30/11/2025
. Dear
युवा नेता
और मेरे जैसे सपने देखने वाले कार्यकर्ता…
सच मानो — राजनीति का वो सुनहरा दौर अब बीत चुका है।
जब किसी गाँव का किसान, घर आए हुए एक साधारण मुलायम सिंह को नेता बना देता था…
जब चौधरी चरण सिंह अपने बेटे को योग्य न समझकर एक कार्यकर्ता को राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर देते थे…
जब रैली में बाँस लगाने वाला नौजवान टिकट पा लेता था…
और जब डाकू फूलन, जन-नेता “फूलन देवी” बन जाती थीं।
वो राजनीति इंसान उठाती थी — कुर्सी नहीं।
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🔥 लेकिन आज का दौर बदल चुका है…
अब राजनीति “पूँजी + नेटवर्क + वंशवाद” के फॉर्मूले पर चल रही है।
जिन जिला-स्तरीय नेताओं के पीछे आप
भैया—साहब—चाचा कहते हुए सालों से घूम रहे हो…
पहले वे अपने बच्चों का भविष्य सेट करेंगे—
अफसरों से रिश्ते, शहर में कॉलेज, अस्पताल, होटल…
और आप?
आप अपने दरवाजे के सामने एक सरकारी नल लगवाने के लिये भी महीनों चक्कर लगाओगे।
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🎯 कड़वा सच — टिकट उनका बेटा लेगा, आपका नहीं
आपने गाँव-गाँव दौड़ा,
लोगों के घर गालियाँ खाईं,
रैलियों में भीड़ जुटाई,
नेताजी की गाड़ी पौंछी,
पुतला दहन के मुक़दमे झेले…
लेकिन टिकट?
चाहे उनका बेटा कभी गाँव/कस्बे में गया भी न हो —
उसका टिकट “जाति + पैसे” पर तय है।
क्योंकि अब पार्टी विचारधारा पर नहीं —
चंदे पर चलती है।
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💰 ऊपर वाले नेता मेहनत नहीं — पैसा देखते हैं
कौन कितना चंदा देता है —
वही उतना सगा होता है।
विचारधारा?
वो सिर्फ़ कार्यकर्ता को भावुक रखने का पट्टा है —
लाल, हरा, नीला, भगवा कुछ भी लिख दो।
लेकिन चंदा लेते वक्त किसी की विचारधारा नहीं देखी जाती।
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⚠️ और आप?
आप उन्हीं नेताओं के लिये लड़ पड़ते हो।
पार्टी से भिड़ जाते हो।
अपने ही लोगों से झगड़ लेते हो।
पर जैसे ही किसी केस-मुक़दमे का दिन आया—
नेता अपना नाम हटा देगा
और आपको बलि का बकरा बना देगा।
आपके हिस्से आएगा:
एक फोटो, एक भौकाल,
शादी में एक प्लेट पनीर,
और गाड़ी में घूमने का एक चक्कर।
बस।
सच यही है।
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🙏 नेताओं से भी एक बात
ये पोस्ट सिर्फ़ सच्चाई कहती है—
फोटो भौकाल के लिये हैं, किसी पर व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं।
लेकिन राजनीति को आईना दिखाना ज़रूरी है।
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📌 अंतिम बात
राजनीति से डरिये मत—
राजनीति से जुड़िये, सीखिये, बोलिये।
पर किसी भी नेता की मजबूरी,
या उसके बेटे के भविष्य के लिये
अपनी इज़्ज़त की धज्जियाँ मत उड़वाइये।
— नरेंद्र बुलबुल