाड़े बजाकर महिला आरक्षण का संविधान संशोधन पास हुआ। लगा कि अब तो राजनीति की चौखट पर नारी शक्ति की धमक सुनाई देगी। लेकिन 2026 आते-आते कहानी में नया ट्विस्ट—अब तीन और बिल! भोले को तो ये पूरा मामला वैसा लग रहा है जैसे शादी तय हो जाए, बारात भी आ जाए, पर दूल्हा हर बार बोले—“अरे पहले मंडप का रंग तो बदल लें!”
असलियत यह है कि 1996 से लेकर आज तक ये “नारी शक्ति” राजनीति के बरामदे में खड़ी-खड़ी थक गई है। हर बार नेता जी आते हैं, कहते हैं—“बस अगली बार पक्का!” और अगली बार फिर वही पुराना वादा नए पैकेज में। भोले सोचते हैं, अगर वादों से ही सशक्तिकरण होता, तो देश की हर महिला आज प्रधानमंत्री होती!
अब सरकार का नया गणित सुनिए—पहले लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करेंगे, फिर उसमें 33% महिलाओं को देंगे। विपक्ष कह रहा है—“अरे भाई, OBC और दलित महिलाओं का अलग कोटा भी जोड़ो।” मतलब सीधी बात—नारी शक्ति कम, सीटों की गिनती ज्यादा महत्वपूर्ण है। जैसे कोई मिठाई बांटने से पहले डिब्बे का डिजाइन तय करता रहे, पर मिठाई कब देगा, ये कोई नहीं बताता।
भोले की नजर में ये “नारी शक्ति वंदन” अब एक राजनीतिक जुमला बन चुका है—चुनाव आते ही मंच पर चढ़ जाता है, और चुनाव जाते ही परदे के पीछे। भाषणों में महिलाएँ “शक्ति” हैं, लेकिन टिकट बांटने में वही पुराना समीकरण—“भाई, जीताऊ कौन है?”
और सबसे मजेदार बात—2029 तक इंतजार! अरे भाई, ये सशक्तिकरण है या रेलवे की वेटिंग लिस्ट, जो कन्फर्म ही नहीं हो रही?
भोले तो बस इतना जानते हैं—नारी शक्ति को किसी परिसीमन, जनगणना या नए बिल की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो सिर्फ नीयत की। पर यहाँ नीयत भी राजनीति के साथ गठबंधन करके बैठी है।
चलते-चलते भोले का एक सीधा सवाल—
अगर नारी शक्ति इतनी ही पूजनीय है, तो उसे हर बार “अगली बार” का प्रसाद क्यों दिया जाता है?
सोचिएगा जरूर… क्योंकि भोले तो कह गए, अब बारी आपकी है!
• सेन्टी गुरु
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