Atulya Nayan Of Jainism Universal

Atulya Nayan Of Jainism Universal Jainism with Atulya Nayan

TEAS Talks
02/05/2026

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बिना विचारे जो करेश्रमण भगवान् महावीर की धर्म-देशना श्रवण कर सम्राट् श्रेणिक और महारानी चेलना राजमहल को लौट रहे थे। नदी ...
02/05/2026

बिना विचारे जो करे

श्रमण भगवान् महावीर की धर्म-देशना श्रवण कर सम्राट् श्रेणिक और महारानी चेलना राजमहल को लौट रहे थे। नदी के तट पर कड़ाके की सर्दी में एक तपस्वी मुनि को ध्यान-मुद्रा में खड़े देखा, तो महाराज और महारानी ने श्रद्धा-प्रधान भाव से नमस्कार किया। सर्द हवा के झोंके कलेजा चीर रहे थे, हाथ-पाँव ठिठुरे जा रहे थे। बहुमूल्य ऊनी वस्त्रों में लिपटी हुई भी रानी की देह मालती लता की तरह थर-थर काँप रही थी। और, इस भयंकर सर्दी में भी वह नग्नदेह तपस्वी मुनि शैल-शिखर की तरह ध्यान में अचल खड़ा था। तपस्वी को धन्य-धन्य करते हुए रानी चेलना का रथ महलों की ओर बढ़ गया। रानी के स्मृति-पट पर शीत से जूझते हुए तपस्वी का वह भव्य साधना-चित्र बार-बार उभर आता और वह भावविह्वल होकर प्रणाम-मुद्रा में सहसा धन्य-धन्य कह उठती।

पौष महीने की भयानक शीत रात्रि में रानी चेलना ऊपर-ऊपरी अनेक कम्बलों से शरीर को सब तरह से ढँके हुए शयन-कक्ष में सो रही थी। नींद में उसका एक हाथ कम्बल से बाहर खुला हो गया। कुछ देर बाद रानी की नींद खुली तो देखा कि ठंड के कारण हाथ अकड़ गया है। रानी सीत्कार कर उठी—“अहो! कितनी भयंकर सर्दी है!” और, किर नदी के किनारे खड़े उस तपोधन मुनि की कल्पना स्मृति-पट पर सहसा उतर आई। रानी के मुँह से भावावेश में निकल पड़ा—“अहो, इस समय उनका क्या हाल होगा?”

सम्राट् श्रेणिक अर्धनिद्रित-से करवट बदल रहे थे। चेलना के ये शब्द—“उनका क्या हाल होगा!” सम्राट् के हृदय में अटक गए। “जरूर यह किसी अन्य पुरुष से प्रेम कर रही है। नींद में भी उसी के बारे में इसका चिन्तन चल रहा है। जो बात जागते हुए मुँह से नहीं निकलती, वह कभी-कभी नींद की बेहोशी में सहजतया निकल जाती है।” रानी के दुश्चरित होने के बारे में सम्राट् का मन एकाएक संदिग्ध हो उठा। सोचा—“जब मेरी प्राणप्रिया राजमहिषी का भी यह हाल है, तो अन्य रानियों के चरित्र के सम्बन्ध में मैं क्या विश्वास करूँ? स्त्री का चरित्र बड़ा विलक्षण होता है। उसके सतीत्व के बारे में कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।” बस दुष्कल्पनाओं में सम्राट् का मन संशयाकुल हो गया, नींद हराम हो गई।

सम्राट् प्रातः होते ही राजमहल से नीचे आए। मन में भारी उथल-पुथल मची थी, चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था। विवेक पर वहम का काला पर्दा ऐसा गिरा कि कुछ भी सोच नहीं सके। महामंत्री अभयकुमार को सम्राट् ने बुला कर कहा—“अभय! रानियों-सहित समूचित अन्तःपुर को अभी का-अभी जला डालो। तुरन्त मेरे आदेश का पालन होना चाहिए।” आदेश देकर सम्राट् धमधमाते हुए आगे बढ़ गए। अभयकुमार बुद्धिमान था। वह सम्राट् के क्रोध को समझता था। क्रोध में मनुष्य विवेक खो बैठता है। अविचेक से किया गया कार्य आखिर में दुखदायी होता है। उसने राज-महल के पास में खड़े गजराला के घास-फूस के झोंपड़े खाली करवाए और उनकी होली जला डाली। सम्राट् के आदेश का पालन भी हुआ और भयंकर दुर्घटना भी होते-होते बच गई।

आदेश देकर सम्राट् नगर से बाहर चले गए थे। इधर-उधर वन-प्रदेश में घूमते रहे। परन्तु, उनके मन में वह वहम बार-बार तीखे काँटे की तरह खटक रहा था। उन्हें शान्ति नहीं मिल रही थी। आखिर समाधान के लिए श्रमण भगवान् महावीर की धर्म-सभा में पहुँचे। चरण-वन्दना की और सांकेतिक शब्दों में पूछा—“प्रभो! वैशाली गणराज्य के स्वामी चेटक की पुत्री के एक-पति है या अनेक-पति?”
प्रभु महावीर ने कहा—“राजन्! चेटक की एक पुत्री क्या, सातों ही पुत्रियाँ एक-पति हैं। सती-साध्वी हैं। तुम्हारे अन्तःपुर की समस्त रानियाँ पवित्र तथा पतिव्रत्य धर्म का पालन करने वाली हैं।”
सम्राट् प्रभु की वाणी सुनते ही डंगू मूढ़-से देखते रह गए। प्रभु महावीर ने सम्राट् के मन का संदेह मिटाते हुए कहा—“राजन्! कदाचित् तुमने चेलना के साथ नदी के तीर पर तपस्या करते हुए किसी मुनि के दर्शन किये थे!”

“हाँ, प्रभु किये थे”—श्रेणिक ने कहा।
“रात्रि में जब रानी का एक हाथ कम्बल से बाहर रह गया और वह सर्दी के कारण ठिठुर कर अकड़ गया, तो उसकी पीड़ा को अनुभव करती हुई रानी ने अपनी स्थिति से उस मुनि की स्थिति की तुलना की और तब एकाएक उसके मुँह से निकल पड़ा—‘इस सर्दी में उनका क्या हाल होगा?’ राजन्, उसकी यह उक्ति किसी अन्य पुरुष के लिए नहीं थी”—भगवान् ने घटना का मर्म खोला।

सम्राट् के क्रोध पर सहसा घड़ों पानी गिर पड़ा। “मेरे आदेश से कहीं भयंकर अनर्थ न हो गया हो” इसी आकुलता से वे बिना और कुछ पूछे, सहसा राजमहलों की ओर दौड़ पड़े। ज्योंही राजमहलों के स्थल से आग की गगनचुम्बिनी ज्वालाओं को देखा, तो उनका चेहरा फक हो गया। यह क्या? अरे! सर्वनाश हो गया। स्त्री-हत्या, वह भी निरपराध! पाप! महापाप!

अभयकुमार मार्ग में ही सम्राट् को मिल गया। सम्राट् ने कहा—“अभय! तू भी आज मूर्ख हो गया? अनर्थ कर डाला तूने? कितना भयंकर पाप? अबलाओं को जीवित अग्निदाह… मूर्ख, चला जा मेरी आँखों के सामने से।”
अभयकुमार को चले जाने का आदेश क्या मिला, अभीष्ट ही मिल गया। वह तो इसी आदेश की प्रतीक्षा में था। क्योंकि वह दीक्षा लेना चाहता था और सम्राट् रोकते थे। अब वह चल पड़ा वहाँ जहाँ इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण आदेश न मिलते हों। प्रभु महावीर के चरणों में पहुँच कर अभयकुमार मुनि बन गया।

राजमहलों के पास पहुँच कर सम्राट् को जब सही स्थिति मालूम हुई तो अभय को बुद्धिमानी पर बाग-बाग हो गए। और, साथ ही लज्जित हो उठे अपनी मूर्खता पर। निष्कारण इतना भयंकर वहम! इतना उतावलापन! और, इतना अविवेक!! उनके अविवेक से यदि सचमुच ही दुर्घटना हो जाती, तो कितना अनर्थ हो जाता? इसकी कल्पना से ही सम्राट् का हृदय दहल उठा। उन्हें अपनी भूल पर पश्चात्ताप होने लगा। ‘उतावला सो बावला’ की लोकोक्ति रह-रह कर उनकी स्मृति में टकराने लगी।
—त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, पर्व १०/५

एक सारांश (Concise Summary)
सम्राट् श्रेणिक और रानी चेलना नदी किनारे ध्यानस्थ तपस्वी मुनि को देखते हैं। रात में रानी का हाथ सर्दी से अकड़ जाता है और वह भावुक होकर कहती है — “उनका क्या हाल होगा?” सम्राट् इसे गलत समझकर रानियों को जलाने का आदेश दे देते हैं। बुद्धिमान महामंत्री अभयकुमार खाली झोंपड़ों को जलाकर स्थिति बचाते हैं। बाद में प्रभु महावीर से सत्य जानकर सम्राट् को गहरा पश्चात्ताप होता है।
कथा का संदेश: बिना सोचे-समझे क्रोध या संदेह में कोई काम न करो — अविचार सबसे बड़ा पाप है!

मन की लड़ाईएक बार श्रमण भगवान् महावीर को नमस्कार करके मगधनरेश श्रेणिक ने प्रश्न किया,—“भगवान् ! आज आग के दर्शन करने के ल...
01/05/2026

मन की लड़ाई

एक बार श्रमण भगवान् महावीर को नमस्कार करके मगधनरेश श्रेणिक ने प्रश्न किया,—“भगवान् ! आज आग के दर्शन करने के लिए आते समय मार्ग में एक महान् तपस्वी के दर्शन हुए। बड़ी उग्र साधना कर रहे थे ! सूर्य की ओर भुजाएँ ऊँची फैलाए मेरु की तरह स्थिर, अचल, कायोत्सर्ग मुद्रा, ध्यान में लीन, नासाग्र दृष्टि ! मुखचन्द्र पर अद्भुत समता और अपार शान्ति भलक रही थी। कितना महान् होगा, उनका तपश्चरण ! वह उग्र तपस्वी किस उत्तम गति को प्राप्त करेंगे ?”

“राजन् ! जिस तपस्वी मुनि को तुमने देखा है, वह यदि अभी, इसी क्षण मरण करे, तो सातवाँ नरक भूमि को प्राप्त कर सकता है।”

‘इतनी उग्र तपः साधना और सातवाँ नरक ! जिसका रोम-रोम शान्ति और साधना में लीन है, वह साधक मरकर सातवाँ नरक-भूमि में जाएगा !’ श्रेणिक को अपने कानों पर विश्वास नहीं आ रहा था। “प्रभु ! मैं यह क्या सुन रहा हूँ। मेरे देखने में और आपके कहने में बड़ी विचित्र विसंगति है। बहुत-कुछ सोचने पर भी संगति बैठ नहीं रही है !”

“राजन् ! तुम ठीक ही सुन रहे हो ! इसमें विसंगति जैसा कुछ नहीं है । यदि वह इस समय काल-धर्म को प्राप्त हो, तो छठी नरक-भूमि में जा सकता है !”

‘यह कैसे ? सातवीं से छठी नरक भूमि ?’

“हाँ, राजन् ! अभी पाँचवीं नरक-भूमि के योग्य उसके कर्म-वन्ध हो रहे हैं !”

श्रेणिक इस अनूठी पहेली में उलझ गया ! विचित्र कुतूहल और अद्भुत आश्चर्य ! प्रभु से पुनः पूछने लगा— “प्रभु ! अब —?”

“अब उसके कर्म चौथी नरक-भूमि के योग्य है ।”

प्रश्नोत्तर की श्रृंखला आगे बढ़ती रही और कुछ ही क्षणों में तीसरी, दूसरी और प्रथम नरक-भूमि तक पहुँचते-पहुँचते, अब गति ऊपर की ओर बढ़ने लगी ।

इस आश्चर्यकारक उतार-चढ़ाव पर श्रेणिक का मन विस्मय-विमुग्ध हो उठा था । फलस्वरूप उसकी जिज्ञासा मुखरित होती गई—“प्रभु ! अब ?” और भगवान् की समाधान-परक दिव्य-दृष्टि पापकर्मी के प्रति होने वाले उस आन्तरिक अभियान के सम्बन्ध में क्षण-क्षण की सूचना दे रही थी, उस महान् अभियान की उत्तरोत्तर शक्तिशाली चढ़ाई का हाल सुना रही थी—“श्रेणिक ! अब वह साधक देवभूमि तक पहुँच गया है । यदि इसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाए, तो वह सौधर्म कल्प का समृद्धिशाली देव बन सकता है । उसका अभियान आगे बढ़ रहा है, लो, वह और ऊँचाई पर पहुँच गया । ब्रह्म-कल्प से भी आगे और आगे ही आगे … भूमिकाएँ क्षण-क्षण बदल रही हैं ।”

“प्रभु ! अब उस साधक की क्या स्थिति है ?” —श्रेणिक ने प्रश्न किया ।

“अब वह कल्प और प्रेवेयक देवलोक की भूमिका से भी ऊपर चला गया है । …और अब वह सर्वार्थसिद्धि की भूमिका पर पहुँच चुका है ।” …प्रभु का उत्तर पूरा होते-होते तो आकाश में देववुन्दुभि बज उठी । देव-देवियों के वृन्द-पर-वृन्द पुष्प-वर्षा करते हुए पृथ्वी पर उतरे आ रहे थे, वीतराग प्रसन्नचन्द्र केवली की जय-जयकार बोल रहे थे । श्रेणिक ने यह सब देखा, तो चकित और भ्रमित ! …”प्रभु ! यह क्या हो रहा है ? कहाँ नरक, कहाँ स्वर्ग और अब कहाँ केवलज्ञान कुछ ताल-मेल बैठ ही नहीं रहा है इसमें ?”

“राजन् ! वह मनोभूमि पर छिड़े जा रहे विकल्प-युद्ध में विजय पा चुका है, उसे केवलज्ञान प्राप्त हो गया है । और यह सब कैवल्य महोत्सव का उपक्रम किया जा रहा है !”

“प्रभु ! इस रहस्यमयी भाषा को मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि कुछ क्षण पहले जो साधक सातवीं नरकभूमि में जाने योग्य कर्म कर रहा था, वह कुछ ही क्षणों में ऊपर उठा, और ऐसा उठा कि वीतराग-सर्वज्ञ हो गया, आपके समान बन गया। यह सब कैसे हुआ? क्या रहस्य है इसका! यह आपका भक्त और समूची परिषद् जिज्ञासु नजरों से सत्य को दोह रही है, कृपया उसे स्पष्ट करके दिखावै का अनुग्रह करें?”

“राजन् ! जिस समय तुम उस साधक को वन्दना करके वहाँ आ रहे थे, बस, तभी उसको मनोभूमि में एक भयंकर युद्ध छिड़ गया !”

“कैसा युद्ध किसके साथ युद्ध ?”

प्रभु ने मानव मन की आन्तरिक भूमिका का चित्र स्पष्ट करते हुए कहा—“राजन् ! वह साधक और कोई नहीं, प्रसन्न-चन्द्र राजर्षि है। जब वह ध्यानावस्था में लीन खड़े थे, तो राजर्षि के कानों में परस्पर बात करते हुए दो सैनिकों की ध्वनि टकराई कि “देखो, इस प्रसन्नचन्द्र राजा ने अपने अल्प-वयस्क पुत्र के असमर्थ कन्धों पर राज्य-भार डाल कर दीक्षा ग्रहण कर ली। अब पीछे से शत्रु राजा ने बालक राजा को कमजोर एवं दुर्बल समझकर राज्य पर आक्रमण कर दिया है, भयंकर युद्ध छिड़ गया है, शत्रु सेनाएँ आगे बढ़ चुकी हैं। राजधानी सब ओर से घिर चुकी है। बस, कुछ ही समय में प्रसन्नचन्द्र राजा का पुत्र युद्ध-भूमि से उलटे पाँव भाग छूटेगा या वह वहीं समाप्त हो जाएगा। प्रसन्नचन्द्र के परंपरागत राज्य और कुल का सर्वनाश अब निकट है।” बस, इतना सुनना था कि ध्यानावस्था में खड़े प्रसन्नचन्द्र राजर्षि का मन विचलित हो गया । वह वीतराग भूमिका से हटकर राग-द्वेष की भूमिका की ओर दौड़ पड़ा । मन-ही-मन घोर युद्ध शुरु हो गया । बाहर में उसकी देह तब भी ध्यानस्थ थी, किन्तु अन्तर्मन कल्पित शत्रुओं के साथ द्वन्द्व युद्ध में संलग्न था— शत्रुओं के खून में नहा रहा था । युद्ध और वैर के मात्र बढ़े और इतने क्रूर रूप में बढ़े कि जब तुमने प्रश्न किया तब वह साधक नहीं, एक भयंकर योद्धा के रूप में विचारों ही-विचारों में वह शत्रु के लिए महाकाल बन रहा था, क्रूरता और वैर की सर्वोपरि स्थिति में उस समय वह सातवीं नरक भूमि के योग्य कर्म-बन्ध कर रहा था । अतः उस स्थिति में यदि उसकी मृत्यु हो जाती, तो वह मर कर सातवीं नरक-भूमि में ही जाता ।”

मनोभावों के इस गम्भीर और आश्चर्यजनक विश्लेषण पर समवसरण सभा स्तब्ध थी । प्रभु ने विश्लेषण सूत्र को धागे बढ़ाते हुए कहा —

“राजन्, प्रसन्नचन्द्र राजर्षि बाहर में तो साधु थे, किन्तु अन्तर्य में थे एक वीर क्षत्रिय योद्धा । मन में युद्ध होता रहा ! होता रहा !! सब शस्त्र निःशेष हो गए, फिर भी एक शत्रु सामने खड़ा था । उस पर प्रहार करने के लिए जब कोई अन्य शस्त्र नहीं देखा, तो सिर के वज्र-मुकुट से ही उसको मार डालने का विचार किया ! और ज्यों ही हाथ सिर पर पहुँचा, तो कहाँ मुकुट ? वहाँ तो सप्ताच्छत था तुच्छ मस्तक । उसका मनोवेग टकराया—‘अरे ! मैं तो मुकुटधारी राजा नहीं, एक नग्न सिर वाला साधु हूँ । कहाँ भटक गया मैं ? कौन है मेरा शत्रु ? किससे कर रहा हूँ युद्ध ?’ मन का कुरु-क्षेत्र अब फिर धर्मक्षेत्र में बदलने लगा, भावधारा मुड़ गई । युद्ध चालू रहा, पर शत्रु बदल गए । अब दूसरों से नहीं, अपने से ही युद्ध शुरू हुआ और विकारों एवं वासनाओं का संहार होने लगा । ज्यों-ज्यों तुम्हारा प्रश्न आगे बढ़ रहा था, त्यों-त्यों उसके भाव-चरण आध्यात्मिक विजय की ओर बढ़ रहे थे । छठी और पाँचवें नरकों से छलाँग लगाता-लगातार वह कुछ ही क्षणों में स्वर्ग की सीढ़ियों को पार कर गया । विशुद्ध भावधारा के प्रवाह में अन्तर का कलुष घुल-घुल कर बहता गया, अन्धकार हटता गया, प्रकाश जगमगाता गया, और वह भटका हुआ साधक ज्योंही साधना की सिद्धि के द्वार पर पहुँचा, तो केवली हो गया !”

मनोभावों के इस विचित्र नाटक पर सम्राट् श्रेणिक गम्भीर होकर सोचते रहे — “यह मन कितना विचित्र है ! मेरे संकल्प कितने बलवान होते हैं ? जब असत्य की ओर मुड़े, अधोमुखी बने, तो सातवें नरक तक पहुँच गए ! और जब फिर संभलकर सत्य की ओर बढ़े, ऊर्ध्वमुखी बने, तो बस साधक से सिद्ध हो गए, मुक्ति का द्वार खुल गया !”

महाराज ने गद्गद् हृदय से श्रद्धावनत होकर प्रभुचरणों में वन्दना की ।

—त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र १०/६

एक सारांश (Concise Summary)

भगवान महावीर की सभा में सम्राट् श्रेणिक एक गहरे ध्यान में लीन तपस्वी को देखकर पूछते हैं कि वह किस गति को प्राप्त करेगा। प्रभु बताते हैं कि यदि वह अभी मरे तो सातवें नरक में जाएगा, लेकिन फिर क्षण-क्षण में उसकी गति नरक से स्वर्ग और अंत में केवलज्ञान तक पहुँच जाती है। रहस्य खुलता है — वह प्रसन्नचन्द्र राजर्षि हैं। ध्यान में ही उनके कान में शत्रु राजा द्वारा राज्य पर आक्रमण की खबर लगती है। मन में भयंकर युद्ध छिड़ जाता है — बाहर ध्यानस्थ, अंदर विकल्प-युद्ध। क्रोध और वैर से नरक-योग्य कर्म बंधते हैं, लेकिन फिर साधु-भाव जागता है, शत्रु बदलता है, आत्म-संहार शुरू होता है और वह केवली बन जाता है।

कथा का संदेश: मन ही सबसे बड़ा युद्ध-क्षेत्र है। संकल्पों की शक्ति से क्षण-क्षण में नरक से मोक्ष तक यात्रा हो सकती है। मन की लड़ाई ही असली लड़ाई है!

सामायिक का मूल्यभागवान महावीर के श्रीमुख से जब सम्राट् श्रेणिक ने यह सुना—“तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा” तो भक्तृद्वय सम्...
30/04/2026

सामायिक का मूल्य

भागवान महावीर के श्रीमुख से जब सम्राट् श्रेणिक ने यह सुना—“तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा” तो भक्तृद्वय सम्राट् सहसा काँप-काँप उठे। “प्रभो! मैं आपका भक्त! और नरक जाऊँगा! क्या मेरी भक्ति का कोई मूल्य नहीं? उसमें कोई सचाई नहीं?” —श्रेणिक ने दीनभाव से प्रभु-चरणों में निवेदन किया।
भगवान ने समझाया—“श्रेणिक! श्रद्धा और भक्ति के बल पर नरक से त्राण पाना तो क्या चीज है, स्वर्ग के सिंहासन भी इनको शक्ति के सामने असंभव नहीं हैं। किन्तु, भक्त बनने से पहले किये गए अपने जय असत्कर्मों का फल-भोग तो करना ही पड़ता है न!”
सम्राट् श्रेणिक के मन में उथल-पुथल मच गई। नरक की कल्पना उनके मन-मस्तिष्क को बुरी तरह मथने लगी। नरक से त्राण पाने के लिए वे सब-कुछ करने के लिए उद्यत हो गए। वे सोचने लगे—“यह विशाल साम्राज्य! मह अभय कोष! क्या नरक से नहीं बचा सकते?”
“प्रभो! किसी भी तरह मैं नरक से बच सकूँ, वह मार्ग जानना चाहता हूँ। उद्घोष करो, प्रभो! मुझ पर करुणा करो। मैं अपना विशाल साम्राज्य और समस्त राज्य-कोष लुटा सकता हूँ, मुझे नरक से मुक्त होने का उपाय बतलाइए, भगवन्!”
भगवान् महावीर के सर्वग्राही ज्ञान में झलक रहा था—“संचाद के अन्तर में रमा हुआ साम्राज्य और कोष का दर्प!” साम्राज्य और कोष लुटा दूँगा—‘यह भी एक गर्व है। और जहाँ गर्व है, वहाँ बन्धन ही है, मुक्ति कैसी?
श्रेणिक का धैर्य अपनी सीमाएँ तोड़ रहा था—“प्रभो! कृपा कीजिए, नरक से मुक्त होने का मार्ग बतलाइए!”
प्रभु की गम्भीर वाणी मुखरित हुई—“श्रेणिक! तुम्हारे उद्धार का एक उपाय हो सकता है। यदि पूर्णया श्रावक (पुण्य श्रावक) की एक सामायिक का फल तुम्हें प्राप्त हो जाय, तो तुम्हारी नरक टल सकती है!”
श्रेणिक का हृदय बाँसों उछलने लगा—“एक सामायिक का क्या मूल्य हो सकता है? हजार नहीं, तो लाख, नहीं तो करोड़ स्वर्ण मुद्रा! और क्या? बस, यह तो बहुत सहज उपाय है!”
पूर्णया श्रावक के पास स्वयं पहुँचे महाराज, और बड़ी कातरता से कहने लगे—“श्रावक श्रेष्ठ! मैं एक इच्छा लेकर तुम्हारे द्वार पर आया हूँ। जो माँगेगा, वही मूल्य दूँगा, मुझे निराश मत लौटाना!”
“महाराज! कहिए न, मेरे-जैसे साधारण गृहस्थ के यहाँ ऐसी कौन-सी दुर्लभ वस्तु है, जिसकी आप-जैसे महान् सम्राट् की आवश्यकता पड़ी है? और वह भी इतनी बड़ी आवश्यकता कि स्वयं महाराज पधारे! सम्राट्! मुझे लज्जित न कीजिए, आपके लिए मेरा सर्वस्व प्रस्तुत है।”
“श्रावक! वस्तु नहीं, तुम्हारी एक सामायिक चाहिए, सिर्फ एक सामायिक! बोलो, किस मूल्य पर दे सकते हो?”
“महाराज, सामायिक?” —पूर्णया श्रावक सम्राट् के मुख की ओर आश्चर्य से देखने लगा।
“हाँ, श्रावक: सामायिक! प्रभु ने कहा है—तुम्हारे एक सामायिक से मेरा नरक टल सकता है। बोलो, तुम्हें क्या मूल्य चाहिए? संकोच न करो, मैं पूरा मूल्य चुकाऊँगा।”
पूर्णया श्रावक ने गंभीर होकर कहा—“महाराज! मेरे लिए यह बिल्कुल नयी बात है। मैं सामायिक का मूल्य क्या बताऊँ? जिसने लेने के लिए कहा है, वही उसका मूल्य भी बता सकता है। आप प्रभु से ही पूछिए कि एक सामायिक का मूल्य क्या हो सकता है।”
दूसरे दिन सूर्य की प्रथम किरण के साथ ही अत्यन्त भावविह्वल मुद्रा में उत्सुक महाराज श्रेणिक प्रभु के चरणों में उपस्थित हुए। प्रार्थना की—“प्रभु! पूर्णया श्रावक सामायिक देने को तैयार है। कृपया, यह बतलाइए कि एक सामायिक का क्या मूल्य हो सकता है? मैं अपना समस्त राज्य-कोष दे सकता हूँ। कुछ भी मूल्य हो, मुझे एक सामायिक अवश्य ही लेनी है।”
प्रभु ने देखा—“सम्राट् का राजसी अहंकार और अधिक उद्दीप्त हो रहा है। वह भौतिक वैभव के द्वारा आध्यात्मिक समाधान चाहता है।”
प्रभु ने कहा—“सम्राट्! सामायिक की भौतिक सम्पत्ति के साथ क्या तुलना? यदि भूतल से चन्द्र-लोक तक स्वर्ण, मणि एवं रत्नों का अंबर लगा दिया जाय, तब भी सामायिक का मूल्य तो क्या, सामायिक को दलाली भी पूरी नहीं हो सकती।”
भगवान् ने समाधान की दिशा में एक और स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया—“राजन्! जीवन के अन्तिम क्षण में मृत्यु के द्वार पर पहुँचे हुए किसी प्राणी को क्या कोटि स्वर्ण मुद्रा या मणि-मुक्ता देकर बचाया जा सकता है?”
“भगवान्! यह तो असम्भव है!”
“तो सम्राट्! जीवन का मूल्य कितना महान् है? कोटि-कोटि स्वर्ण एवं मणि-मुक्ता के मूल्य से भी जीवन का एक क्षण प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में, जबकि सामायिक का साधक अनन्त-अनन्त प्राणियों को जीवन के लिए अभय अर्पण करता है, तो सामायिक का मोल, मोल से परे अनमोल की कोटि पर पहुँच गया न! राजन्! सामायिक तो समता का नाम है। राग-द्वेष की विषमता को चिन्ता से दूर करना और साधारण संसारी जन से राग-द्वेष का विजेता जिन बनना, यही सामायिक का आध्यात्मिक अनन्त मूल्य है। उसे पाने के लिए अपने मन में अहंकार और विकार को साफ करना पड़ता है। सामायिक को वही प्राप्त कर सकता है, जिसका मन निर्मल हो, समत्व में स्थित हो, भौतिक आकांक्षाओं से रहित हो। सामायिक बाहर में किसी से लेने की चीज नहीं है, वह तो स्वयं अपने अन्दर में से ही लेने जैसी शुद्ध स्थिति है। पूर्णया श्रावक की सामायिक से मेरा अभिप्राय उससे सामायिक खरीदने या मांगने से नहीं था। मेरा अभिप्राय था कि पूर्णया-जैसी-शुद्ध निष्काम सामायिक होनी चाहिए। न उसमें इस लोक की कोई कामना हो और न परलोक की!”
महाराज श्रेणिक सुनते ही चकित रह गए। भौतिक धन के द्वारा सामायिक खरीदने का ‘अहं’ चूर-चूर हो गया और अब उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि “बन्धन-मुक्ति के लिए समत्व में स्थिर होने पर ही सामायिक की उपलब्धि हो सकती है।”
—श्रेणिक चरित हाल ५९ (त्रिलोक ऋषिजी)
एक सारांश (Concise Summary)
सम्राट् श्रेणिक को भगवान महावीर नरक जाने का भय दिखाते हैं। बचने के लिए श्रेणिक पूर्णया श्रावक की एक सामायिक चाहते हैं और उसके भौतिक मूल्य पूछते हैं। प्रभु महावीर बताते हैं कि सामायिक का कोई भौतिक मूल्य नहीं — यह समता, निष्काम भाव और आन्तरिक शुद्धि का नाम है। भौतिक धन, राज्य-कोष या स्वर्ण से इसे नहीं खरीदा जा सकता। कथा सिखाती है कि सच्ची सामायिक केवल मन की शुद्धता और समभाव से ही प्राप्त होती है, जो बन्धन-मुक्ति का मार्ग खोलती है।
कथा का संदेश: सामायिक का अनन्त मूल्य भौतिक नहीं, आध्यात्मिक है — समता ही सबसे बड़ा खजाना है!

जीवन-दृष्टितीर्थंकर महावीर राजगृह के गुणशील उपवन के समवसरण में विराजमान थे। विशाल परिषद् में जहाँ सम्राट् श्रेणिक, महामं...
30/04/2026

जीवन-दृष्टि

तीर्थंकर महावीर राजगृह के गुणशील उपवन के समवसरण में विराजमान थे। विशाल परिषद् में जहाँ सम्राट् श्रेणिक, महामंत्री अभयकुमार आदि अभिजात्य वर्ग के यशस्वी जन भगवान् महावीर के धर्म-देशना सुन रहे थे, वहाँ एक ओर राजगृह का कूर ‘कालशौकरिक’ (कसाई) भी मन में कौतूहल लिये बैठा था।

शान्ति और समता की उपदेश-धारा बह रही थी कि अचानक एक वृद्ध पुरुष जर्जर शरीर, कुष्ठ रोगी, फटे-पुराने चिथड़ों में लिपटा, लकड़ी के सहारे सभा को चीरता हुआ आगे आया। सम्राट् की ओर अभिमुख होकर बोला—‘सम्राट्, जीते रहो!’
सबकी आँखें इस विचित्र बूढ़े पर गड़ गईं। कैसा असभ्य और ढीठ है? खुशामदी कहीं का! भगवान को वन्दन न करके राजा को आशीर्वाद दे रहा है?

तभी वृद्ध पुरुष ने भगवान् महावीर की ओर मुँह किया—“तुम मर जाओ!”
अब तो सारी परिषद् के रोंगटे खड़े हो गए। सम्राट् की भौंहें भी तन गईं। किन्तु यह तो तीर्थंकर की धर्म-सभा है, राजा और रंक समान हैं यहाँ! राजा को भी किसी को रोक-टोक करने का कोई अधिकार नहीं है यहाँ।

वृद्ध ने बगल से बढ़कर महामंत्री अभय कुमार से कहा— “महामंत्री? तुम चाहे जीओ, चाहे मरो।” अब तो सबके-सब क्रोध-मिश्रित आश्चर्य से बूढ़े की ओर देखने लगे कि यह क्या बकवास कर रहा है? कभी कुछ कहता है और कभी कुछ। मालूम होता है—बूढ़े का दिमाग ठिकाने पर नहीं है।

इतने में ही वृद्ध ने काल-शौकरिक को सम्बोधित किया—“भद्र! तुम न मरो, न जीओ!”
सारी सभा स्तब्ध थी! कौन है यह बूढ़ा? क्या पहेलियाँ-सी बुझा रहा है! क्या मतलब है आखिर इस जीने और मरने की बात का? सब लोग परस्पर बुसुर-पुसुर कर रहे थे कि बूढ़ा अचानक पलक झपकते गायब हो गया।

सम्राट् ने प्रभु से निवेदन किया—“भन्ते! यह विचित्र व्यक्ति कौन था? आपका अविनय और यह बकवास! क्या इसका कोई गूढ़ अर्थ है? या यों ही बुढ़ापे की मानसिक दुर्बलता है यह!”

प्रभु ने वीर-गंभीर वाणी में कहा—“राजन्! उसे मनुष्य मत समझो, वह देव था। उसकी इन पहेलियों में बकवास नहीं, जीवन का अमर सत्य छिपा है।”

“प्रभु वह सत्य क्या है? आप समझाएँ तो कुछ पता लगे।”
“राजन्! वृद्ध ने तुमसे कहा कि सम्राट् जीते रहो! इसका फलितार्थ है कि आज तुम्हारे सामने भौतिक ऐश्वर्य का अम्बार लगा है। तुम्हें यहाँ भोग और सुख के सभी साधन प्राप्त हैं। जितने दिन यह जीवन है, तुम्हारे फूलों की सेज है। किन्तु आगे क्या है? नरक है। जीवन में असीमित भोग दुःख के कारण होते हैं। अतः राजन्, तुम्हारे अगले जन्म में घोर दुःख के अन्ध-गर्त हैं। काँटे और शूल हैं। तुम्हारे लिए अभी जीना ही सुखकारी है, मरण नहीं।”

इस कटु सत्य ने सम्राट् का कलेजा हिला दिया, किन्तु धैर्य और उत्सुकता ने सहारा दिया। वह दो क्षण रुका और फिर अगले प्रश्न को दुहराया—“प्रभु! आप जैसे परम करुणावतार प्रभु को उसने मर जाने के लिए क्यों कहा?”

“राजन्! साधना के द्वारा अन्तर के राग-द्वेष रूप मल को धो लेने के बाद ही अर्हन्त बना जाता है। परन्तु अर्हन्त जीवन-दृष्टि की अन्तिम भूमिका नहीं है। मुक्त दशा ही आध्यात्मिक विकास का सर्वोत्कृष्ट शाश्वत रूप है। पूर्व-बद्ध कर्मों का भोग अभी चल रहा है, मैं अभी उससे मुक्त नहीं हो सका हूँ, अतः वह मेरे वर्तमान जीवन को देह का बन्धन मानता है, और मरण को मुक्ति। इसलिए उसने मुझे मर जाने को कहा। इसका मर्म है—आप सदा के लिए बन्धन से मुक्त हो जाओ।”

दो प्रश्नों का समाधान हुआ। जिज्ञासा तीसरे प्रश्न की ओर बढ़ी।

प्रभु ने पहेली को खोलते हुए बताया—“अभयकुमार के जीवन में भोग भी है, त्याग भी है। उसकी जीवन-दृष्टि स्पष्ट है। फूलों से रस लेनेवाले भ्रमर की तरह वह जीवन का रस लेते हुए भी उसमें डूबते नहीं हैं। वह जो भी कर रहा है, कर्तव्य-भाव से कर रहा है। इसलिए उसका यह वर्तमान जीवन भी सुखी है—भय और शोक से दूर! तथा अगला जीवन भी दिव्य एवं श्रेष्ठ है। यहाँ भी सुखी, आगे भी सुखी। इसलिए अभयकुमार के लिए देव ने कहा कि चाहे जीओ, चाहे मरो।”
सम्राट् को मन-ही-मन अपने जीवन पर ग्लानि होने लगी, और अभय की जीवन-दृष्टि के प्रति धन्यता, शुद्ध स्पर्धा!

किन्तु अभी अन्तिम प्रश्न बाकी था। सम्राट् ने उसे समझने को भी प्रश्न किया। प्रभु ने बताया—“न मरो और न जीओ? इसका अर्थ तो बहुत ही स्पष्ट है। कालशौकरिक का वर्तमान जीवन तो दुःख, दारिद्र्य और घृणा से भरा है, साथ ही हिंसा और क्रूरता का महापापी भी है। ऐसी स्थिति में अगले जीवन में भी सुख-शान्ति और प्रकाश की आशा कैसे की जा सकती है? अस्तु, यह जीता है तो पाप करता है, और यदि मरता है तो नरक में जाता है। अतः उसका न मरना अच्छा है और न जीना।”

महाराज श्रेणिक श्रद्धावनत हो गए। उन्होंने जो समझा, प्रभु महावीर के समक्ष निवेदन किया—“प्रभु! इसका तात्पर्य तो यह हुआ कि जो विवेक की दृष्टि खुली रखकर जीता है, उसके दोनों जन्म सुखमय होते हैं।” प्रभु ने कहा—“हाँ राजन्! वस्तुतः यही सच्ची जीवन-दृष्टि है।”

—त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र

एक सारांश (Concise Summary)
भगवान महावीर की धर्म-सभा में एक रहस्यमय देव (वृद्ध रूप में) अचानक प्रकट होता है और चार व्यक्तियों को विचित्र आशीर्वाद देता है—सम्राट् श्रेणिक को “जीते रहो”, भगवान को “मर जाओ”, महामंत्री अभयकुमार को “चाहे जीओ चाहे मरो”, और कसाई कालशौकरिक को “न मरो न जीओ”। बूढ़ा गायब हो जाता है। सम्राट् जब पूछते हैं तो प्रभु महावीर इन पहेलियों का गहरा अर्थ बताते हैं—यह चारों की जीवन-दृष्टि और उनके भविष्य जन्मों को दर्शाता है। कथा सिखाती है कि सच्ची जीवन-दृष्टि (विवेक, समता, कर्तव्य-भाव) ही इस जन्म और अगले जन्म दोनों को सुखमय बनाती है। जीवन-दृष्टि ही सब कुछ है!

https://youtube.com/shorts/myWbC5MRnHE?si=mRltIEAeszzomsNBजीवन-दृष्टितीर्थंकर महावीर राजगृह के गुणशील उपवन के समवसरण में...
28/04/2026

https://youtube.com/shorts/myWbC5MRnHE?si=mRltIEAeszzomsNB

जीवन-दृष्टि
तीर्थंकर महावीर राजगृह के गुणशील उपवन के समवसरण में विराजमान थे। विशाल परिषद् में जहाँ सम्राट् श्रेणिक, महामंत्री अभयकुमार आदि अभिजात्य वर्ग के यशस्वी जन भगवान् महावीर के धर्म-देशना सुन रहे थे, वहाँ एक ओर राजगृह का कूर ‘कालशौकरिक’ (कसाई) भी मन में कौतूहल लिये बैठा था।

शान्ति और समता की उपदेश-धारा बह रही थी कि अचानक एक वृद्ध पुरुष जर्जर शरीर, कुष्ठ रोगी, फटे-पुराने चिथड़ों में लिपटा, लकड़ी के सहारे सभा को चीरता हुआ आगे आया।

सम्राट् की ओर अभिमुख होकर बोला—‘सम्राट्, जीते रहो!’
सबकी आँखें इस विचित्र बूढ़े पर गड़ गईं। कैसा असभ्य और ढीठ है? खुशामदी कहीं का!

भगवान को वन्दन न करके राजा को आशीर्वाद दे रहा है? तभी वृद्ध पुरुष ने भगवान् महावीर की ओर मुँह किया—“तुम मर जाओ!”
अब तो सारी परिषद् के रोंगटे खड़े हो गए। सम्राट् की भौंहें भी तन गईं। किन्तु यह तो तीर्थंकर की धर्म-सभा है, राजा और रंक समान हैं यहाँ! राजा को भी किसी को रोक-टोक करने का कोई अधिकार नहीं है यहाँ।

वृद्ध ने बगल से बढ़कर महामंत्री अभय कुमार से कहा— “महामंत्री? तुम चाहे जीओ, चाहे मरो।” अब तो सबके-सब क्रोध-मिश्रित आश्चर्य से बूढ़े की ओर देखने लगे कि यह क्या बकवास कर रहा है? कभी कुछ कहता है और कभी कुछ।

मालूम होता है—बूढ़े का दिमाग ठिकाने पर नहीं है। इतने में ही वृद्ध ने काल-शौकरिक को सम्बोधित किया—“भद्र! तुम न मरो, न जीओ!”
सारी सभा स्तब्ध थी! कौन है यह बूढ़ा? क्या पहेलियाँ-सी बुझा रहा है! क्या मतलब है आखिर इस जीने और मरने की बात का? सब लोग परस्पर बुसुर-पुसुर कर रहे थे कि बूढ़ा अचानक पलक झपकते गायब हो गया।

सम्राट् ने प्रभु से निवेदन किया—“भन्ते! यह विचित्र व्यक्ति कौन था? आपका अविनय और यह बकवास! क्या इसका कोई गूढ़ अर्थ है? या यों ही बुढ़ापे की मानसिक दुर्बलता है यह!”
प्रभु ने वीर-गंभीर वाणी में कहा—“राजन्! उसे मनुष्य मत समझो, वह देव था। उसकी इन पहेलियों में बकवास नहीं, जीवन का अमर सत्य छिपा है।”

“प्रभु वह सत्य क्या है? आप समझाएँ तो कुछ पता लगे।”
“राजन्! वृद्ध ने तुमसे कहा कि सम्राट् जीते रहो! इसका फलितार्थ है कि आज तुम्हारे सामने भौतिक ऐश्वर्य का अम्बार लगा है। तुम्हें यहाँ भोग और सुख के सभी साधन प्राप्त हैं। जितने दिन यह जीवन है, तुम्हारे फूलों की सेज है। किन्तु आगे क्या है? नरक है। जीवन में असीमित भोग दुःख के कारण होते हैं। अतः राजन्, तुम्हारे अगले जन्म में घोर दुःख के अन्ध-गर्त हैं। काँटे और शूल हैं। तुम्हारे लिए अभी जीना ही सुखकारी है, मरण नहीं।”
इस कटु सत्य ने सम्राट् का कलेजा हिला दिया, किन्तु धैर्य और उत्सुकता ने सहारा दिया। वह दो क्षण रुका और फिर अगले प्रश्न को दुहराया—“प्रभु! आप जैसे परम करुणावतार प्रभु को उसने मर जाने के लिए क्यों कहा?”

“राजन्! साधना के द्वारा अन्तर के राग-द्वेष रूप मल को धो लेने के बाद ही अर्हन्त बना जाता है। परन्तु अर्हन्त जीवन-दृष्टि की अन्तिम भूमिका नहीं है। मुक्त दशा ही आध्यात्मिक विकास का सर्वोत्कृष्ट शाश्वत रूप है। पूर्व-बद्ध कर्मों का भोग अभी चल रहा है, मैं अभी उससे मुक्त नहीं हो सका हूँ, अतः वह मेरे वर्तमान जीवन को देह का बन्धन मानता है, और मरण को मुक्ति। इसलिए उसने मुझे मर जाने को कहा। इसका मर्म है—आप सदा के लिए बन्धन से मुक्त हो जाओ।”
दो प्रश्नों का समाधान हुआ। जिज्ञासा तीसरे प्रश्न की ओर बढ़ी। प्रभु ने पहेली को खोलते हुए बताया—“अभयकुमार के जीवन में भोग भी है, त्याग भी है। उसकी जीवन-दृष्टि स्पष्ट है। फूलों से रस लेनेवाले भ्रमर की तरह वह जीवन का रस लेते हुए भी उसमें डूबते नहीं हैं। वह जो भी कर रहा है, कर्तव्य-भाव से कर रहा है। इसलिए उसका यह वर्तमान जीवन भी सुखी है—भय और शोक से दूर! तथा अगला जीवन भी दिव्य एवं श्रेष्ठ है। यहाँ भी सुखी, आगे भी सुखी। इसलिए अभयकुमार के लिए देव ने कहा कि चाहे जीओ, चाहे मरो।”
सम्राट् को मन-ही-मन अपने जीवन पर ग्लानि होने लगी, और अभय की जीवन-दृष्टि के प्रति धन्यता, शुद्ध स्पर्धा! किन्तु अभी अन्तिम प्रश्न बाकी था। सम्राट् ने उसे समझने को भी प्रश्न किया। प्रभु ने बताया—“न मरो और न जीओ? इसका अर्थ तो बहुत ही स्पष्ट है। कालशौकरिक का वर्तमान जीवन तो दुःख, दारिद्र्य और घृणा से भरा है, साथ ही हिंसा और क्रूरता का महापापी भी है। ऐसी स्थिति में अगले जीवन में भी सुख-शान्ति और प्रकाश की आशा कैसे की जा सकती है? अस्तु, यह जीता है तो पाप करता है, और यदि मरता है तो नरक में जाता है। अतः उसका न मरना अच्छा है और न जीना।”
महाराज श्रेणिक श्रद्धावनत हो गए। उन्होंने जो समझा, प्रभु महावीर के समक्ष निवेदन किया—“प्रभु! इसका तात्पर्य तो यह हुआ कि जो विवेक की दृष्टि खुली रखकर जीता है, उसके दोनों जन्म सुखमय होते हैं।” प्रभु ने कहा—“हाँ राजन्! वस्तुतः यही सच्ची जीवन-दृष्टि है।”

—त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र

एक सारांश
भगवान महावीर की धर्म-सभा में एक रहस्यमय देव (वृद्ध रूप में) अचानक प्रकट होता है और चार व्यक्तियों को विचित्र आशीर्वाद देता है—सम्राट् श्रेणिक को “जीते रहो”, भगवान को “मर जाओ”, महामंत्री अभयकुमार को “चाहे जीओ चाहे मरो”, और कसाई कालशौकरिक को “न मरो न जीओ”। बूढ़ा गायब हो जाता है। सम्राट् जब पूछते हैं तो प्रभु महावीर इन पहेलियों का गहरा अर्थ बताते हैं—यह चारों की जीवन-दृष्टि और उनके भविष्य जन्मों को दर्शाता है। कथा सिखाती है कि सच्ची जीवन-दृष्टि (विवेक, समता, कर्तव्य-भाव) ही इस जन्म और अगले जन्म दोनों को सुखमय बनाती है। जीवन-दृष्टि ही सब कुछ है!

जीवन-दृष्टि ही सब कुछ है TEAS kidTalks

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