24/04/2026
आज यू ही अचानक से स्मृतियां परेशान करने लगी, बहुत कुछ धुंधली यादें अनायास घूमने लगी जहन में मेरे नश्तर की तरह। जिन से न तो उबर पा रही थी न ही बाहर आ पा रही थी, धीरे-धीरे तस्वीरें सामने आ रही थी। एक ही भाई उस का अनायास जाना, मेरा सब से प्रिय, फिर मां उस के बाद, फिर पिता फिर खालीपन जो कभी भर न पाया। कभी स्वप्न में भी बस अपने ऊपर गुस्सा आता था। सब जिम्मेदारी अपने ऊपर, पर ऊपर न नीचे कहीं थी ही नहीं। अपना परिवार, अपना संसार इस में लगी रही लगातार नौकरी के साथ। आसान न था, पर शायद मां की कर्मठता और पिता का प्यार संबल देते रहे। बड़ी आसानी से लोग, सिचुएशन, रिश्ते छूटते रहे और हम जीने की कला में माहिर हो गए। शायद ऐसा ही होता है। आज मन दुखी था तभी कृष्ण भगवान की ओर देख कर लगा उन का तो जनम से ही सब छूटना शुरू हो गया मां पिता गोकुल, राधा सब कुछ। वो तो सक्षम थे फिर भी। उत्तर भी वही मिला पर उन की मुस्कान, उन की वेदना, उन की कर्तव्य परायण भावना कभी न बदली। हम तो सेवक है, और हमारा जीवन तो कर्म निर्धारित है। सब अच्छा हो इसी कल्पना में जीते हैं, पर ऐसा संभव भी तो नहीं। स्वप्न न ही देखे, हकीकत से रुबरु हो ले, यही जीवन की वास्तविकता है। शायद आप की सोच भिन्न हो, पर उम्र के बढ़ने से दार्शनिकता तो बरती है, पर हकीकत नहीं अधूरी है पाती। फिर मिलेंगे।