01/05/2026
मन की लड़ाई
एक बार श्रमण भगवान् महावीर को नमस्कार करके मगधनरेश श्रेणिक ने प्रश्न किया,—“भगवान् ! आज आग के दर्शन करने के लिए आते समय मार्ग में एक महान् तपस्वी के दर्शन हुए। बड़ी उग्र साधना कर रहे थे ! सूर्य की ओर भुजाएँ ऊँची फैलाए मेरु की तरह स्थिर, अचल, कायोत्सर्ग मुद्रा, ध्यान में लीन, नासाग्र दृष्टि ! मुखचन्द्र पर अद्भुत समता और अपार शान्ति भलक रही थी। कितना महान् होगा, उनका तपश्चरण ! वह उग्र तपस्वी किस उत्तम गति को प्राप्त करेंगे ?”
“राजन् ! जिस तपस्वी मुनि को तुमने देखा है, वह यदि अभी, इसी क्षण मरण करे, तो सातवाँ नरक भूमि को प्राप्त कर सकता है।”
‘इतनी उग्र तपः साधना और सातवाँ नरक ! जिसका रोम-रोम शान्ति और साधना में लीन है, वह साधक मरकर सातवाँ नरक-भूमि में जाएगा !’ श्रेणिक को अपने कानों पर विश्वास नहीं आ रहा था। “प्रभु ! मैं यह क्या सुन रहा हूँ। मेरे देखने में और आपके कहने में बड़ी विचित्र विसंगति है। बहुत-कुछ सोचने पर भी संगति बैठ नहीं रही है !”
“राजन् ! तुम ठीक ही सुन रहे हो ! इसमें विसंगति जैसा कुछ नहीं है । यदि वह इस समय काल-धर्म को प्राप्त हो, तो छठी नरक-भूमि में जा सकता है !”
‘यह कैसे ? सातवीं से छठी नरक भूमि ?’
“हाँ, राजन् ! अभी पाँचवीं नरक-भूमि के योग्य उसके कर्म-वन्ध हो रहे हैं !”
श्रेणिक इस अनूठी पहेली में उलझ गया ! विचित्र कुतूहल और अद्भुत आश्चर्य ! प्रभु से पुनः पूछने लगा— “प्रभु ! अब —?”
“अब उसके कर्म चौथी नरक-भूमि के योग्य है ।”
प्रश्नोत्तर की श्रृंखला आगे बढ़ती रही और कुछ ही क्षणों में तीसरी, दूसरी और प्रथम नरक-भूमि तक पहुँचते-पहुँचते, अब गति ऊपर की ओर बढ़ने लगी ।
इस आश्चर्यकारक उतार-चढ़ाव पर श्रेणिक का मन विस्मय-विमुग्ध हो उठा था । फलस्वरूप उसकी जिज्ञासा मुखरित होती गई—“प्रभु ! अब ?” और भगवान् की समाधान-परक दिव्य-दृष्टि पापकर्मी के प्रति होने वाले उस आन्तरिक अभियान के सम्बन्ध में क्षण-क्षण की सूचना दे रही थी, उस महान् अभियान की उत्तरोत्तर शक्तिशाली चढ़ाई का हाल सुना रही थी—“श्रेणिक ! अब वह साधक देवभूमि तक पहुँच गया है । यदि इसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाए, तो वह सौधर्म कल्प का समृद्धिशाली देव बन सकता है । उसका अभियान आगे बढ़ रहा है, लो, वह और ऊँचाई पर पहुँच गया । ब्रह्म-कल्प से भी आगे और आगे ही आगे … भूमिकाएँ क्षण-क्षण बदल रही हैं ।”
“प्रभु ! अब उस साधक की क्या स्थिति है ?” —श्रेणिक ने प्रश्न किया ।
“अब वह कल्प और प्रेवेयक देवलोक की भूमिका से भी ऊपर चला गया है । …और अब वह सर्वार्थसिद्धि की भूमिका पर पहुँच चुका है ।” …प्रभु का उत्तर पूरा होते-होते तो आकाश में देववुन्दुभि बज उठी । देव-देवियों के वृन्द-पर-वृन्द पुष्प-वर्षा करते हुए पृथ्वी पर उतरे आ रहे थे, वीतराग प्रसन्नचन्द्र केवली की जय-जयकार बोल रहे थे । श्रेणिक ने यह सब देखा, तो चकित और भ्रमित ! …”प्रभु ! यह क्या हो रहा है ? कहाँ नरक, कहाँ स्वर्ग और अब कहाँ केवलज्ञान कुछ ताल-मेल बैठ ही नहीं रहा है इसमें ?”
“राजन् ! वह मनोभूमि पर छिड़े जा रहे विकल्प-युद्ध में विजय पा चुका है, उसे केवलज्ञान प्राप्त हो गया है । और यह सब कैवल्य महोत्सव का उपक्रम किया जा रहा है !”
“प्रभु ! इस रहस्यमयी भाषा को मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि कुछ क्षण पहले जो साधक सातवीं नरकभूमि में जाने योग्य कर्म कर रहा था, वह कुछ ही क्षणों में ऊपर उठा, और ऐसा उठा कि वीतराग-सर्वज्ञ हो गया, आपके समान बन गया। यह सब कैसे हुआ? क्या रहस्य है इसका! यह आपका भक्त और समूची परिषद् जिज्ञासु नजरों से सत्य को दोह रही है, कृपया उसे स्पष्ट करके दिखावै का अनुग्रह करें?”
“राजन् ! जिस समय तुम उस साधक को वन्दना करके वहाँ आ रहे थे, बस, तभी उसको मनोभूमि में एक भयंकर युद्ध छिड़ गया !”
“कैसा युद्ध किसके साथ युद्ध ?”
प्रभु ने मानव मन की आन्तरिक भूमिका का चित्र स्पष्ट करते हुए कहा—“राजन् ! वह साधक और कोई नहीं, प्रसन्न-चन्द्र राजर्षि है। जब वह ध्यानावस्था में लीन खड़े थे, तो राजर्षि के कानों में परस्पर बात करते हुए दो सैनिकों की ध्वनि टकराई कि “देखो, इस प्रसन्नचन्द्र राजा ने अपने अल्प-वयस्क पुत्र के असमर्थ कन्धों पर राज्य-भार डाल कर दीक्षा ग्रहण कर ली। अब पीछे से शत्रु राजा ने बालक राजा को कमजोर एवं दुर्बल समझकर राज्य पर आक्रमण कर दिया है, भयंकर युद्ध छिड़ गया है, शत्रु सेनाएँ आगे बढ़ चुकी हैं। राजधानी सब ओर से घिर चुकी है। बस, कुछ ही समय में प्रसन्नचन्द्र राजा का पुत्र युद्ध-भूमि से उलटे पाँव भाग छूटेगा या वह वहीं समाप्त हो जाएगा। प्रसन्नचन्द्र के परंपरागत राज्य और कुल का सर्वनाश अब निकट है।” बस, इतना सुनना था कि ध्यानावस्था में खड़े प्रसन्नचन्द्र राजर्षि का मन विचलित हो गया । वह वीतराग भूमिका से हटकर राग-द्वेष की भूमिका की ओर दौड़ पड़ा । मन-ही-मन घोर युद्ध शुरु हो गया । बाहर में उसकी देह तब भी ध्यानस्थ थी, किन्तु अन्तर्मन कल्पित शत्रुओं के साथ द्वन्द्व युद्ध में संलग्न था— शत्रुओं के खून में नहा रहा था । युद्ध और वैर के मात्र बढ़े और इतने क्रूर रूप में बढ़े कि जब तुमने प्रश्न किया तब वह साधक नहीं, एक भयंकर योद्धा के रूप में विचारों ही-विचारों में वह शत्रु के लिए महाकाल बन रहा था, क्रूरता और वैर की सर्वोपरि स्थिति में उस समय वह सातवीं नरक भूमि के योग्य कर्म-बन्ध कर रहा था । अतः उस स्थिति में यदि उसकी मृत्यु हो जाती, तो वह मर कर सातवीं नरक-भूमि में ही जाता ।”
मनोभावों के इस गम्भीर और आश्चर्यजनक विश्लेषण पर समवसरण सभा स्तब्ध थी । प्रभु ने विश्लेषण सूत्र को धागे बढ़ाते हुए कहा —
“राजन्, प्रसन्नचन्द्र राजर्षि बाहर में तो साधु थे, किन्तु अन्तर्य में थे एक वीर क्षत्रिय योद्धा । मन में युद्ध होता रहा ! होता रहा !! सब शस्त्र निःशेष हो गए, फिर भी एक शत्रु सामने खड़ा था । उस पर प्रहार करने के लिए जब कोई अन्य शस्त्र नहीं देखा, तो सिर के वज्र-मुकुट से ही उसको मार डालने का विचार किया ! और ज्यों ही हाथ सिर पर पहुँचा, तो कहाँ मुकुट ? वहाँ तो सप्ताच्छत था तुच्छ मस्तक । उसका मनोवेग टकराया—‘अरे ! मैं तो मुकुटधारी राजा नहीं, एक नग्न सिर वाला साधु हूँ । कहाँ भटक गया मैं ? कौन है मेरा शत्रु ? किससे कर रहा हूँ युद्ध ?’ मन का कुरु-क्षेत्र अब फिर धर्मक्षेत्र में बदलने लगा, भावधारा मुड़ गई । युद्ध चालू रहा, पर शत्रु बदल गए । अब दूसरों से नहीं, अपने से ही युद्ध शुरू हुआ और विकारों एवं वासनाओं का संहार होने लगा । ज्यों-ज्यों तुम्हारा प्रश्न आगे बढ़ रहा था, त्यों-त्यों उसके भाव-चरण आध्यात्मिक विजय की ओर बढ़ रहे थे । छठी और पाँचवें नरकों से छलाँग लगाता-लगातार वह कुछ ही क्षणों में स्वर्ग की सीढ़ियों को पार कर गया । विशुद्ध भावधारा के प्रवाह में अन्तर का कलुष घुल-घुल कर बहता गया, अन्धकार हटता गया, प्रकाश जगमगाता गया, और वह भटका हुआ साधक ज्योंही साधना की सिद्धि के द्वार पर पहुँचा, तो केवली हो गया !”
मनोभावों के इस विचित्र नाटक पर सम्राट् श्रेणिक गम्भीर होकर सोचते रहे — “यह मन कितना विचित्र है ! मेरे संकल्प कितने बलवान होते हैं ? जब असत्य की ओर मुड़े, अधोमुखी बने, तो सातवें नरक तक पहुँच गए ! और जब फिर संभलकर सत्य की ओर बढ़े, ऊर्ध्वमुखी बने, तो बस साधक से सिद्ध हो गए, मुक्ति का द्वार खुल गया !”
महाराज ने गद्गद् हृदय से श्रद्धावनत होकर प्रभुचरणों में वन्दना की ।
—त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र १०/६
एक सारांश (Concise Summary)
भगवान महावीर की सभा में सम्राट् श्रेणिक एक गहरे ध्यान में लीन तपस्वी को देखकर पूछते हैं कि वह किस गति को प्राप्त करेगा। प्रभु बताते हैं कि यदि वह अभी मरे तो सातवें नरक में जाएगा, लेकिन फिर क्षण-क्षण में उसकी गति नरक से स्वर्ग और अंत में केवलज्ञान तक पहुँच जाती है। रहस्य खुलता है — वह प्रसन्नचन्द्र राजर्षि हैं। ध्यान में ही उनके कान में शत्रु राजा द्वारा राज्य पर आक्रमण की खबर लगती है। मन में भयंकर युद्ध छिड़ जाता है — बाहर ध्यानस्थ, अंदर विकल्प-युद्ध। क्रोध और वैर से नरक-योग्य कर्म बंधते हैं, लेकिन फिर साधु-भाव जागता है, शत्रु बदलता है, आत्म-संहार शुरू होता है और वह केवली बन जाता है।
कथा का संदेश: मन ही सबसे बड़ा युद्ध-क्षेत्र है। संकल्पों की शक्ति से क्षण-क्षण में नरक से मोक्ष तक यात्रा हो सकती है। मन की लड़ाई ही असली लड़ाई है!