14/11/2021
#बिरसाईत - बिरसावाद - ऊलगुलान जोहार जिन्दाबाद ।
#बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड के गांव उलिहातु जिला खुंटी में एक छोटे से आदिवासी किसान परिवार में हुआ।
#बिरसा का बचपन गांव कबिले के साथ में बढते गया और साल्गा गांव के प्रारंभिक पढ़ाई के बाद इन्होंने जी. ई.एल चाइबासा चर्च(गोस्नर एवंजिलकल लुथार) विद्यालय में पढाई किए थे।
#इनका मन हमेशा अपने आदिवासी समुदाय के ऊपर जागीरदार, साहूकारों ओर ब्रिटिश अंग्रेजों के द्वारा किए जाने वाले दमनकारी, शोषणकारी जुल्म अत्याचारों पर चिन्तित रहता था।
#बिरसा मुंडा आदिवासियों को अंग्रेजों, जमींदारों साहुकारों से मुक्ति पाने में अपना नेतृत्व प्रदान किया।
#1894 में पानी नहीं गिरने के कारण छोटा नागपुर पठार क्षेत्र में भयंकर अकाल और महामारी फैली थी।
#धरती आबा बिरसा मुंडा ने अपने तन मन धन से लोगों की सेवा की।
#01 अक्टूबर 1894 को धरती आबा बिरसा मुंडा ने नौजवान नेतृत्व के रूप में सभी मुंडा आदिवासी कबिलों, समुहों को वैचारिक सामुहिक रूप से संगठित कर अंग्रेजों से लगान कर माफी के लिए विद्रोह किया।
#उन्होंने अंग्रेजो दमनकारी नीतियों के विरोध में उलगुलान का आव्हान किया और जिसकी *जमीन उसका देश, हमारे गांव में हमारा राज* का नारा बुलंद किया।
#अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ से अधिक सिपाहियों ने तीर कमठे लट्ठ से लैस होकर खुंटी थाने पर धावा बोला, 1897-1900 के बीच मुंडा आदिवासियों और अंग्रेजों के बीच में कई सारे विद्रोह हुए।
#बिरसा और साथियों ने अंग्रेजों के नाक में दम कर रखा था।
#1898 में बिरसा के संघर्ष के कारण अंग्रेजों को आदिवासियों की जमीन सुरक्षा का कानून भूमि संपादन अधिनियम पारित कर जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मजबूर होना पड़ा,जिसके तहत आज भी आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों को हस्तांतरित नहीं होती हैं।
#1900 को डोंबारी पहाड़ी पर बिरसा अपने मुंडा सिपाहियों की जनसभा को संबोधित कर रहे थे, उस समय अंग्रेजों ने हमला कर दिया जिसमें बहुत सारे बहन बेटियों और की लोग मारे गए थे। और कई सारे मुंडा क्रांतिकारी योद्धाओं ने अपनी गिरफ्तारीयां दी।
#अंत में स्वयं धरती आबा बिरसा मुंडा भी 03 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर के जमकोई जंगलों से अंग्रेजों के द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए।
#गिरफ्तार की बाद उन्हे रांची जेल ले जाया गया जहां उन्हें जल जंगल जमीन समझौता दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाने के लिए अमानवीय व्यवहार एवं शारीरिक यातनाएं दी गई, लेकिन बिरसा मुंडा ने शरीर से सांस निकलते तक यहीं कहा कि मैं कल भी इस ंगल_जमीन का मालिक था, आज भी मालिक हूं और मेरी आनेवाली नस्लें भी इस जल, जंगल,जमीन की मालिक रहेगी।
#वर्तमान युवा पीढ़ी को भी ऐसे ही महामानव क्रांतिसुर्य धरती आबा बिरसा मुंडा के ऐतिहासिक संघर्षशील सिद्धांतों से प्रेरणा लेकर सामुहिकता आधारित जाजम व्यवस्था अनुसार निर्णय लेकर सामाजिक संघर्षों करने की आवश्यकता है।
#जल जंगल जमीन।
#अबुआ दिशुम आबुआ राज।
#मै इस धरती का पुश्तैनी मालिक हु।
#लोग मुझे भगवान कहते हैं लेकिन मैं भागवन को नहीं मानता ।
#बिरसा मुंडा पखाडवाद के सख्त खिलाफ थे।
#महामानव_धरती_आबा_बिरसा_मुंडा - हुल हुल जोहार 🌾🌾🙏