17/04/2026
आगरा में अखबार मतलब अमर उजाला... 78 वर्षों से प्रामाणिक खबरों का कारवां
आगरा की सुबह केवल सूरज की किरणों या बेड़ई-जलेबी की खुशबू से नहीं होती, बल्कि दरवाजे पर गिरने वाले 'अमर उजाला' के साथ होती है। आज भी शहर में हजारों लोग ऐसे हैं जिनका दिन इस अखबार के पन्ने पलटे बिना शुरू नहीं होता। अगर किसी दिन अखबार न मिले, तो उन्हें एक अजीब सी 'एंजायटी' (बेचैनी) होने लगती है। यह बेचैनी किसी लत की नहीं, बल्कि उस भरोसे की है जो अमर उजाला ने आगरा के लोगों के दिलों में 78 सालों में कमाया है।
18 अप्रैल 1948 को आगरा के कचहरी घाट से शुरू हुआ यह कारवां आज अपनी 78वीं वर्षगांठ मना रहा है और पूरी ऊर्जा के साथ अपने शताब्दी वर्ष की ओर कदम बढ़ा रहा है।
आजादी के तुरंत बाद, जब स्वतंत्र भारत अपने लिए एक नई दिशा तलाश रहा था, तब पत्रकार स्व. डोरीलाल अग्रवाल और स्व. मुरारीलाल माहेश्वरी ने अमर उजाला की नींव रखी। सीमित संसाधन थे। असीमित हौसला था। महज 4 पन्नों के साथ शुरू हुआ यह अखबार कोई व्यावसायिक उद्यम नहीं था, बल्कि आम जनता की आवाज को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने का एक मिशन था।
शुरुआत से ही इस अखबार ने खुद को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने के साथ-साथ अपनी जड़ों (आगरा) से मजबूती से जोड़े रखा।
78 साल से वो राज, जो बनाता है सरताज...सटीक खबरें
कई अखबार आए और गए, लेकिन अमर उजाला आगरा में सरताज कैसे बना रहा? इस सवाल का एक ही ठोस जवाब है। सटीक खबरें। आज के दौर में जहां 'सबसे पहले' खबर देने की अंधी दौड़ और 'क्लिकबेट' का शोर है, अमर उजाला ने हमेशा तथ्यों की शुद्धता को सर्वोपरि रखा है।
अमर उजाला की इस प्रामाणिकता के पीछे की वजह है उसकी कार्यप्रणाली। रिपोर्टर द्वारा लाई गई खबर को सीधे छापने के बजाय, डेस्क पर बैठे अनुभवी उप-संपादक उसे तथ्यों की कसौटी पर कसते हैं। कोई भी खबर तब तक अखबार का हिस्सा नहीं बनती, जब तक उसके स्रोतों की पूरी तरह से पुष्टि न कर ली जाए। हर खबर के सभी पहलुओं और पक्षों को पूरी ईमानदारी के साथ पाठकों के सामने रखना अमर उजाला का ध्येय रहा है। क्योंकि
सनसनीखेज पत्रकारिता चंद दिनों की मोहलत देती है, लेकिन सटीक पत्रकारिता 78 सालों का सरताज बनाती है।
हाइपर-लोकल पत्रकारिता का जनक
आगरा के लिए 'अमर उजाला' का मतलब सिर्फ देश-दुनिया की खबरें नहीं है। यह शहर की धड़कन है।
चाहे वो कोठी मीना बाजार प्रकरण हो या राजा मंडी लाभचंद मार्केट। यमुना के प्रदूषण का मुद्दा हो, कॉलोनियों में पानी-बिजली की किल्लत हो, या ताजनगरी की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की बात हो। अपराध, खेल जगत से लेकर उद्योग धंधों की बात हो अमर उजाला ने हमेशा एक जिम्मेदार प्रहरी की भूमिका निभाई है। स्थानीय मुद्दों को इतनी गहराई और प्रमुखता से उठाने की शैली ने ही इसे हर आगरा वालों के परिवार का सदस्य बना दिया है।
इस अखबार में एक से बढ़कर एक पत्रकार रहे। जिनकी कलम का लोहा देश और दुनिया ने माना। जिन्होंने अपने खून पसीने और मेहनत से अखबार की सुर्खियों को अमर कर दिया। जिन्हें आज भी आर्काइव में देखा जा सकता है।
शताब्दी की ओर बढ़ते अमर उजाला के कदम
18 अप्रैल 2026 को 78 वर्ष पूरे कर रहा अमर उजाला इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अगर नीयत साफ हो और खबरों में सटीकता हो, तो कोई भी माध्यम पुराना नहीं पड़ता।
तकनीक कितनी भी बदल जाए, माध्यम प्रिंट से डिजिटल हो जाए, लेकिन पाठक आज भी उसी खबर पर भरोसा करता है जिस पर 'अमर उजाला' की मुहर लगी हो। आगरा की पत्रकारिता का यह वटवृक्ष अपनी जड़ों को और गहरा करते हुए, पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने 100वें साल (शताब्दी) की ओर बढ़ रहा है।
आगरा शहर और अमर उजाला का यह अटूट रिश्ता बताता है कि जब पत्रकारिता व्यवसाय न रहकर एक 'इंटेलेक्चुअल हैबिट' बन जाए, तो वह पीढ़ियों को दिशा दिखाती है।
अमर उजाला के 78वें स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर सभी सुधी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
देश दीपक तिवारी
वरिष्ठ उप संपादक, अमर उजाला
जिलाध्यक्ष, उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन
सदस्य, ताज प्रेस क्लब आगरा