21/06/2026
"ओए, हटो यहां से! यह सरकारी स्कूल है, कोई धर्मशाला नहीं!"
बारिश से भीगे हुए कपड़ों में खड़ी लड़की चुपचाप सब सुन रही थी।
"सर, मैं यहां पढ़ने आई हूं। मेरा नाम कविता है।"
चपरासी हंस पड़ा।
"तू पढ़ेगी? पहले अपने कपड़े तो देख ले!"
कविता की आंखें भर आईं, लेकिन उसके पिता ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
"बेटी, लोगों की बातों पर ध्यान मत दे। एक दिन यही लोग तुझे सलाम करेंगे।"
कविता का पिता गांव में रिक्शा चलाता था। सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक मेहनत करता, ताकि बेटी की पढ़ाई न रुके।
एक दिन स्कूल से लौटते समय कविता बोली—
"पिताजी, बाकी बच्चों के पास नई किताबें हैं। मेरे पास पुरानी हैं।"
पिता मुस्कुराए।
"किताब नई हो या पुरानी, मंजिल मेहनत से मिलती है।"
उस रात पिता ने खुद खाना नहीं खाया और अपनी बची हुई कमाई से बेटी के लिए किताबें खरीद लीं।
साल बीतते गए।
कविता हर परीक्षा में अव्वल आती रही।
फिर आया वह दिन जब उसे राज्य प्रशासनिक सेवा के इंटरव्यू के लिए शहर बुलाया गया।
शहर पहुंचकर उसने देखा—
महंगे कपड़े, बड़ी-बड़ी गाड़ियां, अंग्रेजी बोलते उम्मीदवार।
कुछ लोग उसे देखकर हंसने लगे।
"लगता है गांव की कोई लड़की रास्ता भटककर यहां आ गई है।"
कविता ने सिर झुका लिया।
तभी पिता ने कहा—
"सिर मत झुकाना बेटी। गरीब होना कमजोरी नहीं है।"
इंटरव्यू में एक अधिकारी ने पूछा—
"अगर आपको बड़ा अधिकारी बनने और अपने गरीब पिता से दूर रहने में से एक चुनना पड़े तो क्या चुनेंगी?"
कविता बिना एक पल रुके बोली—
"जिस इंसान ने मुझे यहां तक पहुंचाया, उसे छोड़कर मिली कुर्सी मेरे किसी काम की नहीं।"
पूरा कमरा शांत हो गया।
कुछ दिनों बाद परिणाम आया।
कविता का चयन हो गया था।
पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई।
लेकिन खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी।
ट्रेनिंग के दौरान एक दिन खबर आई कि उसके पिता को दिल का दौरा पड़ा है।
कविता दौड़ती हुई गांव पहुंची।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
पिता जा चुके थे।
उनके तकिए के नीचे एक पुराना कागज रखा था।
उसमें लिखा था—
"बेटी, अगर यह चिट्ठी पढ़ रही हो तो समझ लेना कि मेरा सपना पूरा हो गया। मुझे अफसोस नहीं कि मैं गरीब था। मुझे गर्व है कि मैं तुम्हारा पिता था।"
कविता फूट-फूटकर रोने लगी।
कुछ साल बाद वही लड़की जिले की कलेक्टर बनी।
अपने पहले भाषण में उसने कहा—
"मेरी कुर्सी मेरी नहीं है। यह उस रिक्शा चालक पिता की है जिसने अपनी भूख बेचकर मेरी किताबें खरीदी थीं।"
पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा।
क्योंकि दुनिया में सबसे अमीर इंसान वह नहीं होता जिसके पास सबसे ज्यादा पैसा हो।
सबसे अमीर वह होता है जिसके पास त्याग करने वाला परिवार हो।