24/03/2026
उड़ गया वह भी हवा में खाक बनकर ।
क्या गया लेकर अधिक चालाक बनकर ॥
भाग्य में जिसके लिखा था डूबना ही।
फायदा पाया न वह तैराक बनकर ॥
क्या हुआ यदि है नही खत का चलन अब।
तुम चले आते पते पर डाक बनकर ॥
माँ -बहन जिसको सुखातीं ओट में हैं ।
वस्त्र बाहर सज रहा पोशाक बनकर ॥
चापलूसी का जमाना है ' किशन' यह ।
क्या मिला अब तक तुम्हें बेबाक बनकर ॥
कृष्ण कुमार मिश्र ' किशन '
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