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motivational speaker of group बुरा वक्त रुलाता है, मगर बहुत कुछ सीखा कर जाता है लेकिन सीखने वाला होना चाहिए ...

एक बार chat gtp से यह बोल कर देखो आपकी हंसी नहीं रुकेगी
12/09/2026

एक बार chat gtp से यह बोल कर देखो आपकी हंसी नहीं रुकेगी

दो आदमी एक ही बाज़ार में गए। एक बोला — "भीड़ बहुत थी, कुछ नहीं हुआ।" दूसरा बोला — "भीड़ बहुत थी, अच्छा हुआ।"बाज़ार एक था...
10/09/2026

दो आदमी एक ही बाज़ार में गए। एक बोला — "भीड़ बहुत थी, कुछ नहीं हुआ।" दूसरा बोला — "भीड़ बहुत थी, अच्छा हुआ।"

बाज़ार एक था, बेटा। आँखें दो थीं।

मौका कोई चमकती चीज़ नहीं जो आसमान से गिरती है। वो हमेशा एक ही शक्ल में आता है — किसी की परेशानी। जहाँ लोग शिकायत कर रहे हैं, जहाँ लाइन लगी है, जहाँ लोग कह रहे हैं "यहाँ ये नहीं मिलता" — वहीं तेरा धंधा खड़ा है।

मौके बाहर नहीं बढ़ते। देखने वाली आँख अंदर बढ़ती है।

कमेंट कर — **मौका**
Save कर ले, जिस दिन लगे "यहाँ कुछ नहीं रखा" — पढ़ना।

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1986 में मैंने साल भर की कमाई एक दिन में गँवाई। पर बर्बाद मैं उससे नहीं होता — बर्बाद मैं उस रात होता, जब दुकान गिरवी रख...
09/09/2026

1986 में मैंने साल भर की कमाई एक दिन में गँवाई। पर बर्बाद मैं उससे नहीं होता — बर्बाद मैं उस रात होता, जब दुकान गिरवी रखने के कागज़ निकाल लिए थे।

पिताजी ने सिर्फ इतना कहा — *"आज कोई फैसला मत ले। तीन दिन बाद लेना।"*

पहला नुकसान जेब खाली करता है।
दूसरा फैसला ज़िंदगी खाली करता है।

गिरना हादसा है, बेटा। गिरकर आँख बंद करके दौड़ना चुनाव है।

कमेंट कर — **72**
Save कर ले, बुरे दिन में पढ़ना।

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"तुझसे नहीं माँगूँगा तो किससे माँगूँगा?"बेटा, ये सवाल नहीं होता। ये एक जाल होता है।तीन साल में मैंने ग्यारह लोगों को उधा...
07/09/2026

"तुझसे नहीं माँगूँगा तो किससे माँगूँगा?"

बेटा, ये सवाल नहीं होता। ये एक जाल होता है।

तीन साल में मैंने ग्यारह लोगों को उधार दिया। वापस आया तीन से। पर असली नुकसान पैसा नहीं था — आठ रिश्ते खत्म हो गए, क्योंकि जिसने नहीं लौटाया उसने मिलना बंद कर दिया।

हर "हाँ" के पीछे एक चुपचाप "नहीं" छुपा होता है। जब तू किसी की बात मानता है, तू किसी और चीज़ को मना कर रहा होता है — अपनी दुकान को, अपने परिवार को, अपनी नींद को। फर्क सिर्फ इतना है कि वो चीज़ें शिकायत नहीं करतीं।

कमेंट कर — **नहीं**
Save कर ले, मना करने में हाथ काँपे तो पढ़ना।

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दुनिया के बड़े उद्यमी जोखिम लेते हैं,वो चीज़ें बनाते हैं जो पहले वजूद में नहीं थीं।लेकिन हमारे देश के सबसे अमीर आदमी का ...
07/09/2026

दुनिया के बड़े उद्यमी जोखिम लेते हैं,वो चीज़ें बनाते हैं जो पहले वजूद में नहीं थीं।लेकिन हमारे देश के सबसे अमीर आदमी का हुनर कुछ और है।उनका हुनर यह पहचानना है कि आम हिंदुस्तानी रोज़मर्रा की जिंदगी में सबसे ज़्यादा पैसा कहाँ खर्च कर रहा है।फिर अपनी अथााह दौलत के दम पर उस पूरे बाजार को अपनी मुट्ठी में कर लेना है।

पहले उन्होंने Jio के ज़रिए टेलीकॉम को निगला,फिर कैंपा लाकर कोल्ड ड्रिंक बाजार पर झपट्टा मारने की कोशिश की और अब उनकी नज़र आपके फ्रीज़र में रखी आइसक्रीम पर है।
जब रिलायंस ₹10 में मुस्कुराते हुए चेहरों के विज्ञापनों के साथ आइसक्रीम बाजार में उतरता है,तो मध्यवर्गीय ग्राहक को लगता है कि यह 'सस्ता और अच्छा' है। लेकिन यह कोई इनोवेशन नहीं है।आइसक्रीम मुकेश अंबानी ने ईजाद नहीं की। अमूल, मदर डेयरी और गली-मोहल्ले में ठेला लगाने वाला रामू सालों से इसे बेच रहे हैं।

नया सिर्फ यह है कि अंबानी के पास इतना पैसा है कि वे घाटा सहकर भी चीज़ों को इतनी सस्ती बेच सकते हैं,जितनी कोई छोटा व्यापारी सोच भी नहीं सकता।विज्ञापनों में किसानों और मुस्कुराते चेहरों की तस्वीरें होती हैं, लेकिन पर्दे के पीछे यह सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय डेयरी ऑपरेटरों के बाजार का गला दबाने की तैयारी है।

इस धंधे का एक सीधा गणित है,जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'प्रीडेटरी प्राइसिंग' यानी शिकारी मूल्य निर्धारण कहते हैं।किसी भी चलते हुए सेक्टर को चुनो। अपनी असीमित पूंजी के दम पर इतने सस्ते दाम पर प्रोडक्ट उतारो कि बाकी सब कांप जाएं।छोटा ठेले वाला,स्थानीय ब्रांड और यहाँ तक कि जमे-जमाए को-ऑपरेटिव भी रिलायंस के घाटा सहने की क्षमता के आगे टिक नहीं पाते और दम तोड़ देते हैं।

जब सामने वाला कोई प्रतियोगी बचेगा ही नहीं,तब बाजार पर पूरा कब्जा होगा। तब ₹10 की आइसक्रीम कब ₹50 की हो जाएगी, आपको पता भी नहीं चलेगा।फ्री का जिओ बीएसएनएल को निगलते हुए कब 403 का हो गया उसका अहसास तक नहीं हुआ।

यह राष्ट्र निर्माण या तकनीक का विकास नहीं है। बनाना कुछ नहीं है, बल्कि जो बना-बनाया है उसे अपनी तिजोरी में हड़प लेना है। चमचमाते रिलायंस स्मार्ट स्टोर के फ्रीज़र में रखी वह सस्ती आइसक्रीम दरअसल उस छोटे दुकानदार के रोजगार की कब्र पर रखी है,जो कल तक स्वाभिमान से अपना घर चला रहा था।

कॉर्पोरेट की यह मुस्कान भ्रामक है, इनका असली काम सिर्फ और सिर्फ हर आम हिंदुस्तानी की जेब पर पूर्ण कब्जा करना है।

मुझमें और ज़िंदगी में हर बार ये जंग रही मैं उसके फैसलों से तंग रहा और वो मेरे होंसलों से तंग रही।                       ...
07/09/2026

मुझमें और ज़िंदगी में
हर बार ये जंग रही
मैं उसके फैसलों से तंग रहा
और वो मेरे होंसलों से तंग रही।

सेठजी की काली डायरी में दुकान का हिसाब नहीं था। उनका अपना हिसाब था — ₹2 की चाय तक लिखी होती थी।मैंने 90 दिन लिखा। तीसरे ...
07/09/2026

सेठजी की काली डायरी में दुकान का हिसाब नहीं था। उनका अपना हिसाब था — ₹2 की चाय तक लिखी होती थी।

मैंने 90 दिन लिखा। तीसरे महीने जोड़ा तो पता चला — सिर्फ चाय-नाश्ते में एक महीने की तनख्वाह चली गई थी। मुझे किसी ने लूटा नहीं था। मैंने खुद, दो-दो रुपये करके गँवाई थी।

आदमी पैसे की कमी से गरीब नहीं होता, बेटा। हिसाब की कमी से गरीब होता है।

बड़ा खर्च दिखता है, इसीलिए वो नहीं मारता। छोटा खर्च दिखता ही नहीं — वो मारता है।

कमेंट कर — **डायरी**
Save कर ले, महीने की आखिरी रात पढ़ना।

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23/07/2026

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14/06/2026

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